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सर्वकोश
श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

पृष्ठ 411, कुल 869 में से

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पृष्ठ 411

चौदहवाँ अध्याय

हे स्वामी ! सद्गुरु ! मेरा तुम्हें प्रणाम ! तुम स्वयं ही क्षीरसागर हो। तुम्हारे ज्ञानरूप चन्द्रमा का उदय होने से
प्रत्येक जीव प्रसन्न हो उठता है। जिस चन्द्रमा के सितारों ने हृदयाकाश को प्रकाशित कर घनघोर अज्ञानरूपी
अन्धकार के ताप दूर किये, जिस चन्द्रमा के चन्द्रकिरण तृषाकांत चकोरों के लिये स्वानंदामृत का स्राव कर उन्हें
सहज ही तृप्त करते हैं, अविद्यारूपी अँधेरे में अन्धकाररूपी बन्धनों से जीवों के जो देहरूपी कमल कुम्हलाये
रहते हैं वे जिसके किरणरूपी ज्ञान से आनन्द से मुदित होते हैं, जिस चन्द्रमा का दर्शन होने से जीव के
अंतःकरण में आनन्द होता है और जो अहंकार रूपी चन्द्रकान्त मणियों का तत्काल विलय कर देता है। पूर्णिमा
के दिन पुत्र (शिष्य) के पूर्णत्त्व से पूर्ण वृद्धि हुई यह देखकर क्षीरसागर में ज्वार आता है फिर भी उसके
गुरुगौरव की मर्यादा का उल्लंघन नहीं होता। अद्वयानुभव के कारण अंतःकरण में आत्मानन्द बढ़ता ही रहता है।
सद्गुरुरूप क्षीरसागर अत्यन्त गहरा है। उसकी ओर आदरपूर्वक देखने से उस पर हिलोरें मारने वाली वेदांतरूपी
लहरों में शब्दरूपी ज्ञानरत्न दृष्टिगोचर होते हैं। उसमें विश्वासरूपी मंदराचल पर्वत तथा वैराग्यरूपी वासुकी के
रूप में मथनी को बाँधने वाली डोर, इनकी सहायता से निजधैर्यरूपी देव-दानव समसमान भाव से क्षीरसागर का
मंथन करने के लिये तत्पर रहते हैं। उस मंथन की पहली ही खेप में लय, विक्षेप आदि कालकूट उत्पन्न हुए और
विवेकरूपी महादेव ने आत्मदृष्टि से उन्हें अपने ही गले में निगल लिया। फिर अभ्यास की पुनरावृत्ति से सारे
कर्मों को विश्राम मिला उस समय श्रीकृष्ण जिसके वश हुआ, वह आत्मशान्ति रूपी लक्ष्मी प्रकट हुई। फिर वहाँ
ब्रह्मरस और भ्रमरस इन दोनों से भरा हुआ अमृत कलश जो देव-दानवों को समान रूप से प्रिय है, वह धीरे-धीरे
उस मंथन से बाहर निकला। उसी का बँटवारा करने के लिये श्रीहरि ने मोहिनी रूप लिया और अहंकाररूपी राहु
का शिरच्छेद कर देवताओं को तृप्त किया। वह वृत्तिरूप मोहिनी तत्काल रूप बदल कर नारायण स्वरूप हो
गयी। पहले की देहबुद्धि उसमें नहीं रही। क्षीरसागर का वह नारायण आज भी स्वयं समाधिरूप शेषशयन कर
सुखपूर्वक अत्यन्त संतुष्ट होकर अभी तक लेटा हुआ है। इस प्रकार सद्गुरु ज्ञानरूपी समुद्र है। नारायण आदि
अनेक अवतार सचमुच जिसके कारण उत्पन्न होते हैं, ऐसे उस सद्गुरु का अंत वेदों की भी समझ में नहीं आता।
जिसके सुन्दर ज्ञानरूपी रत्न शंकर और विष्णु के गले में तथा मुकुट पर शोभा बढ़ाते हैं और जिसका वेदपाठों ने
तथा महान कवियों ने वर्णन किया है ऐसे अत्यन्त गम्भीर सुखसागर ! जनार्दन ! अनंत, रूप धारण करने वाले तथा
जिसका अन्त मालूम नहीं हो पाता ऐसे देवता। तुम्हारे परे की वस्तु को कौन जानता है ? विचार की दृष्टि से भी
वह नहीं दिखायी देता, वेद भी उसके स्वरूप का वर्णन नहीं कर सकते तो मेरी मराठी उसका वर्णन करने में
किस प्रकार समर्थ होगी ? देखो ! सार्वभौम राजा के मस्तक पर कोई नहीं बैठ सकता। लेकिन मक्खी को वहाँ
बैठने में कोई कठिनाई नहीं होती। अथवा रानी के स्तन कौन देख सकता है ? लेकिन उसका बालक बड़े प्रेम से
स्तनपान करता है। उसी प्रकार मेरी यह मराठी भाषा भी जनार्दन कृपा के सामर्थ्य से आत्मज्ञान के गले लग कर
ब्रह्मा की भी बातें कर रही है। अस्तु आकाश घट के अन्दर और बाहर व्याप्त रहता है उसी प्रकार शब्दातीत
परब्रह्म शब्दों में ही रहता है। इसलिये प्रस्तुत प्रसंग में व्यर्थ के शब्द घुसाने के लिये स्थान ही नहीं बचा है।
बालक बोलना नहीं जानता इसलिये उसका पिता स्वयं बातें कर उससे बातें कराता रहता है। इस बात को भी