श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंदर्शन इस त्रिपुटी का भान छोड़ कर वही धारणा और वही ध्यान है यह मानकर उसमें समाधान मानना चाहिये।
वही स्वयं को साध्य हो इसलिये सारी आशाओं को त्याग देना चाहिये, वाणी से मौन धारण करना चाहिये, देह
के व्यापार पर नियंत्रण रखना चाहिये, वेदशास्त्रों को दूर रखें, वाद-विवाद से दूर रहें और जिससे आशा का मूल
समूल नष्ट हो जाये इस प्रकार भगवान की दृढ़ धारणा करें। काया, वाचा और मन को अपने काबू में रखें।
आत्मस्वरूप के लक्ष्य से विचलित नहीं होना चाहिये। सदा आत्मस्वरूप में ही लीन रहना चाहिये। उस स्वरूप
के सुख में लीन होने पर देह का देहपन भी याद नहीं रहता। अहंकार के साथ-साथ मन भी लुप्त हो जाता है
और परिपूर्ण स्वानंद की धारा बहने लगती है। वहाँ न कोई सामने है न कोई पीछे है। एकलापन भी नहीं है और
न दूजापन ही है। वहाँ भगवान और भक्त यह भेदभाव भी शेष नहीं रह जाता। सुख के सुख से वह सुखस्वरूप
होकर रहता है। सुखस्वरूप वैसे अकेला मैं ही हूँ, अलगपन से रहना मैं नहीं जानता इस आत्मानुभव में वह मग्न
रहता है। मेरे भक्तों को इतना लाभ होता है। आप शायद इससे यह कहें कि तुम रात-दिन कष्टवत् पड़े रहते
होगे लेकिन उसके साथ वैसा भी नहीं घटता। वह हेतु को छोड़ देह में विचरण करता रहता है। प्रारब्ध के बल
से वह आहार, निद्रा आदि दैहिक कर्म स्वाभाविक रूप से करते हुए भी देहबुद्धि को स्पर्श नहीं करता। कुम्हार
डंडा भले ही हटा ले लेकिन उसका चाक पहले की सी गति से ही चलता रहता है। उसी प्रकार प्रारब्ध के
संस्कार के अनुसार देह कर्म के अनुसार आचरण करता रहता है अथवा कुम्हार के चाक पर जब मक्खी बैठती
है तो वह बिना हिले ही चाक के साथ घूमती रहती है। इसलिये उसके भी करोड़ों फेरे हो गये ऐसा कहते हैं।
उसी प्रकार मुक्त को भी देहकर्म होते रहते हैं। इस प्रकार देहकर्म में आचरण करने वाला कभी नहीं कहता कि मैं
कर्त्ता हूँ। जिस प्रकार वायु के स्वभाव के कारण गिरे हुए पत्ते को भी चपलता प्राप्त होती है उसी प्रकार कर्म पूर्व
संस्कार के अनुसार चलते रहते हैं अथवा जिस प्रकार पुरुष के साथ छाया रहती है किन्तु पुरुष उस छाया में नहीं
रहता उसी प्रकार ज्ञाता के साथ भी देह रहता है किन्तु वह देह के दोष से मलिन नहीं हो जाता। यदि हम अपनी
ही छाया में बैठें तो वह छाया ही भाग जाती है। उसी प्रकार मेरे भक्त जब माया को देखते हैं तो माया उन्हें देखते
ही भाग जाती है अथवा मोतियों की कोई माला भ्रम में साँप की तरह दिखायी देती है लेकिन वह भ्रम दूर हो
जाने पर, उसे गले में पहनने पर साँप का भय नहीं रहता। उसी प्रकार अधम योनी हो या उत्तम योनी हो, लोगों
में वंद्य हो या निंद्य हो, उस देह को 'मैं' कहने में शंका नहीं करता क्योंकि वह जानता है कि देह ही मिथ्या है।
इस प्रकार ज्ञानसम्पन्न होने के कारण देह का भान मिथ्या है यह जानने के कारण ही देह के कर्म में आचरण
करते हुए भी उन्हें देह का देहपन बाध्य नहीं करता। उस देह के अवयवों को तोड़ने पर अथवा बाघ आदि
जानवरों द्वारा उसके फाड़े जाने पर अथवा अग्नि में उसे जलाने पर भी उसके देह को अहंता का भान नहीं रहता।
सूली पर अपनी छाया देखने पर जिस प्रकार कोई बेचैन नहीं होता, उसी प्रकार देह की होली जलने पर भी ज्ञाता
आत्मज्ञान के कारण भयभीत नहीं होता। अब शायद आप यह कहेंगे कि देह के साथ रहते हुए देह की अहंता
किस प्रकार बाधक नहीं होती ? अपनी स्वाभाविक नमकीनी छोड़कर यदि नमक व्यवहार करने लगे तो वह कैसे
बच पायेगा ? हींग अपनी गन्ध छोड़कर सुगन्धित कैसे रह पायेगा ? केला अपना सारा पानी त्याग कर केले के
रूप में कैसे रहेगा ? मैं युद्ध नहीं करूँगा कह कर यदि कोई लड़ाई में घुस पड़े तो क्या वह मस्तक पर होने वाले
प्रहार से बच पायेगा ? उसी प्रकार देह की संगत में आचरण करते समय देह की अहंता हमें छोड़ नहीं पायेगी।
इस शंका का उत्तर भी ध्यानपूर्वक सुनें। ज्ञाता को देह का भान बाधक नहीं होता। उस देह के प्रति जो अभिमान
जागता है वह भुने हुए बीज की तरह होता है। भुने हुए बीज से भूख का निवारण हो सकता है लेकिन उसे बोने