श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंचौदहवाँ अध्याय ३९७
जल कर भस्म हो गया तभी वह नष्ट हो गयी। उस प्रलय में जब ब्रह्मदेव का नाश हो गया तब सच्ची वेदवाणी
सुनाने वाला कोई शेष न रहा। वह पूरी की पूरी डूब गयी। कल्प के प्रारम्भ में वही वेदवाणी मैंने ब्रह्मदेव के
सामने प्रकट की। उसमें मैंने मेरी भक्ति का वर्णन यथार्थ रीति से किया है। वाणी का अनुसंधान जो मेरे स्वरूप में
ही सन्तोष प्राप्त करता है ऐसा वह आत्मज्ञान मैंने ब्रह्मदेव को सुनाया।
तेन प्रोक्ता च पुत्राय मनवे पूर्वजाय सा।
ततो भृग्वादयोऽगृह्णन् सप्त ब्रह्ममहर्षयः ॥ ४॥
उस समस्त वेद का विचार कर ब्रह्मदेव ने पहले मनु को उपदेश दिया, फिर उस मनु से ही सात ऋषियों ने
सम्पूर्ण वेद प्राप्त किया। ब्रह्मदेव ने दक्षादि प्रजापतियों को भी उसी रीति से उपदेश किया। फिर उनसे और
कितने लोगों को वह ज्ञान सम्पत्ति प्राप्त हुई उनकी संख्या बताना सम्भव नहीं है। सप्तऋषियों के नाम पूछोगे तो
वे हैं—भृगु, मरीचि, अत्रि, अंगिरा, पुलस्त्य, पुलह और ऋतु ये सच्चे ऋषि हैं।
तेभ्यः पितृभ्यस्तत्पुत्रा देवदानवगुह्यकाः।
मनुष्याः सिद्धगन्धर्वाः सविद्याधरचारणाः ॥ ५॥
किंदेवाः किन्नरा नागा रक्षःकिम्पुरुषादयः।
बह्व्यस्तेषां प्रकृतयो रजःसत्त्वतमोभुवः ॥ ६॥
उन अत्यन्त महान ऋषीश्वरों ने पुत्र, पौत्र, नर, किन्नर, देव, दानव, सिद्ध, विद्याधर, चारण, गुह्यक, गन्धर्व,
राक्षस, किंदेव और किंपुरुष आदि अनेकों को उपदेश किया। इतना ही नहीं, अपितु नाग-सर्पादि-तामस योनियों
में भी वह उपदेश परम्परा से प्राप्त हुआ। मुँह के आकार से जो मनुष्य की तरह दिखायी देते हैं किन्तु बाकी
शरीर पशु जैसा होता है ऐसे जो बड़े-बड़े भालू होते हैं उन्हें किंनर कहते हैं और मुँह पुरुष जैसा लेकिन शेष
शरीर चौपायों का ऐसे जो राम के सेवक वे हैं वानर, उन्हें किंपुरुष कहते हैं। पसीना, दुर्गन्ध तथा मलरहित
जिनके बड़े-बड़े भव्य शरीर दिखाई देते हैं और जो मनुष्य तथा देवताओं की तरह दिखायी देते हैं, उन्हें 'किदेव'
कहते हैं। ऐसे नाना प्रकार के व्यक्ति रज, तम अथवा सत्त्वप्रकृति के अनुसार उपदेश प्राप्त होने के कारण
अपनी-अपनी प्रकृति के अनुसार ज्ञान देते रहते हैं।
याभिर्भूतानि भिद्यन्ते भूतानां मतयस्तथा।
यथाप्रकृति सर्वेषां चित्रा वाचः स्रवन्ति हि ॥ ७॥
जिस गुण की प्रकृति होती है, उसी गुण का स्वभाव होता है। जैसा गुण होता है, वैसी ही वासना होती है।
समस्त प्राणिमात्र में जो कम या अधिक भेदभाव उत्पन्न हुआ है वह उस वासना के ही कारण हुआ है। देवत्व,
मानवता अथवा कीटक योनि ये सब वासना के ही प्रकार हैं। वह वासना ही अपनी रुचि के अनुसार प्राणियों में
अनेक प्रकार के भेद उत्पन्न करती है। जिनकी जैसी प्रकृति होती है, उसके अनुसार वे वेद का वैसा ही अर्थ ग्रहण
करते हैं। शिष्यों को वे उसी परम्परा से उपदेश देते हैं। वेद का विचित्र अर्थ लगाना और उसे ही सच मानकर
चलना, गलत साथ करना, गलत साधन रखना तथा विचित्र उपदेश करना यह सब प्रकृति के गुणों का मतभेद है।
एवं प्रकृतिवैचित्र्याद् भिद्यन्ते मतयोर्नृणाम्।
पारम्पर्येण केषांच्चि पाखण्डमतयोऽपरे ॥ ८॥