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सर्वकोश
श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

पृष्ठ 410, कुल 869 में से

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३९४ श्रीमद् एकनाथी भागवत
उदित हुआ उसे बासी कौन कहेगा ? आज का अग्नि यदि शुद्ध है तो क्या कल का अशुद्ध रहा ? उसी प्रकार
सनकादिकों का ज्ञान मराठी भाषा में लाने के लिये यदि कोई दोष देता है तो वह स्वयं दोषी होगा। सुवर्ण का
कुत्ता बनाया जाय तो वह कीमत में कम नहीं होगा उसी प्रकार सनकादिकों का ज्ञान लोक भाषा में लाने से वह
हीन नहीं होगा। जैसे गुड़ का करैला बनाने से वह कडुवा नहीं होता उसी प्रकार हंसगीत मराठी में लाने से
उसका अर्थ बदल नहीं जाता। मुकुट के सुवर्ण का जो मूल्य रहता है वही मूल्य सुवर्ण के श्वान का भी होता है।
ग्राहक दोनों का समान मूल्य देता है। उसी प्रकार जो आत्मानुभवी होंगे वही इस ग्रन्थ का सम्मान करेंगे और जो
आत्मानुभवी नहीं होंगे वे इसकी निन्दा करेंगे। हमारे लिये दोनों ही ब्रह्मस्वरूप हैं। आत्मानुभव का यही सच्चा
अनुभव जनार्दन ने हमें दिलाया है। एका जनार्दन की शरण जाते ही जिस प्रकार नमक समुद्र में मिलाने पर स्वयं
समुद्र रूप हो जाता है, उसी प्रकार एका और जनार्दन एक हो गये यह कौन कहेगा ? आँख का देखने का अपना
धर्म होता है जो स्वयं उसकी आँखों को मालूम रहता है। आँखों का समर्थ दर्शन, आँख ही स्वयं जानती है।
आँखों से दर्पण दिखायी देता है तो आँख को ही आँख दिखायी देती है। उसी प्रकार यह ज्ञान है। जिसे दृष्टि हो
वही दृश्य देखे। अपना अकेलापन छोड़कर एकनाथ जनार्दन की शरण में आया यहीं हंसगीत का निरूपण समाप्त
हुआ।
इति श्रीमद्भागवते महापुराणे एकादश स्कंधे टीकायां
श्रीकृष्ण उद्धव संवादे हंसगीत निरूपण नाम त्रयोदशोध्यायः ॥ १३ ॥
श्रीकृष्णार्पणमस्तु