श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंतेरहवाँ अध्याय ३८३
साधु संतों की सेवा करनी चाहिये। साधुओं में भी परिपूर्ण साधुत्त्व केवल सद्गुरु के ही पास है इसलिये उनके
चरणों की सेवा करनी चाहिये। उस सेवा से संसार बन्धन टूटता है क्योंकि सद्गुरु ही सच्चे साधु और सज्जन
पुरुष रहते हैं। उस साधु के सरस वचन श्रुति का ही उपदेश करते हैं जिससे ज्ञानरूपी खड्ग की प्राप्ति होती है
और उसे बुद्धि के हाथ में दिया जा सकता है। उसी शस्त्र को फिर वैराग्य और नैराश्यरूपी सील पर घिस कर
उसे प्रखर बनाना चाहिये और उसे धैर्य की मुठिया लगाकर अंतःकरण में सावधानी से रखना चाहिए। उस शस्त्र
से स्वयं को एकजुट करना चाहिये और फिर लक्ष्य साधकर देहाभिमान को छाँट देना चाहिये जो सभी संशयों का
गड़ढा है, जिससे देहदुःख उत्पन्न होता है, जिसके कारण सदा विषयों का व्यसन लगता है, जो काम और क्रोध
का पोषण करता है, जो तीनों गुण बढ़ाता है, जो शुद्ध आत्मा में जीवत्त्व लाता है, जिसके कारण जीव को जन्म-
मरण भोगना पड़ता है, जो सभी अनर्थों का दाता है, ममता जिसकी लाडली बेटी है, ऐसा यह अभिमान है।
मायारूपी माँ ही ममता को बढ़ाती है और उसी के सामर्थ्य पर यह इतना अहंकारी हो जाता है। इसलिये वीर को
समरभूमि में तेज धार वाला शस्त्र लेकर, धैर्यपूर्वक खड़े होकर इतने जोर से प्रहार करना चाहिये कि एक ही घाव
में माया, ममता और अभिमान इन तीनों के एक साथ टुकड़े हो जाएँ। भोज्य, भोग और भोक्ता, कर्म, कार्य और
कर्त्ता, ध्येय, ध्यान और ध्याता इस त्रिगुट को ही काट डालना चाहिये। 'मैं हूँ', 'मैं कौन' अथवा 'मैं ही ब्रह्म हूँ'
इस आत्मीयता का अहंभाव भी काट डालने से साधकों को मेरे पद के पास स्थान प्राप्त होगा। इस प्रकार वे स्वयं
ही ब्रह्मस्वरूप हो जाते हैं। अब आप कहेंगे कि यह तो केवल शब्दज्ञान का व्यवहार है। जोर शोर से बातें करने
से अहंकार कैसे नष्ट होगा? यदि शब्दों से ही अभिमान नष्ट होता तो बड़े-बड़े विद्वान अभिमान में क्यों चूर हो
जाते? अभिमान अगर सामने दिखायी देता तो दौड़ कर उसे काट डालते। लेकिन वह तो अतर्क्य है। अतः शब्दों
से तो अभिमान नष्ट नहीं होगा। उसी प्रकार आत्मानुभव का जो साक्षात्कार होता है वह कोई शब्दों का खेल नहीं
है। तो ऐसी शंका का समाधान सुनो। जो सदा सावधान रहकर अनन्य भाव से मेरा भजन करता है अथवा मेरी
ही भावना से जो सद्गुरु के पवित्र चरणों की सेवा करता है, मुझमें और सद्गुरु के कल्पांत में भी कोई भेद नहीं
है इस अभेदभाव से जो मेरा भजन करते हैं उन्हें सहज ही ज्ञान प्राप्त होता है। स्वाभाविक रूप से मेरे भजन में
मग्न रहने के कारण उन्हें ज्ञानरूप खड्ग की प्राप्ति होती है। जिस शस्त्र की धार से काल का हृदय भी काँप
उठता है वह शस्त्र ही अपने आप उसके हाथ लग जाता है। उस शस्त्र के भय से ही माया, ममता और अभिमान
जीव को छोड़ कर पूरी तरह भाग जाते हैं। अहंममता तथा अविद्या पर पूरी तरह प्रहार करने के लिये तैयार हो
जाइये तो वे स्वयं ही भय के कारण भाग जाते हैं और अहंममता तथा अविद्या का अस्तित्व ही समाप्त हो जाता
है। उत्तम भक्तिभाव से मेरा जो भजन करना चाहिये उसे करने से इतना ज्ञान प्राप्त होता है। अब मन में ऐसी
शंका आएगी कि यह भजन कहाँ किया जाय? तुम्हारा स्वरूप अतर्क्य, अत्यन्त सूक्ष्म और निर्गुण है। अतः
तुम्हारा भजन करने के लिये कौन-सा स्थान उपयुक्त है यही समझ में नहीं आता। अगर मन में ऐसी कल्पना
आती है तो उसका उत्तर ध्यानपूर्वक सुनो। सहस्रों पर्वतों को पार किये बिना, गुफाओं में गये बिना, कहीं दूर
जाने का परिश्रम किये बिना, जहाँ मेरी सदा सर्वदा भेंट होती है, जहाँ मैं पुरुषोत्तम रहता हूँ, वह भजन स्थान
निरूपम है। मुझे प्राप्त करने के लिये वह भक्तों का अत्यन्त सुलभ विश्राम स्थल है। सर्वसुखों का विश्रामस्थल
जो आत्माराम है वह अपने हृदय में सदा समभाव से रहता है। वहीं उसका प्रेम से भजन करना चाहिये। ब्रह्मदेव
से लेकर मक्खी तक सबके हृदय में एक मैं ही हूँ यह जो जानता है वही भाग्यवान है। मेरी प्राप्ति के लिये यही
भजन उत्तम है। जो मेरे हृदयस्थ तेज से मन-बुद्धि से आचरण करते हैं, जिस मेरे स्फुरण स्फूर्ति से ज्ञान पैरों पर