श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
पृष्ठ 398, कुल 869 में से
संदर्भ में पढ़ेंस्थिति में, अंतःकरण को भी लीन कर अहंकार विहीन होकर रहता है। विश्वाभिमानी पुरुष देह को ही 'मैं' और
विषय को 'मेरा' समझने की प्रवृत्ति का रहता है। उस वृत्ति से वह जागृति में निरन्तर देखता रहता है। जो तैजस
अभिमानी होता है वह अज्ञानवृत्ति का होता है इसलिये वह स्वप्नस्थिति देखता रहता है। ज्ञान का अभिमानी मूढ़
प्रवृत्ति का होता है इसलिये वह सुषुप्ति अवस्था देखता है। अब आप कहेंगे कि एक ही आत्मा इन तीन
अवस्थाओं में हो यह सम्भव नहीं है और तीनों अवस्थाओं को देखने वाले तीनों अभिमानी भिन्न होंगे यह कहें तो
अन्त में एक ही आत्मा शेष रहता है। ऐसा क्यों होता है? तो सुनो। पहला जो मैं जागने वाला हूँ उसने
स्वप्नावस्था देखी और वही मैं सुख से सोया भी था। इससे स्पष्ट है कि ये तीनों अवस्थायें मैं स्वयं जानता हूँ।
जिसने जो अवस्था देखी ही नहीं है वह उस अवस्था को कैसे बता सकता है? यही कारण है कि तीन
अवस्थाओं में आत्मा एक ही है। जागृति में इन्द्रियों में देखने का सामर्थ्य होता है, स्वप्न में तो देखने वाला मन
होता है और सुषुप्ति में पूरी तरह मूढ़ अज्ञान ही होता है। वह आत्मा को कैसे देखेगा? हे ब्राह्मण! इस शंका का
उत्तर भी शान्त चित्त से सुनें। मन और इन्द्रिय जड़ ही हैं। उनमें देखने का सामर्थ्य कहाँ से आयेगा? जो मन को
चलाता है, जो इन्द्रियों का प्रकाशक है, जो सुषुप्ति का द्योतक है, वह साक्षी रूप में रहने वाला आत्मा ही है।
अब अगर यह कहें कि सुषुप्ति में आत्मा होता ही नहीं है तो यह कहना ठीक नहीं होगा क्योंकि, मैं आनन्दपूर्वक
सोया था यह अनुभव किसे होता है? तो प्राकृतिक कार्यों से अलग, देहादि अवस्थाओं को प्रकाशित करने वाला
तथा गुण और इन्द्रियों का नियंता वही वास्तव में आत्मा है। इन्द्रियाँ आत्मा नहीं होती यह नियम है क्योंकि
उनका कर्म केवल एकदेशी होता है और आत्मा तो सर्वकर्ता, सर्वोत्तम होते हुए सदा निष्कर्म है। मन आत्मा नहीं
है, इसका मर्म सुनो। संकल्प और विकल्प यह मन का कर्म है और आत्मा निर्विकल्प, निरुपम होते हुए संसार
का विश्रामस्थल है। जो सुषुप्ति भोग का साक्षी, त्रिभुवन में देखना ही जिसका स्वरूप है, ऐसा जो अद्वितीय
आत्मा है वह मैं ही हूँ इसे निश्चयपूर्वक ध्यान में रखो। इस युक्ति से जो एक परमात्मा को साध्य कर लेता है
वही साधकों के काम आता है और उसी के सामर्थ्य से योग भी साध्य होता है।
एवं विमृश्य गुणतो मनसस्त्र्यवस्था मन्मायया मयि कृता इति निश्चितार्थाः।
संछिद्य हार्दमनुमानसदुक्तितीक्ष्णज्ञानासिना भजत माखिलसंशयाधिम्॥ ३३॥
जो-जो युक्तियाँ मैंने तुम्हें बतायी हैं और जो श्रुति शास्त्रसम्मत भी हैं उन पर विचार कर परमार्थ के मार्ग
के संकटों को सुलझाना चाहिये। संसार के बन्धनों का कारण गुणावस्था है जिनसे मन व्याप्त है। जिसे मेरा ही
आच्छादन है ऐसी जो माया है वही मूल कारण है। जिस प्रकार आँख का पानी जम कर उसी का परदा बन जाता
है और जो आँख को ढँक देता है, उसी प्रकार मेरी माया मेरे ही कारण प्रबल हुई है और उसने मुझे ही ढंक दिया
है अथवा जिस प्रकार पूर्णिमा को अत्यन्त निर्मल पूर्णचन्द्र का उदय होते हुए उस पर पृथ्वी की छाया पड़ती है
और चन्द्रमा पर काला दाग दिखायी देने लगता है। पृथ्वी और चन्द्रमा के बीच का अन्तर काफी है अर्थात्
चन्द्रमा का दाग झूठा है लेकिन लोग उसे सच मानते हैं। उसी प्रकार माया मेरे पास है, उसने मुझे स्पर्श भी नहीं
किया है फिर भी लोग मिथ्याभास के कारण ही उसके भुलावे में आ जाते हैं। इसीलिये मिथ्या गुणों की अवस्था
अपने माथे पर ढोते हैं। इसी कारण विषयभोग की अवस्था वासनामुक्त होकर बढ़ती है। इस प्रकार उभय देह
बन्धन जीव से व्यर्थ ही चिपके हुए हैं। इसलिये उसे तोड़ने के लिये मेरी युक्ति पर विचार करना चाहिये। मुक्ति
का केवल अनुमान ही करते रहने से अनुमानिक ज्ञान होता है। उससे अविद्या का बन्धन नहीं टूटता। इसलिये