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सर्वकोश
श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

पृष्ठ 395, कुल 869 में से

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पृष्ठ 395

तेरहवाँ अध्याय ३७९
आत्मज्ञान से, उपदेश के रूप में विषयवृत्ति के आगे-पीछे अपना ज्ञानस्वरूप दृष्टि को दिखलाता रहता है। मैं तो
सदा ज्ञानस्वरूप ही हूँ। मैं सब में सर्वत्र हूँ। इसलिये गुरु, शिष्य को मुझ में आत्महित ही दिखलाता है। अरे!
साड़ी को सूत से अलग करने का प्रयत्न करने पर वह कृति ही नष्ट हो जाती है क्योंकि उसमें भीतर-बाहर सूत
ही रहता है। उसी प्रकार साधकों में विषयों का जो भान रहता है वह भी मेरे स्वरूप से भिन्न नहीं है क्योंकि सारे
ज्ञान का स्वरूप मैं ही हूँ। उसमें नाम, रूप, वर्ण आदि का भेद नहीं है अथवा कर्म, कर्त्ता अथवा कर्म सम्बन्धी
विवाद भी नहीं है। ॐकार के साथ सारे वेद जिसमें डूबे, ऐसा शुद्ध केवल एक मैं ही हूँ। जहाँ से भ्रम के साथ
भ्रान्ति का पलायन हो गया, क्रिया के साथ प्रवृत्ति टूट कर गिर पड़ी, निवृत्ति तो लज्जा से ही अदृश्य हो गयी और
वृत्ति स्वस्वरूप में एकरूप होकर रह गयी। सूर्य उदय होने पर वह अन्धकार को पूर्णरूप से निगल लेता है, जुगनूँ
को तो मार ही डालता है और नक्षत्रों को तत्काल नष्ट कर देता है। उसी प्रकार मेरे स्वरूप की प्रवृत्ति और
निवृत्ति लज्जा से नष्ट हो जाती हैं और आत्मानन्द से नित्य तृप्ति रहती है। मेरे इस स्वरूप का आनन्द जब
साधकों को प्राप्त हो जाता है, तो चित्त भी विषयों का त्याग करता है और विषय भी चित्त को छोड़ देता है। जो
फल डाल पर पकते हैं वे पकने के समय डाल से अलग हो जाते हैं। डाल भी उस फल को नहीं रखती। दही
मथ कर निकाले हुए मक्खन को यदि पुनः मट्ठे में डाल दिया जाय तो वह मट्ठे से अलग ही रहता है। उसी
प्रकार चित्त भी विषयों से अलग रहता है। मेरा स्वरूप प्राप्त हो जाने पर यदि दैव जबर्दस्ती उसे विषयोपभोग देने
लगे तो भी उसके चित्त में विषयवासना उत्पन्न नहीं होती क्योंकि वह स्वाभाविक रूप से अलग ही रहता है। इस
प्रकार मेरा योग साधने पर अपने आप ही चित्त और विषय का उत्तम रीति से वियोग होता है। इसका सरल
उपाय बताता हूँ। जरा देखो। इसमें भी शायद आपको शंका होगी कि सर्वत्र एक ही स्वरूप व्याप्त है और वह
शुद्ध है। वहाँ बाध्य कैसा और बाधक कैसा ? अर्थात् उस समय साधक किस चीज की साधना करते हैं ? लेकिन
ऐसे समय भी अहंता ही बाधक होती है। उसका भी लक्षण बताता हूँ, ध्यान से सुनो।
यर्हि संसृतिबन्धोऽयमात्मनो गुणवृत्तिदः ।
मयि तुर्ये स्थितो जह्यात् त्यागस्तद्गुणचेतसाम् ॥ २९ ॥
जहाँ क्षणभर की भी बस्ती होती है उस स्थान का भी मनुष्य को अभिमान चढ़ता है। अभिमान का उसे
इतना व्यसन रहता है। उसका यह कौतुक प्रत्यक्ष ही देखने लायक है। जरा सा भी अहंकार उत्पन्न हो जाय तो
बुद्धि पवित्र मनुष्य को भी मायाग्रस्त कर देती है। देह की संगति से वह अहंकार प्रबल होते ही तत्काल कुछ न
कुछ विपरीत परिणाम कर देता है। अहंकार जब उफनता है तो वह आनन्द को ढँक देता है। इससे परमात्मस्फूर्ति
का स्फुरण नष्ट होता है, जीव की विषयासक्ति बढ़ती है और वे स्त्री के विषय के अधीन हो जाते हैं। उनके
चित्त में सदा विषयों की ही चिन्ता रहती है। ऐसा मनुष्य भूल जाता है कि मैं स्वयं ही परिपूर्ण हूँ और धन के
लिये असहाय हो उठता है। अपने मर्यादित देहाकार का ही उसे अभिमान हो जाता है। इससे कर्माकर्म के आघात
होकर अनेक प्रकार की नरक यातनाएँ होती हैं और जन्म-मरण के भँवर में पड़ कर वह महान दुःख से व्याकुल
हो जाता है। उन दुःख यातनाओं को भोगते समय जिसके मन को कष्ट होता है और उससे गृहस्थी की वेदना
नहीं सही जाती उसे देहाभिमान छोड़ देना चाहिये। लेकिन संकट यही है कि यह देहाभिमान नहीं छूटता।
इसीलिये साधकों को साधनों का संकट सहना अनिवार्य हो जाता है। लेकिन वह जो भी साधन करता है उसमें
साधनाभिमान उत्पन्न हो जाता है। जिस प्रकार लुटेरे सब कुछ लूट लेते हैं, उसी प्रकार साधनों में अहंकार विघ्न