श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३७८ श्रीमद् एकनाथी भागवत
जागृति में स्वप्न नहीं होता इसलिये स्वप्न जागृति को नहीं जानता इसे स्मरण रखो। सुषुप्ति जागृति और स्वप्न
इन दोनों को नहीं जानती इसलिये उन दोनों को सुषुप्ति का ज्ञान नहीं होता। यदि जीव को अवस्थाओं का
अभिमानी कहें तो जीव के साथ यह भी नहीं घटता। विश्व, तैजस और प्राज्ञ ये तीनों तीन अवस्थाओं के
अभिमानी हैं। जो जिस अवस्था का अभिमानी होता है वह उस अवस्था के साथ तद्रूप हो जाता है। लेकिन
'जीव' तीनों अवस्थाओं का साक्षी होकर साक्षित्व के कारण स्वतंत्र रहता है अतः वह अवस्थाभिमानी नहीं है।
यहाँ 'जीव' वह है जो देह से स्वतंत्र, गुणों से निराला तीनों अवस्थाओं से अलग, केवल द्रष्टा, साक्षी और
सचमुच जो जानता है। जीव को यदि अवस्थाभिमानी न कहें तो फिर तीनों अवस्थाएँ कौन भोगता है ? मैं सोया,
मैंने जिया, मैंने स्वप्नावस्था देखी यह प्रत्यक्ष अनुभव स्वयं जीव ही करता है। यदि इसे जीव का स्वभाव ही कहें
तो उसका अभिप्राय बताता हूँ।
अहंकारकृतं बन्धमात्मनोऽर्थविपर्ययम्।
विद्वान् निर्विद्य संसारचिन्तां तुर्ये स्थितस्त्यजेद् ॥ २८ ॥
जो आराम से झूले पर बैठा रहता है वह स्वयं हिले बिना भी उस झूले के हिलने से आनन्द से झूलता
रहता है और अपनी इच्छा से झूले के साथ हिलता रहता है। वह जब जोर-जोर से झूलता रहता है उस समय
वास्तव में झूला ही हिलता रहता है और बैठने वाला अपने स्थान पर स्थिर रहता है। जीव की वैसी ही स्थिति
है। जिस प्रकार वह स्वप्न का घर, स्त्रियाँ आदि को अपना ही मानता है उसी प्रकार अहंममता के अभिमान के
कारण वह तीनों अवस्थाएँ मैं ही भोग रहा हूँ यह मानता है। लोहे का काम करते समय, अग्नि के साथ तादात्म्य
होने के कारण लोहे पर किये हुए प्रहार अग्नि पर किये गये मालूम होते हैं। अग्नि की संगतिसे ही लोहे का काम
पूर्ण होता है या पूर्ण नहीं होता लेकिन अग्नि न बनता है न बिगड़ता है। इसी प्रकार जीव भी यहीं रहता है। जिस
प्रकार अग्नि के बिना लोहे का सामान नहीं बनता उसी प्रकार आत्मा के संयोग के बिना बुद्धि जड़ है। आत्मा के
बिना वह कभी भी कोई भी क्रिया नहीं कर सकती। लोहे की सलाख बनाकर भी अग्नि उसका निर्माण कर्त्ता
नहीं होती। उसी प्रकार कर्म करवा कर भी जीव अकर्त्ता ही होता है। फिर भी वृत्ति के साथ तादात्म्य होने के
कारण वह 'कर्त्ता मैं हूँ' यही मानता है। जीव ने अपने प्रकाश से वृत्ति को प्रकाशित किया है और यह वृत्ति ही
जीव को अपने स्वभाव के अनुसार विविध अवस्थाएँ देती रहती हैं। सूर्य के कारण ही जल प्रकाशित होता है,
उस जल ने ही सूर्य का प्रतिबिम्ब निर्मित किया है और उस पानी के कलकल निनाद की तरह अथवा चंचलता
के अनुसार या स्थिरता के अनुसार सूर्य का प्रतिबिम्ब पानी के कम्पन्न के अनुसार थरथर काँपता है अथवा स्थिर
रहता है। सूर्य का निवास ऊपर आकाश में है, पानी उसे नीचे ले आता है। उसी प्रकार वृत्ति भी अपने
नामलौकिक के अनुसार मुक्तों को भी बन्धन में डालती है। आत्मा से वृत्ति प्रकाशित होती है लेकिन उसी वृत्ति
के कारण आत्मा में जीवभाव आता है, उस जीवभाव के कारण जीव में देह की ममता उत्पन्न होती है और इसी
कारण वह प्राप्त सुख-दुःख का उपभोग करता है। सारांश, वृत्ति की संगत से ही विषयों की आसक्ति बढ़ती है
और वास्तव में इसी कारण से जीव को संसार बन्धन प्राप्त होता है। इस प्रकार गुण और चित्त की विषयासक्ति से
जीव को भले ही बन्धन प्राप्त हो जाय, फिर भी वैराग्य भाव से तथा गुरु की कृपा से विषयवृत्ति को नियंत्रित
करना चाहिये। अब गुरुकृपा की बात सुनो। मैं जो निरन्तर तीनों अवस्थाओं में ज्ञानस्वरूप तथा गुणों से अलिप्त
हूँ, उसे गुरुकृपा आत्मज्ञान के योग से अभ्यास की ओर प्रवृत्त करती है। अभ्यास की बात तो विचित्र ही है। वह