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सर्वकोश
श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

पृष्ठ 402, कुल 869 में से

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३८६ श्रीमद् एकनाथी भागवत
पर उसमें से अंकुर नहीं निकल पायेगा इसे ध्यान में रखिये। चित्र में बाघ दिखायी देता है लेकिन उसमें पीड़ा
करने का सामर्थ्य नहीं होता। उसी प्रकार भुना हुआ अभिमान यदि शेष बचा भी हो तो वह ज्ञाता को बाधक नहीं
होता। चित्र के बाघ में जिस प्रकार बाघ की हिंस्रता नहीं होती, उसी प्रकार मुक्तों के देह में भी देह के गुण नहीं
होते। चैतन्यघन आत्माराम जब हृदय में दृढ़ हो कर बैठ जाता है तो उसी के स्वरूप में वृत्ति निमग्न हो जाती है।
तब दिखायी देने वाला भान भी भुना हुआ होने के कारण उसका प्रभाव भी नष्ट हो जाता है। इस प्रकार जब
स्मृति का लय हो जाता है तो ज्ञाता किस प्रकार आचरण करते हैं उसका यथातथ्य वर्णन श्रीकृष्ण आत्मबोध से
बता रहे हैं। सब कर्मों में आचरण करते हुए देह का देहपन याद नहीं रहता, यह समाधि का लक्षण श्रीकृष्ण स्वयं
बता रहे हैं।
देहंच नश्वरमवस्थितमुत्थितं वा सिद्धो न पश्यति यतोऽध्यगमत् स्वरूपम्।
दैवादपेतमुत दैववशादुपेतं वासो यथा परिकृतं मदिरामदान्धः॥ ३६॥
वह जिस देह से मेरा भजन कर मेरे शुद्ध स्वरूप को पहुँचता है, उस देह को ही वह भूल जाता है और
उस देह को वह अपनत्व की दृष्टि से नहीं देखता। जिस प्रकार कोई किराये के घोड़े को अपने घर तक ले
आता है लेकिन कार्य पूरा हो जाने के बाद वह कहाँ चला गया इसका उसे स्मरण भी नहीं होता अथवा कोई
स्त्री मैके से ससुराल आते समय किसी विश्वस्त मजदूर को साथ लेती है लेकिन रात को अंतःपुर में पति के
साथ सोने के बाद वह उस मजदूर को भूल जाती है अथवा जिस प्रकार दैवयोग से पालकी में बैठने वाला
व्यक्ति अपने फटे-पुराने पादत्राणों को भूल जाता है अथवा जिस प्रकार कोई स्त्री बहुत दिनों के बाद पति का
सान्निध्य प्राप्त होने पर लाज-लज्जा भूल जाती है वैसी ही उसके देह की अवस्था होती है। लेकिन दाम्पत्य की
उस सुखकारी भेंट में यदि कोई पराया व्यक्ति वहाँ आ जाता है तो उनमें लज्जा उत्पन्न होती है, उसी प्रकार द्वैत
दृष्टि से देखने पर ही देह का भान होता है। लेकिन मुझसे एकता का बल प्राप्त होने पर देह कैसा? इस प्रकार
मेरे स्वरूप तक पहुँचकर आत्मानंद से भरे उस साधक को अपने देह का विस्मरण होकर आनन्द से सुखरूपता
प्राप्त होती है। फिर शरीर उठा है या बैठा है, चल रहा है या स्थिर है, जाग रहा है या सो रहा है इन बातों का
स्मरण ही बन्द हो जाता है। वह तृप्त है या भूख से व्याकुल है, वह जाड़े से ठिठुर रहा है या गरमी से तप रहा
है, उसने जल का प्राशन किया है या उसे प्यास लगी है या वह यों ही शान्त बैठा हुआ है, इसका भी उसे
स्मरण नहीं होता। वह यहाँ है या वहाँ है, वह गूँगा है या बोलता है। यह था या नहीं था? इन बातों का स्मरण
करने का वह प्रयास नहीं करता। यह छूत या अछूत है? स्वच्छ है या मलिन है? यह आँखवाला है या अन्धा
है? या शरीर से यह विकलांग है? यह आया या गया? यह मूल रूप में था या कोई इसे ले आया है? इसने
जन्म लिया या मर गया? या स्थिर होकर रह गया? इसका भी उसे स्मरण नहीं होता। यह बाल है या युवा है।
यह मोटा है या पतला है? यह हल्का है या भारी है? इसका उसे पूरी तरह स्मरण नहीं होता। यह खाट पर
लेटा है या धरती पर है, यह अच्छी जगह है या खराब जगह? यह है या नहीं है इसकी भी उसे याद नहीं
रहती। यह मंत्र में है या तंत्र में है। तीर्थ में है या क्षेत्र में है। यह विष्ठा में है या मूत्र में है? या किसी पवित्र
स्थान पर है? इसका भी उसे स्मरण नहीं होता। यह जन में है या वन में है? या निर्गुण में है? जप में है या
ध्यान में है? इसका भी वह मन में स्मरण नहीं करता। यह सज्जनों में है या दुर्जनों में? यह किसी कारागृह में
है या विमान में है? यह घर में है या श्मशान में है? क्या कोई इसे देख रहा है? यह घर में है श्मशान में है?
क्या कोई इसे देख रहा है? इसका भी उसे स्मरण नहीं होता। यह हाथी में है या घोड़े में है? या स्त्रियों के