श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
पृष्ठ 404, कुल 869 में से
संदर्भ में पढ़ेंकैसा और अपवित्र कैसा ? तीर्थ कैसा और क्षेत्र कैसा ? वेद कैसा और शास्त्र कैसा ? ब्रह्म तो स्वतंत्र और अद्वय
ही है। वहाँ उत्पत्ति कैसी और विनाश कैसा ? बैकुण्ठ कैसा और कैलास कैसा ? ब्रह्मा, विष्णु और महेश्वर भी
कैसे ? एक अविनाशी ब्रह्म ही शेष रहता है। वहाँ किसका बोध और कैसी बुद्धि ? वहाँ तो वास्तव में देवत्व भी
नष्ट हो जाता है। मोक्षसिद्धि भी लज्जा से विनष्ट हो जाती है। वही क्षीरसागर का शेषशायी भी कैसा ? वहाँ तो
मेरा भगवान स्वरूप भी नष्ट हो जाता है। ॐकार का मस्तक भी डूब जाता है। इतना सायुज्यस्वरूप उन्हें प्राप्त
होता है। इसलिये देह बचा भी तो क्या और आया भी तो क्या इसका उन्हें स्फुरण भी नहीं होता। उसका
स्पष्टीकरण इस प्रकार है। अविद्या यह कारण है और देह उसका कार्य है। वह अविद्या ही जब नष्ट हो जाती है
तो कारण के बिना कार्य रहे यह सम्भव नहीं है ऐसा आप कहेंगे। वृक्ष यदि जड़ के साथ गिर पड़े तो भी
उसकी आर्द्रता तत्काल समाप्त नहीं होती। पत्ते, फूल, फल आदि आर्द्र रहते ही हैं। उसे सूखने में काफी समय
लगता है। उसी प्रकार अविद्या का नाश भले ही हो जाय लेकिन भोगरूप दैव के रूप में जो शेष रहता है उसके
कारण ज्ञानी पुरुष कर्म करता है। वह अपने देह में ही विदेह के रूप में रहता है। अब शायद आप यह कहें कि
देह को बड़े प्रेम से बड़ा करते हैं, उसका बड़े लाड़-प्यार से पोषण करते हैं और निरन्तर सुरक्षा करने पर भी
उसका पतन होता है यह स्पष्ट दृष्टिगोचर होता है। जिसका देह उसके स्वाधीन न हो उसका तत्काल पतन होना
चाहिये। फिर भी वह बचता क्यों है ? ऐसी भी कल्पना मन में आ सकती है। जिसका वह देह है वही जब उसे
नहीं पूछता तो फिर वह देहकर्म किस लिये करेगा ? यदि आपकी ऐसी शंका हो तो उसका भी उत्तर दूँगा। ध्यान
देकर श्रवण करें। देह की उत्पत्ति स्थिति और लय यह पुरुष के वश में नहीं रहती। दैव ही उसे चलाता है
इसलिये दैव योग से ही देह का कर्म होता रहता है। उठना या बैठना देह को दैवयोग के कारण ही प्राप्त होता
है। लेना-देना भी दैवयोग से होता है और खाना-पीना भी दैवयोग से होता है। देह को स्वदेश या परदेस दैव ही
ले जाता है। देह को स्वर्ग या नरक के भोग दैव के कारण ही भोगने पड़ते हैं। यश, लाभ, हानि अथवा मृत्यु
यह सब देह को दैव के कारण ही प्राप्त होते हैं किन्तु मृत्यु यह सब देह को दैव के कारण ही प्राप्त होते हैं
किन्तु जो ज्ञानसम्पन्न रहता है वह जिस प्रकार घट में दिखाई पड़ने वाला चन्द्रमा घट से अलग रहता है उसी
प्रकार वह देह से अलग रहता है। जिस प्रकार पुरुष के पास छाया रहती है उसी प्रकार ज्ञाता के सान्निध्य के
लिये देह रहता है। वह देह अपने कर्म भोगने के लिये दैव के अधीन रहता है। छाया मुझसे ही उत्पन्न होती है
और मेरे ही सान्निध्य में बढ़ती है फिर भी वह मेरी ही है इसका कभी किसी को गर्व नहीं होता। उसी प्रकार
ज्ञाता के पास देह रहता है फिर भी वह अभिमानपूर्वक 'यह मेरा' है नहीं कह सकता। छाया सदा निकट ही
रहती है लेकिन वह कहाँ रहती है और कहाँ नहीं रहती यह वह जिसकी है वह भी उससे नहीं पूछता। उसी
प्रकार ज्ञाता का देह के सम्बन्ध में आचरण रहता है। छाया विष्ठा पर भी पड़ती है और पालकी में भी चढ़ती है
लेकिन इसके कारण उस पुरुष को किसी भी प्रकार का सुख या दुःख नहीं होता। उसी प्रकार ज्ञाता को भी
देहभोग का सुख-दुःख नहीं होता। लेकिन उसे इस प्रकार अपने देह का विस्मरण कैसे होता है ? उसका कारण
भी दृष्टांत देकर बताता हूँ। जो पैसा देकर दारू पीता है वह उस दारू के नशे में नाचने, गाने लगता है। वास्तव
में देहधारी होते हुए भी वह अपने देह को भूल जाता है। शरीर पर वस्त्र है या नहीं इसका भी उसे भान नहीं
रहता और यह तो ब्रह्मरस का पान कर परमानन्द से तृप्त हुआ रहता है। अतः उस नशे की धुंध में उसे देह का
भी स्मरण नहीं होता। सारांश, देह का पालन अथवा पोषण, जन्म अथवा मृत्यु यह सब दैवयोग से ही होता
रहता है। हंस ने अपने भाषण में इसी बात का प्रतिपादन किया।