सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

पृष्ठ 400, कुल 869 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 400

३८४ श्रीमद् एकनाथी भागवत
लोटता है, उस मुझ हृदयस्थ के प्रति जो भजन तत्पर नहीं होता वह बाह्य उपायों से थक कर अनेक प्रकार के
संकटों में पड़ जाता है। ऐसे लोगों में भी कोई तो ऐसा भाग्यवान पुरुष होता है और वही मुझ हृदयस्थ का विचार
कर निश्चयपूर्वक मेरे भजन में लग जाता है। मुझ हृदयस्थ का भजन करने से, जिस ज्ञान से अधःपतन नहीं
होता, ऐसा मेरा पूर्ण वैराग्ययुक्त आत्मज्ञान वह प्राप्त करता है। उस ज्ञान के भय से ही अभिमान भाग जाता है।
वह ज्ञान मैं उन्हें देता हूँ जो सदा सर्वदा मुझ हृदयस्थ का भजन करते हैं। जिस ज्ञान की सिद्धि से समस्त
व्याधियाँ दूर हो जाती हैं और सारे संशय भी भाग जाते हैं उस ज्ञान से भक्त आत्मपद प्राप्त करते हैं। इसलिये मैंने
बड़े आग्रह से कहा कि बलशाली वीरों को तेज शस्त्र से सन्देह को काट देना चाहिये। इस पर मन में यह विचार
आयेगा कि यदि सचमुच संसार प्राप्त हो जाय तो उसका शस्त्र से किस प्रकार छेदन करना चाहिये ? तो जो भी
संसार है वह सब भ्रांति है यही बात श्रीकृष्ण अगले श्लोक में बता रहे हैं।
ईक्षेत विभ्रममिदं मनसो विलासं दृष्टं विनष्टमतिलोलमलातचक्रम्।
विज्ञानमेकमुरुधैव विभाति माया स्वप्नस्त्रिधा गुणविसर्गकृतो विकल्पः ॥ ३४ ॥
देह से लेकर अहंकार तक जिस पिण्ड-ब्रह्माण्ड का आभास होता है वह सब मन का ही विलास है।
संसार मिथ्या ही होता है। जिस प्रकार सुषुप्तावस्था में स्वप्न में मन स्वयं सारे त्रिभुवन को देखता है, उसी प्रकार
अविद्या यह लम्बा संसाररूपी स्वप्न का निर्माण करती है। जो एक स्वरूप का रहता है और दूसरे स्वरूप में
दिखायी देता है, उसे आभास कहते हैं। सीप में चाँदी का आभास होता है, रस्सी को बड़ा सर्प कहते हैं। अथवा
जहाँ केवल सूर्यकिरण होते हैं वहाँ लोग मृगजल देखते हैं, उसी प्रकार जो केवल शुद्ध परब्रह्म है उसे लोग भ्रम
के कारण संसार कहते हैं। लेकिन इस आरोप का कारण स्वयं मैं हूँ। मशाल को गति से घुमाने से वह अग्नि का
कंगन मालूम होता है, वह केवल अग्नि के तेज के आभास के कारण। उस अग्निचक्र का विस्तार करने पर
अग्नि सत्य होता है और कंगन मिथ्या रहता है। उसी प्रकार संसार के सम्बन्ध में विचार करें तो ब्रह्म सत्य है
और संसार मिथ्या। उस संसार के आधिदैविक, आधिभौतिक और आध्यात्मिक आदि सब मशाल की तरह होते
हैं। वे तीन गुणों से उत्पन्न माया का ही परिणाम है। मशाल के परिभ्रमण के आभास के कारण और उसकी घूमने
की गति के कारण वह मशाल चक्र की तरह दिखायी देती है। वह क्षणभर के लिये ही दिखाई देती है और
क्षणभर में अदृश्य हो जाती है। उसी प्रकार यह संसार है। जब तक परिभ्रमण तीव्रगति से होता है तब तक मशाल
का कंगन दिखायी देता है। परिभ्रमण समाप्त होने पर कंगन का स्वरूप भी नष्ट हो जाता है। उसी प्रकार जब
तक भ्रम रहता है तब तक संसार सत्य मालूम होता है। वह भ्रम समाप्त होने पर संसार दिखायी भी नहीं देता। मैं
ही देह हूँ, स्त्री और बच्चे मेरे हैं यही भ्रम का मुख्य सूत्र है। उसका नाश किये बिना ही क्षुद्र लोग मुक्त होने का
अहंकार करते हैं। इस प्रकार यह संसार मायामय है यह निश्चित है और उसकी आसक्ति त्याग कर शान्ति किस
प्रकार प्राप्त की जाय उसका प्रकार बताते हैं।
दृष्टिं ततः प्रतिनिवर्त्य निवृत्ततृष्णस्तूष्णीं भवेन्निजसुखानुभवो निरीहः।
संदृश्यते क्व च यदीदमवस्थितवस्तुबुद्ध्या त्यक्तं भ्रमाय न भवेत् स्मृतिरानिपातात् ॥ ३५॥
भजन से अभ्यास से दृष्टि भी सहज ही पवित्र होती है और संसारात्मक त्रिपुटी भी मिथ्या है इस बात का
दृढ़ निश्चय अंतःकरण में होता है। उस समय संसारात्मक त्रिपुटी को छोड़ दृष्टि शांत करने पर जिस प्रकार
अलंकार सुवर्ण के रूप में दिखायी देते हैं उसी प्रकार मेरी हृदयस्थ के साथ भेंट होती है। तब दृश्य, द्रष्टा और