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सर्वकोश
श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

पृष्ठ 396, कुल 869 में से

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पृष्ठ 396

३८० श्रीमद् एकनाथी भागवत
रूप हो जाता है। अब साधकों के साधन सुनो। वह इस प्रकार है कि वेदोक्त स्वधर्माचरण करना, पूर्ण वैराग्य
रखना और अत्यन्त प्रेम से मेरा भजन करना। देहाभिमान को तत्काल दूर करने के लिये मेरा अखण्ड नामस्मरण
करते रहना चाहिये। गायन, नृत्य आदि से युक्त होकर हरि का कीर्तन करना चाहिये और समस्त प्राणिमात्र के
प्रति समान मत्स्वरूप भावना रखें। समस्त भूत मत्स्वरूप हैं इस भावना से सदासर्वदा देखने से ज्ञानस्वरूप और
सर्वव्यापी मुझ में चित्त प्रवेश करता है। मैं निरन्तर तीनों अवस्थाओं में रहता हूँ। तीनों अवस्थाओं को मैं प्रकाशित
करता हूँ। लेकिन तीनों अवस्थाओं से भिन्न जो मैं हूँ वह सचमुच ज्ञानस्वरूप हूँ। तीन गुणों से परे, चौथा हुए
बिना भी चौथा मैं सचमुच ज्ञानस्वरूप हूँ। ऐसे मुझमें जो अपना चित्त रखता है वह ऐसा करते ही मत्स्वरूप हो
जाता है। सांसारिक चिन्ताएँ दूर होकर विषयावस्था समाप्त हो जाती है। उस समय चित्त, चिन्ता और चिन्तन,
विषयवासना व अभिमान इन सबका विनाश होकर स्वानंदघन मैं स्वयं ही प्रकट होता हूँ। द्वैत की भावना टूटे
बिना जो स्वयं को ज्ञानी समझता है और वृथा ज्ञान का अभिमान करता है वह भी अज्ञानी ही है।
यावन्नार्थेधीः पुंसो न निवर्तेत युक्तिभिः ।
जागर्त्यपि स्वपन्नज्ञः स्वप्ने जागरणं यथा ॥ ३०॥
अनेक वर्ण, अनेक व्यक्ति, विविध गोत्र, विभिन्न जातियाँ, अधम व उत्तम विधि के प्रकार इन सबसे चित्त
में दृढ़तर भेद उत्पन्न हो जाते हैं। मैं काला, गोरा, साँवला, उत्तम ज्ञान से श्रेष्ठ मैं, उत्तम पवित्र कृति मेरी, मेरा
कुल श्रेष्ठ और मैं उत्तम कुलवान इस प्रकार का भेद मन में उत्पन्न होने पर अद्वैत बताने वाली श्रुति देखकर या
शास्त्रार्थ की युक्ति सुनकर भी जिन साधकों के मन से भेद की निवृत्ति नहीं होगी उसका ज्ञानाभिमान व्यर्थ है।
उसका कर्माचरण व्यर्थ है। जागृत अवस्था में होने पर भी उसे सोया हुआ समझना चाहिये। उसमें जागृत अवस्था
है ही नहीं। तब देहाभिमान दृढ़ होता है उस समय उसने मानो धतूरे का सेवन किया रहता है और वह अत्यन्त
भ्रमजाल में फँस कर मानो अविद्यारूपी प्रदीर्घ सपना देखता रहता है। नींद में कहे गये शब्दों का जैसे कोई अर्थ
नहीं निकलता उसी प्रकार केवल पठन करने से परमार्थ प्राप्त नहीं होता। इतना ही नहीं बल्कि श्रुति शास्त्रों का
वास्तविक अर्थ भी उनकी समझ में नहीं आता। नित्य वेदाध्ययन करते हैं, अरण, ब्राह्मण, सूत्र, निरुक्त का पाठ
करते हैं लेकिन यदि कामक्रोध की निवृत्ति नहीं होती तो उस पठन से परमार्थ की प्राप्ति कभी नहीं होगी। मन में
देहाभिमान रखकर और भेद दृष्टि रखकर सहस्र वेदशास्त्र का पठन करने से भी परमार्थ की प्राप्ति कभी नहीं
होगी। जो स्वप्न में ही जागता है और स्वप्न में ही वेदशास्त्र पढ़ता है उसे जाग्रत कहने पर भी वह सोया हुआ
है। उसी प्रकार शास्त्रज्ञों का व्यवहार रहता है। देहाभिमान के साथ सभी भेद भावनाओं का जब तक विलय नहीं
होता तब तक आत्मज्ञान प्राप्त नहीं होगा। क्योंकि भेद ही सबसे बड़ा बन्धन है। सनकादिकों की ही शंका ध्यान
में रखकर, सबकी समझ में ठीक से आ सके ऐसी भाषा में वेदों का अर्थ भगवान अच्छी तरह समझाने लगे।
स्वयं ही सारा भेद प्रकट कर तुम्हारा वेद जोर-जोर से गर्जना कर रहा है। भेद का प्रतिपादन तो वेद ने ही किया
है और वेद का कथन तो असत्य नहीं होता। वेद का वचन सत्य ही है और उसे मान्य करना चाहिये यह तुम्हारा
ही कथन है तो उस वेद को असत्य कैसे कहा जाय? वेदज्ञा सबमें श्रेष्ठ है। वेद ने ही क्रिया और कर्म का
प्रतिपादन किया है। सारे वर्णाश्रम अपना स्वधर्म वेद के ही बल पर चलाते हैं। वेद को जो झूठा कहेगा वही
वास्तव में वेद बाह्य है यह तुमने ही कहा है। उस वेद को झूठा कैसे मानूँ? यदि ऐसी शंका हो तो उसके सम्बन्ध
में मैं ही तुम्हें वेद वचनों के भिन्न-भिन्न भागों का विचार सुनाता हूँ। अविद्यात्म भेद जिसमें प्रबल हुआ रहता है