श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
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उसी प्रकार समझना चाहिये क्योंकि मेरी वाणी को स्वर देने वाला जनार्दन है। उस जनार्दन की कृपादृष्टि से
भागवत देशी भाषा में सुना रहा हूँ। सहस्त्रों ग्रन्थों का अध्ययन करने के उपरान्त भी उनमें भागवत का ज्ञान
दृष्टिगोचर नहीं होता। वही यह श्रीमद्भागवत है। उसमें का 'हंसगीत' नाम का जो ज्ञान है उसे जनार्दन की कृपा
से देशी भाषा में सुनाया। एकनिष्ठा से मेरी भक्ति करने से ज्ञानरूप खड्ग की प्राप्ति होती है और उसी शस्त्र से
संसार की आसक्ति को छेद कर मेरे भक्तों को सायुज्य मुक्ति प्राप्त होती है। मेरे भजन से ही मोक्ष प्राप्त होता है
यह बात उद्धव ने भगवान से सुन रखी थी। उसने मन में विचार किया कि भगवान भजन को ही मोक्ष का साधन
बताते हैं लेकिन ज्ञानी लोग मोक्ष प्राप्ति के लिये भिन्न-भिन्न साधन बताते हैं। तो इन दोनों प्रकारों में मोक्ष प्राप्ति
का श्रेष्ठ साधन क्या है ? वही शंकायुक्त प्रश्न उद्धव ने स्वयं ही श्रीकृष्ण से पूछा।
उद्धव उवाच
वदन्ति कृष्ण श्रेयांसि बहूनि ब्रह्मवादिनः ।
तेषां विकल्पप्राधान्यमुताहो एकमुख्यता ॥ १ ॥
उद्धव ने कहा, हे श्रीकृष्ण ! मोक्षमार्ग के कितने साधन हैं ? वेद वाले तो अनेक साधन बताते हैं। क्या वे
साधन समान योग्यता के हैं कि उसमें एक श्रेष्ठ और एक गौण है ? आपने तो मुक्ति के लिये भक्ति का ही कारण
बताया था।
भवतोदाहृतः स्वामिन् भक्तियोगोऽनपेक्षितः ।
निरस्य सर्वतः सङ्गं येन त्वय्याविशेन्मनः ॥ २॥
भक्त अन्य साधनों की आशा ही नहीं करते। सारे संगों का त्याग करते हैं क्योंकि जिसके योग से तत्काल
आत्मस्वरूप की प्राप्ति होती है ऐसी भक्ति ही मोक्षमार्ग में प्रमुख है। मेरे स्वरूप पर ध्यान रखकर फल की आशा
छोड़ मेरा भजन करना यही मोक्ष का मुख्य साधन है यह बात भगवान ने स्वयं ही कही थी। भगवान ने तो भक्ति
को ही मुख्य साधन बताया था अतः अन्य साधनों से आत्मस्वरूप की प्राप्ति होती है या नहीं यह ईश्वर स्वयं ही
बतायें। इसी प्रश्न का विचार कर भगवान श्रीकृष्ण विवरण के साथ कहने लगे। उन्होंने कहा-ज्ञाता का स्वभाव
त्रिगुणात्मक होने के कारण वह अपनी रुचि के अनुसार साधन स्वीकार करता है। जिस गुण में उसकी रुचि होती
है उसी साधन को वह ठीक मानता है। ज्ञान का अभिमान करने वाले इस प्रकार अनेक साधनों की बातें करते
रहते हैं। उद्धव ! यही परम्परा अनेक दिनों से चली आने के कारण अब मलिन हो गयी है। उसके फल क्षुद्र होते
हैं फिर भी उसी ज्ञान को वे सच्चा मानते हैं। उसका स्पष्ट रूप से श्रवण करो। चौदहवें अध्याय का प्रतिपादन
करते समय श्रीकृष्ण विस्तारपूर्वक इस विषय का निरूपण करेंगे कि ध्यानयोगस्थिति तथा समाधि से युक्त जो
भक्ति है वही सभी साधनों में प्रमुख है। अन्य साधनों में फल की इच्छा रहती है इसलिये वे तुच्छ हैं। इसे
श्रीकृष्ण सात श्लोकों में, अपनी वाणी में सुना रहे हैं।
श्रीभगवानुवाच
कालेन नष्टा प्रलये वाणीयं वेदसंज्ञिता ।
मयाऽऽदौ ब्रह्मणे प्रोक्ता धर्मो यस्यां मदात्मकः ॥ ३ ॥
मेरी वेदवाणी स्पष्ट है। ज्ञानरूपी प्रकाश से वह अत्यन्त उज्ज्वल हो गयी है। प्रलयकाल में जब सत्यलोक