श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३९० श्रीमद् एकनाथी भागवत
उस व्यक्ति को वह सच भी मालूम हुई तो भी जागृति में आने पर वह उसी अवस्था में नहीं आता अथवा
स्वप्नावस्था में रहने वाले व्यक्तियों को समाधि में बड़ा सम्मान प्राप्त हो जाय लेकिन वह सम्मान उसे जागृत
अवस्था में नहीं प्राप्त होगा। वास्तव में वह सो गया है यही समझना चाहिये। उसी प्रकार तटस्थता को समाधि
कहना ही अविद्या है। वह अविद्या स्वप्न और मूर्च्छा का स्वरूप है। वह आत्मस्वरूप ज्ञान में जागृत नहीं हुआ है
यही समझना चाहिये। जागृत होकर जब वह स्वप्न की ओर देखता है तो उसे झूठा ही मानता है। क्या उसमें
उसका देह भी सत्य था ? अमर वह सत्य है तो फिर उसमें तटस्थता आ सकती है ऐसा प्रश्न उसके मन में आता
है। जो सचमुच जागृत होने के बाद उस स्वप्न के देह को अपनी कल्पना से तटस्थता देने का प्रयास करता है
उसे तब लज्जा होने लगती है। उसे इसमें इससे अधिक महत्त्व नहीं मालूम होता। वह जागृत होने पर जिस स्वप्न
का वर्णन करता है वह असत्य रहता है। वह उसे स्पर्श भी नहीं करता। उसी प्रकार जिसे सचमुच परब्रह्म की ही
प्राप्ति होती है वह भी देह की स्थिति में लिप्त नहीं होता। तो फिर उसका देह किसके बल से क्रियाएँ करता है ?
वह शेष प्रारब्ध की गति से क्रियाशील रहता है। अग्निपात्र का अग्नि भले ही बुझ जाय लेकिन जमीन में उसकी
उष्णता कायम रहती है। कपूर भले ही जल जाय लेकिन उस स्थान पर उसका सुवास कायम रहता है। पालने
को झुलाने वाला आदमी भले ही थक जाय लेकिन पालना अपनी पूर्व गति के कारण चलता रहता है। उसी
प्रकार अविद्या का नाश होने पर भी प्रारब्ध तो शेष रहता ही है। उसी शेष प्रारब्ध से मुक्तों का देह चलता रहता
है। शरीर के ही कारण छाया हिलती है किन्तु शरीर छाया से भिन्न ही रहता है। इस प्रकार मुक्तों का देह मिथ्या
होता है और वह प्रारब्ध के सहारे व्यवहार रहता है। पुरुष के साथ जो छाया रहती है वह किसी कारण से नहीं
बल्कि सहज ही रहती है। उसी प्रकार ज्ञाता के साथ देह भी मिथ्या रहता है। जिस प्रकार जमीन पर पड़ा हुआ
पत्ता हवा के योग से हिलता है, उसी प्रकार देह भी पूर्व कर्म के अनुसार व्यवहार करता है। लेकिन ज्ञाता देहकर्म
के स्पर्श से मलिन नहीं होता। भले ही वह प्रारब्ध के अधीन रह कर पूरे संसार के साथ बातें करता रहे अथवा
मौन साध कर आनन्दपूर्वक गिरि कंदराओं में पड़ा रहे। भले ही वह सारे कर्म करे अथवा भ्रम के कारण पागल
हो जाये लेकिन वह प्रारब्ध के कारण प्राप्त स्थिति के अनुसार आचरण करता रहता है। वह पालकी में रहे
अथवा हाथी के गंडस्थल पर विराजमान हो या विष्टामूत्र में पड़ा रहे वह उसे स्थिति प्रारब्ध के कारण ही मानता
है। जिसमें बाध्य और बाधकता समाप्त हो जाती है, अहंकार की अविद्या समाप्त हो जाती है, उसकी उस स्थिति
को ही 'स्वभावसिद्ध समाधि' के नाम से जाना जाता है। सभी सिद्धान्तों का यही सारांश है। जिसे इस प्रकार की
प्राकृतिक समाधि अवस्था प्राप्त होती है वही सारे भोग भोग कर अभोक्ता बना रहता है और सारे कर्म करके भी
अकर्ता बना रहता है। वह क्रिया और कारण के संयोग से विषयोपभोग में लिप्त दिखायी देता है लेकिन इससे
उसकी समाधि अवस्था भंग नहीं होती। भोगों का भोग करते हुए भी वह अलिप्त ही रहता है। उसकी स्त्री उसे
मेरा पति कहती है, पुत्र उसे मेरा पिता कहता है शिष्य उसे 'मेरा सच्चा गुरु' कहता है। किन्तु वह इन सारे
सम्बन्धों से दूर रहते हुए भी उन सब में विचरण करता रहता है। अथवा जिस प्रकार लकड़ी से ही अग्नि उत्पन्न
होती है, लकड़ी में ही रहती है लेकिन यदि कोई कहे कि लकड़ियाँ उसे अपने अधीन रखती हैं तो वह उनके
नियंत्रण में नहीं रहतीं अथवा जो फूँकने से ही प्रकाश देने लगता है, जो फूँकने से ही उत्पन्न होता है वही दीपक
फूँक से बचने पर सुरक्षित स्थान पर दीपक के रूप में टिक पायेगा। उसी प्रकार कर्म से उत्पत्ति होती है, कर्म से
ही परब्रह्मप्राप्ति होती है लेकिन महान योगी उस कर्म में भी निष्कर्म स्थिति में व्यवहार करते रहते हैं। वह लोगों
में भले ही गृहस्थ दिखायी दे अथवा जंगल में पागलों की तरह नाचता फिरे या एकांत में शान्त पड़ा रहे लेकिन