श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३९२ श्रीमद् एकनाथी भागवत
सच्चा स्वरूप है। देखो! जिस सत्य में संत सद्धर्म से आचरण करते हैं अथवा इच्छारहित जो वाणी होती है वह
भी मुझसे भिन्न नहीं हो सकती। तेज की वह प्रगल्भता मेरे ही कारण प्रकाशित हुई है। अथवा लक्ष्मी को जो
ऐश्वर्य प्राप्त हुआ है वह सचमुच मेरे ही कारण से है। साधु लोग कीर्ति को जो सम्मान देते हैं वह मेरे कीर्तन के
कारण ही प्राप्त होती है। मेरे सिवा उस कीर्ति को कोई स्वीकार नहीं करेगा। निग्रहता मेरे ही प्रभाव से सब से
निग्रह कराती है। मेरे सामर्थ्य से वे अदम्य का भी नमन करते हैं। ध्येय और ध्यान; अथवा साध्य और साधन;
इन सब के लिये आश्रय का स्थान मैं ही हूँ। मेरे सिवा उन्हें कार्य की प्रेरणा कैसे मिलेगी ? आप अत्यन्त श्रेष्ठ
ब्राह्मण हैं, आप मेरे लिये भी पूज्य हैं इसलिये मेरा शुद्ध आत्मज्ञान आपको स्पष्ट रूप से बताया।
मां भजन्ति गुणाः सर्वे निर्गुणं निरपेक्षकम्।
सुहृदं प्रियमात्मानं साम्यासङ्गादयोऽगुणाः ॥ ४० ॥
वास्तव में मैं इच्छारहित तथा निर्गुण हूँ। मेरे गुणों की कल्पना से मेरी भक्ति कर वे मुझे सुहृद, आत्मा, प्रिय
आदि लक्षण लगाते हैं। समता और निःसंगता आदि गुणों की अवस्थाएँ भी मुझे लगाते हैं। जरा देखो! क्या कभी
अन्धकार अपनी पराक्रमी सेना लेकर सूर्य का मुकाबला करने के लिये खड़ा हुआ है ? फिर भी वह जिस प्रकार
सूर्य को अन्धकार का विनाश कह कर महिमा मण्डित करता है या क्या कभी किसी ने घर में आकाश को भरने
का प्रयास किया है ? फिर भी घर के ही कारण आकाश को घटाकाश यह नाम प्राप्त हुआ है। चन्द्रमा घर को
स्पर्श नहीं करता सदा आकाश में ही रहता है फिर भी घर चन्द्रमा को घटचन्द्र बनाता है और मूर्ख उसी को सच
मान लेते हैं। फिर भी, मैं निर्गुण होते हुए वे मेरे गुणों की कल्पना से भजन कर मुझे सुहृद, आत्मा, असंग आदि
विशेषणों से अलंकृत करते हैं। मैं गुणों को स्पर्श भी नहीं करता फिर भी वे मुझे लीलाधारी कहते हैं। इस प्रकार
गुण ही गुणों के पास रहते हैं, मुझ पर केवल आरोप लगता है। अतः मैं न लेने वाला हूँ, न देनेवाला हूँ। मैं न
कर्ता हूँ न करवाने वाला। मेरा यह स्वभावधर्म है। अन्य अवस्था गुणों की है। इस प्रकार ज्ञान और विज्ञान का
जो पहले से चला आ रहा विलक्षण स्वरूप है उसका उपसंहार अब श्रीकृष्ण स्वयं कर रहे हैं।
इति मे छिन्नसन्देहा मुनयः सनकादयः।
सभाजयित्वा परया भक्त्यागृणत संस्तवैः ॥ ४१ ॥
आत्मज्ञानी, अत्यन्त कुशल, मुमुक्षुओं में अत्यन्त श्रेष्ठ सनकादिक सन्देहयुक्त हो गये थे। मैंने उन्हें इस
प्रकार निःसन्देह किया वे सदा सावधान, शुद्ध, मेरे भजन के प्रति प्रेमभाव रखने वाले, निरन्तर मत्स्वरूप में
रहकर मनन करने वाले और उपदेश सुनने से कभी न ऊबने वाले थे। मेरा यह उपदेश सुनते ही वे तत्काल मेरे
गले लग गये और तत्काल मत्स्वरूप हो गये। ऐसे वे ब्रह्मपुत्र संसार में अत्यन्त धन्य हैं। मेरे उपदेश के कारण
उन्होंने दृश्य, द्रष्टा और दर्शन इस त्रिपुटी का शून्य कर डाला और वे पूर्णरूप से ब्रह्मस्वरूप हो गये। उन्हें
अत्यन्त समाधान प्राप्त हुआ और उन्होंने गद्य-पद्य में मेरा स्तवन कर मेरी पूजा प्रारम्भ कर दी।
तैरहं पूजितः सम्यक् संस्तुतः परमर्षिभिः ।
प्रत्येयाय स्वकं धाम पश्यतः परमेष्ठिनः ॥ ४२ ॥
यद्यपि उनकी पूज्यता और पूजकता ये वृत्तियाँ नष्ट हो गयी थीं फिर भी उन्होंने गुरु की पूजा की। द्वैत का
भ्रम त्याग कर उन्होंने परम भक्तिभाव से मेरी पूजा का प्रारम्भ किया। शिष्य भले ही ब्रह्मस्वरूप हो जाय लेकिन