श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंतेरहवाँ अध्याय ३८१
उसी के लिये मैंने वेद का यह नियम लगाया है। किन्तु जो भक्त मेरे स्वरूप में एक हो जाता है उसके आगे
वेदवचन लाचार हो जाते हैं। वेद तीन गुणों से व्याप्त हैं और अभेद भजन के कारण भक्त निर्गुण बन जाता है
अतः उसे मेरी आज्ञा के कारण वेद का बन्धन नहीं रह जाता। राजा का प्रिय चाकर हो तो पहरेदार उसे नहीं
रोकता अथवा किसी दासी को राजा की गोद में बैठने का अधिकार प्राप्त हो तो बड़े-बड़े प्रधान भी उसे सम्मान
देते हैं। माँ भी अपनी कन्या को सिखाती है कि दूसरों के सामने पति से भी लज्जा करनी चाहिये लेकिन एकान्त
में लज्जा छोड़ देनी चाहिये। भेदों की भेदभावना जब तक प्रबल रहती है तब तक वेदों के वचन का उल्लंघन
नहीं हो सकता। लेकिन मेरे अभेद भावना धारण करने वाले जो भक्त हैं उनके लिये कोई भी नियम बाधक नहीं
होता। जिस प्रकार सूर्योदय के आगे चन्द्रमा का तेज फीका रहता है उसी प्रकार आशा अविद्या रूप में बाधक
होती है। उसे नष्ट कर देने पर वेदों की बाधा नहीं होती।
असत्त्वादात्मनोऽन्येषां भावानां तत्कृता भिदा।
गतयो हेतवश्चास्य मृषा स्वप्नदृशो यथा॥३१॥
जो गुरुकृपा से ज्ञानसम्पन्न होता है, उसे देह की भावना बाधक नहीं होती। उसके लिये प्रपंच का दर्शन
मिथ्या होता है और कर्म करने पर भी उसे कर्त्ता नहीं होना पड़ता। वर्ण और आश्रम अज्ञान की ही उपज हैं
इसलिये उसमें का क्रियाकर्म भी अज्ञानात्मक ही रहता है इसलिये उस वर्णाश्रम का वेदोक्त धर्म अज्ञानी के ही
मन में अविद्या का भ्रम उत्पन्न करता है। किन्तु ज्ञानसम्पन्न भक्तों में वह अविद्या बिलकुल नहीं होती। फिर उनमें
वेद विधान को स्थान कहाँ? आम के वृक्ष पर जब तक फल लगे रहते हैं तभी तक उनकी रखवाली की जरूरत
पड़ती है लेकिन एक बार फल हाथ में आ जाए तो रखवाली निष्फल सिद्ध होती है। उसी प्रकार जब तक अज्ञान
का बन्धन है तभी तक वेदों का विधान है। वह अज्ञान ही जब नष्ट हो जाता है तब वेदविधान वह स्थान छोड़
देते हैं। अज्ञान नष्ट होकर जब देह आचरण करता है तो देह का देहत्व से कोई हेतु नहीं होता। लेकिन आप
कहेंगे कि ऐसा कुछ होगा ही नहीं। तो उसके सम्बन्ध में भी बताता हूँ। सुनो। स्वप्न में देहादिक प्रपंच का भान
स्वप्न में ही सच होता है। कुछ संस्कारों से स्वप्न आने पर भी नींद खुलने पर वह सब व्यर्थ लगने लगता है।
किसी व्यक्ति को यदि स्वप्न में राजपाट मिल जाय या वह बाघ के मुँह में पड़ जाय अथवा उसे धन का लाभ हो
कर अमूल्य रत्न मिल जाए तो वहाँ का सुख, दुःख अथवा हर्ष नींद खुलने पर नहीं होता। उसी प्रकार ज्ञानी को
भी आत्मज्ञान के कारण अज्ञानात्मक कुछ भी बाधक नहीं होता। देह में रहकर भी विदेह स्थिति धारण करने के
जो ज्ञानदायक उपाय हैं, उस भेद का नाश करने के लिये भगवान स्वयं बता रहे हैं।
यो जागरे बहिरनुक्षणधर्मिणोऽर्थान् भुङ्क्ते समस्तकरणैर्हृदि तत्सदृक्षान्।
स्वप्ने सुषुप्त उपसंहरते स एकः स्मृत्यन्वयात्त्रिगुणवृत्तिदृगिन्द्रियेशः॥ ३२॥
तीनों अवस्थाओं में देह में आत्मा एक ही रहता है। वही देह में विदेही होकर सबका साक्षी है। मैं बच्चा
था, फिर युवा हुआ और अब वृद्ध हो गया हूँ। इस प्रकार उम्र की साक्ष्य हम स्वयं देखते रहते हैं। जागृत अवस्था
में वह अनेक प्रकार के सुखोपभोग अनेक प्रकार से भोगता है और उन्हीं का स्वप्न में अपने हृदय में अच्छे ढंग
से विस्तार करता है। जागृति में भोग का जो संस्कार घटता है उसी का स्वप्न में विस्तार होता है। स्वप्न में
मनोमय विश्व उत्पन्न कर अपने हृदय में उसी का विस्तार बढ़ाता है। हाथी, घोड़ा, गधा, पुरुष, पर्वत, नगर,
बड़ी-बड़ी नदियाँ, समुद्र आदि वासनाओं को स्वप्न में देखता है। वही सुषुप्ति में, न जागृति न स्वप्न ही ऐसी