सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
संग्रह पर लौटें

श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

सातवाँ अध्याय १८३

के अनुसार वह सबको कोमल और मधुर मालूम होता है। प्राणि पवित्र हो सके इसीलिये तीर्थ स्थानों में जल में
पवित्रता होती है। योगियों के शरीर में भी रात दिन इतने लक्षण होने चाहिये। मैले शरीर से जो भी कोई जल में
प्रवेश करता है उन्हें वह अपने स्वभाव धर्म से निर्मल कर छोड़ता है। लेकिन मैंने इन सबका मैल साफ किया
ऐसा अहंकार वह मन में नहीं रखता। उसी प्रकार योगी भी केवल भक्ति से भजन में लगे भक्त लोगों के,
कलिकालजन्य पापों का विनाश करके भी गुरुत्व का अहंकार नहीं धरते। उससे जो भी कोई मिलता है, उसके
साथ उसका व्यवहार इतना कोमल रहता है कि भले ही उसके प्राण चले जाएँ लेकिन उसके मन में प्राणिमात्र के
प्रति कठोरता नहीं उत्पन्न होती। चकोर के लिये जिस प्रकार चन्द्र किरण है अथवा पक्षी के बच्चों के लिये उसकी
माताओं के पंख हैं या जीवों के लिये जीवन है, उसी प्रकार उसकी सबके प्रति मृदुता रहती है। उदक केवल
बाह्य मल को स्वच्छ करता है लेकिन योगी यह अंतर्बाह्य दोषों का क्षालन कर उसे भीतर और बाहर से शुद्ध
करता है। उदक केवल एक ही बार सुखी करता है लेकिन योगी सभी काल सुख प्रदान करता है। उदक का
सुख रहता ही कितना है? क्षणभर के बाद पुनः प्यास लगती है किन्तु योगी आत्मानन्द से इस प्रकार तृप्त कर
देता है कि उस सुख में पुनः बाधा नहीं आती। उदक का माधुर्य केवल जिह्वा को ही मालूम होता है लेकिन योगी
का माधुर्य सारी इन्द्रियों को तृप्त कर देता है। योगी की मिठास एक बार मालूम हो जाय तो उसके आगे अमृत
का स्वाद भी फीका मालूम होता है। वह घड़ी आधी घड़ी में ब्रह्मदेव अथवा इन्द्र के पदों को भी ठुकरा देती है।
धूप से संतप्त लोग जब जल के पास आते हैं तो वह अपने स्पर्शमात्र से उन्हें शीतल कर छोड़ता है। योगी की
स्थिति भी वैसी ही है। वह भी अपने स्पर्श से सबका ताप दूर करता है। उदक जिसे शान्त करता है, उसे पुनः
ताप होता ही है लेकिन योगी कृपा करके जिसे स्पर्श करता है, वह त्रिविध तापों से भी मुक्त हो जाता है। योगी
जिसका ताप हरते हैं उसे जीवनपर्यन्त पुनः ताप नहीं होता। वह शान्ति में ही रम जाता है और स्वानुभव में डोलता
है। मेघ के मुख से उदक का अधःपतन होता है और उसके नीचे आने से ही सारे लोग शान्त होते हैं और उन्हें
अन्नदान भी मिलता है। योगी इस लोक में इसीलिये जन्म लेते हैं कि लोग श्रवण-कीर्तन से तृप्त हो जाएँ और
आत्मज्ञान से उनका उद्धार हो सके। पर्जन्य का जल देखते ही जिस प्रकार सब लोग प्रसन्न हो उठते हैं अथवा
गंगादि तीर्थों का दर्शन करने से जिस प्रकार पापों का क्षालन होता है, उसी प्रकार योगियों का दर्शन भी बिना
भाग्य के नहीं होता। उसके चरणों का जो दर्शन करता है वह भवरोगों से मुक्त हो जाता है। उसका दर्शन या
स्पर्श न हो सके तो उसका नामस्मरण करना चाहिये ताकि केवल उतने से ही वह नाम संसार के मूल में छिद्र
कर देगा। भगवान का कीर्तन करने के बजाए भक्त का नामस्मरण करने से संसार बन्धन कैसे टूटेगा यह नहीं
पूछना चाहिये। सच तो यह है कि भगवान का कोई नाम ही नहीं होता। भक्तों ने उसकी प्रतिष्ठा के अनुरूप उसे
नाम, रूप आदि विलास अर्पित किये हैं। इस प्रकार भक्तों ने ही भगवान की प्रतिष्ठा बढ़ायी और उसे वैकुंठ में
बैठाया। ऐसे भक्त के उपकार से ही वह झुक जाता है और उसकी आज्ञा में रहता है। भक्त के वचन के अनुसार
भगवान न नर है न सिंह है, ऐसा रूप धारण कर वह खम्भे में से प्रकट हुआ और उसने भक्त का वचन सच कर
दिखलाया। आज भी इस बात का प्रमाण है कि वह ज्ञानानंदघन भगवान अपने भक्तों के वचन के अनुसार पाषाण
में भी प्रकट होता है। भक्तों के प्रेम से भगवान झुक जाता है, भक्तों का वचन वह तोड़ नहीं सकता। इसलिये
जहाँ भक्त का नाम आता है वहाँ भगवान दौड़ कर आता है। भक्त के उपकार का ऋण चुकाने के लिये उसे
तत्काल दौड़ कर आना पड़ता है। यह कहते समय अवधूत का प्रेम भी उफनने लगता है। इसके बाद का गुरु
अग्नि है, उसके भी लक्षण बताता हूँ। उन्हें कर्ण और मन को एकत्र लाकर सुनो।

१८४ श्रीमद् एकनाथी भागवत
तेजस्वी तपसा दीप्तो दुर्धर्षोदरभाजनः।
सर्वभक्षोऽपि युक्तात्मा नादत्ते मलमग्निवत्॥ ४५॥
अग्नि अपने स्वयंभू तेज से ही देदीप्यमान रहता है। उसे हाथ में पकड़ना सम्भव नहीं है, लेकिन वही
अग्नि सबके पेट में उपस्थित रहकर अपने तेज से सब कुछ भक्षण कर लेता है। उसी प्रकार योगी भी
भगवद्भाव से दीप्त होने के कारण, देवादि भी उसे नहीं पकड़ पाते। जिस प्रकार हाथ में अंगार रखना कठिन है
उसी प्रकार योगी को पकड़ना भी अत्यन्त कठिन है। माया भी अपने गुणों से उस पर काबू नहीं पा सकती।
अग्नि के लिये जिस प्रकार मुख यही एक पात्र रहता है, उसी प्रकार योगी का एकमात्र पात्र उदर ही होता है।
किसी विशिष्ट निधि को रखने के लिये उसके पास पात्र ही नहीं होता। अग्नि जो कुछ भी सेवन करता है, उसे
वह जलाकर अपने ही जैसा कर डालता है। इसी प्रकार योगी सब कुछ भक्षण करता है लेकिन मलिनता को
स्पर्श नहीं करता। सुगन्ध से युक्त चन्दन की लकड़ी हो, अथवा दुर्गन्धयुक्त कोई अन्य लकड़ी हो, नीम की
कडुई लकड़ी हो या गन्ने की लकड़ी हो, उनका आकार-विकार आदि सब कुछ जलाकर वह उन्हें अपने जैसा
बना देता है। उसी प्रकार योगी जिस वस्तु को स्वीकार कर लेता है, उसकी ओर वह पहले आत्मदृष्टि से देखता
है, उसके सारे दोष दूर कर फिर उन पदार्थों को आत्मभाव से स्वीकार करता है। जिस भोग्य पदार्थ का भोग
करने के लिये वह जाता है, वहाँ वह स्वयं को ही देखता है इसलिये भोक्ता भी तद्रूप ही हो जाता है। यही योगी
का भोग है। अग्नि में जो मैली वस्तु पड़ती है वह अग्निमुख से निर्मल ही हो जाती है। उसी प्रकार योगी भी जो
थोड़ा-बहुत सेवन करता है वह परमपवित्र ही हो जाता है। अग्नि के मुख में आहुति पड़ने से यज्ञ होता है और
उस कर्म से स्वर्ग प्राप्त होता है लेकिन योगी के मुख में जो पड़ता है उससे आत्मपद ही प्राप्त होता है। हे राजा!
अग्नि का एक और भी लक्षण है। वह भी ठीक से सुन लो। वही साधक का साधन और सिद्धों का लक्षण है।
क्वचिच्छन्नः क्वचित्स्पष्ट उपास्यः श्रेय इच्छताम्।
भुङ्क्ते सर्वत्र दातॄणां दहनप्रागुत्तराशुभम् ॥ ४६ ॥
होमकुण्ड में दबाया हुआ अग्नि भीतर तेजस्वी होता है किन्तु ऊपर से राख से ढँका रहता है, अथवा
यज्ञशाला में उसे प्रज्ज्वलित कर याज्ञिक लोग बड़ा यज्ञ भी करते हैं। उपासक के मन में जैसी भावना रहती है,
वैसा श्रेय वह उसके लिये उत्पन्न करके देता है और पहले के सारे पापों को जलाकर हवि ग्रहण करता है। उसी
प्रकार योगी की लीला भी भक्तों के नेत्रों में प्रकट होती है। किसी से वह बिल्कुल गुप्त रहता है, आँखों से
दिखायी भी नहीं देता। ऐसे लोगों की जगह लोग भक्ति के बल पर जो भी अर्पण करते हैं उससे मुमुक्षुओं को
मोक्ष प्राप्त होता है। योगी के मुख में उसके पड़ते ही सारे संचित सुख-दुःखों को जलाकर उसे आत्मपद दिला
कर सुखी करता है। हे राजा! जिसके योग से सगुण और निर्गुण समभाव से एकरूप दिखायी देते हैं ऐसे अग्नि
का एक और लक्षण तुम्हें बताता हूँ।
स्वमायया सृष्टमिदं सदसल्लक्षणं विभुः।
प्रविष्ट ईयते तत्तत्स्वरूपोऽग्निरिवैधसि ॥ ४७॥
स्वभावतः अग्नि निराकार ही है। लकड़ियाँ लम्बी, टेढ़ी, गोल, बड़ी या छोटी जिस आकार की होती हैं
उसी आकार का वह मालूम होता है। भगवत्स्वरूप की जाति भी वैसी ही है। स्वमाया की कल्पना से ही
आकृतियों का निर्माण कर वह उसमें सहज रूप से घुसा रहता है इसलिये अनेक रूपों में भासित होता है। जिस

सातवाँ अध्याय १८५
प्रकार गंगा का जल एक ही होते हुए भी, भँवरा, तरंग आदि विभिन्न स्वरूपों में भासमान होता है। अथवा मण्डप
के छायाचित्र बत्तियों के प्रकाश से ही निर्मित होते हैं। राम, रावण आदि नामों से लोगों को परदे पर नाट्याभिनय
करके दिखलाते हैं। उसी प्रकार नाना प्रकार के प्राणी, नाना प्रकार के मत, नाना प्रकार की आकृतियाँ दिखायी
पड़ती हैं, उन सब में श्रीहरि ही प्रवेश कर सहज रीति से उन्हें नचाता रहता है। योगी की स्थिति भी वैसी ही
रहती है। नाना प्रकार के आकार और व्यक्ति दिखायी पड़ने पर भी वह उन सब में समदृष्टि से स्वयं को ही
देखता है इसलिये उसे किसी प्रकार भ्रम नहीं होता। वह जो भी कुछ देखता है वह सब वह स्वयं ही रहता है
ऐसी मीमांसा अवधूत ने हाथ उठा कर की। जन्म और मृत्यु इस देह का ही होता है, आत्मा यह नित्य और
अविनाशी है यह निश्चय चन्द्रमा को गुरु बना कर दृढ़ कर लिया।
विसर्गाद्याः श्मशानान्ता भावा देहस्य नात्मनः।
कलानामिव चन्द्रस्य कालेनाव्यक्तवर्त्मन ॥ ४८ ॥
शुक्लपक्ष और कृष्णपक्ष के योग से चन्द्रमा की कलाएँ बढ़ती हैं और घटती हैं लेकिन मूल चन्द्रमा को
वृद्धि या क्षय नहीं होता। वैसी ही स्थिति सच्चे योगी की रहती है। जन्म, मृत्यु आदि जो छह विकार हैं वे
सचमुच देह के ही लिये हैं। आत्मा स्वरूप से ही अविनाशी निर्विकार, अनंत और अमर है। घट स्वाभाविक रूप
से ही नाशवान है, लेकिन उसमें चन्द्रमा का प्रतिबिम्ब रहता है, उसी प्रकार अशाश्वत में शाश्वत दिखाई देता है,
लेकिन उसे नश्वर का विकार नहीं लगता। घट के साथ चन्द्रमा की उत्पत्ति नहीं होती किन्तु घट के विनाश के
साथ चन्द्रमा का विनाश नहीं होता। चन्द्रमा अपनी सहज स्थिति के अनुसार नाश तथा उत्पत्ति रहित ही होता है।
उसी प्रकार योगी आत्मस्वरूप होने के कारण देह के साथ जन्म नहीं लेता और न देह के साथ उसका विनाश
होता है। वह अखण्ड रूप से परिपूर्ण ही रहता है। काल की गति अत्यन्त गहन है। उसी के कारण नाश और
उत्पत्ति हुई दिखाई पड़ती है। लेकिन काल का यह प्रभाव शरीर पर है, आत्मस्थिति पर वह लागू नहीं होता।
सारांश यह कि काल का सामर्थ्य अगाध है यह जो कहा जाता है वह देह के कारण ही। आत्मस्थिति की ओर
देखा जाए तो वहाँ काल रहता ही नहीं है। काल की सूक्ष्म गति का विवेचन करते हुए अवधूत को सहसा स्मरण
हुआ और उसने सिंहावलोकन करते हुए अग्नि का पुनः उदाहरण दिया।
कालेन ह्योघवेगेन भूतानां प्रभवाप्ययौ।
नित्यानापि न दृश्येते आत्मनोऽग्नेर्यथार्चिषाम् ॥ ४९ ॥
उस काल की नदी की गति अत्यन्त प्रचण्ड है। उसकी गति अत्यन्त सूक्ष्म है। उसमें प्राणीरूप तरंगें उठती हैं
और टूटती हैं लेकिन यह जगत को दिखायी नहीं देता। इस नदी में जरा से जर्जर हुए लोगों का कचरा तैरता रहता
है और षड्विकाररूप भयंकर भँवरे उसमें घूमते रहते हैं। बाह्य और युवावस्था की उछाल चलती रहती है। वार्धक्य
का जल मन्द गति से बहता रहता है और जन्म-मरण की लहरें उछल-उछल कर शोर मचाती रहती हैं। प्रवाह की
धारा के प्रहार से जीवन के बुर्ज ढहते हैं। स्वर्गादि मन्दिर तोड़कर शिखरों पर स्थित इन्द्रों को भी वह प्रवाह वेग
नीचे गिराता है। यही जल पाताल में प्रवेश करता है और सर्पों का संहार कर उनकी हड्डी-पसली एक कर देता है।
काल के ऐसे प्रवाह में भूत तरंगों का बनना-टूटना रात-दिन निरन्तर चलता रहता है। लेकिन मजे की बात है कि
यह सब किसी के ध्यान में नहीं आता। महाप्रलय के समय जब प्रलयमेघों की गर्जना होती है, तो उस समय भयंकर
बाढ़ आती है और उसमें ब्रह्मदेवादि अनेक बड़े-बड़े वृक्ष टूट कर, जड़ के साथ उखड़ कर बह जाते हैं। वहाँ काल

१८६ श्रीमद् एकनाथी भागवत
भी प्रवेश नहीं कर पाता। सब कुछ अकस्मात ही हो जाता है। कालरूप इस नदी की जाति बड़ी विचित्र है। अत्यन्त
सूक्ष्म होने के कारण उसका निश्चित स्वरूप ध्यान में नहीं आ पाता। उस सूक्ष्म गति की यथार्थ स्थिति अब जान
लो। कहते हैं दीप वही है लेकिन उसकी शिखा क्षण प्रतिक्षण विलय होती है और दूसरी उत्पन्न होती है। लेकिन
यह सूक्ष्म बात लोगों की समझ में नहीं आती और अन्त में वह दीप बुझ जाता है। नदी का पानी जो प्रतिक्षण बहता
रहता है वह भी सदा नया ही रहता है लेकिन अनाड़ी लोग सारा पानी एक ही समझते हैं। उसी प्रकार काल की गति
सब की समझ में नहीं आती। यदि देह को ही देखा जाय तो काल उसे ग्रसता ही रहता है। बाल्य, कौमार्य अथवा
युवावस्था में काल भी निकट ही रहता है लेकिन कोई उसे नहीं देखता। इसीलिये मैंने काल सूर्य को गुरु बनाया।
उससे मैंने क्या सीखा यह भी सुन लो।
गुणैर्गुणानुपादत्ते यथाकालं विमुञ्चति।
न तेषु युज्यते योगी गोभिर्गा इव गोपतिः ॥५०॥
सूर्य धीरे-धीरे अपनी किरणों से रसों के साथ पृथ्वी पर के समुद्र आदि का पानी सोख लेता है और वही
बरसात में उस जल की वृष्टि कर लोगों को अनेक प्रकार से तृप्त कर देता है। किन्तु सूर्य अपने किरणों से जो
शोषण क्रिया करता है वह किसी की समझ में नहीं आती फिर भी मेघों के द्वारा वृष्टि कराकर वह समस्त लोगों
के साथ पृथ्वी को शीतल कर देता है। योगियों की बात भी वैसी ही है। वह थोड़ा बहुत जो किसी से लेता है
उसका कल्याण करने के लिये हजार प्रकार से उसके मनोरथ पूरे करता है। आत्मानन्द में निमग्न योगी जिस
किसी का भी कुछ सेवन करते हैं, उनके सारे मनोरथ परिपूर्ण होते हैं और अन्त में वे उन्हें निष्काम कर
विश्रामस्थल तक ले जाते हैं। इस प्रकार योगी अपने योगबल से इन्द्रियों के द्वारा विषयों का सेवन करते रहते हैं।
उन्हें यदि कोई कुछ देता है तो वह योग्य समय पर कृपा के बल से सन्तुष्ट कर देते हैं। उनमें विषय देते समय
या लेते समय किसी प्रकार की आसक्ति नहीं होती। जल का शोषण करते समय या वर्षा के रूप में उसे वापस
करते समय सूर्य जिस प्रकार अलिप्त रहता है उसी प्रकार वे भी अलिप्त रहते हैं।
बुद्धयते स्वेन भेदेन व्यक्तिस्थ इव तद्गतः।
लक्ष्यतेस्थूलमतिभिरात्मा चावस्थितोऽर्कवत् ॥५१॥
जलाशय में सूर्य का प्रतिबिम्ब दिखायी देता है इसलिये मूढ़ लोग कहते हैं कि सूर्य जलाशय में डूब गया।
यदि उसमें का पानी हिलता है तो समझते हैं कि सूर्य ही हिल गया और यदि जल गन्दा होता है तो मानते हैं कि
सूर्य गन्दा हो गया। लेकिन सूर्य उस जलाशय का स्पर्श भी नहीं करता और आकाश में निर्बाध रूप से रहता है,
उसी प्रकार योगी की योग्यता देहकर्म में रहते हुए भी देहातीत रहती है। लोग कहते हैं कि देहबुद्धि के छंद से
योगी देह में विचरण करता है। उसी प्रकार वह देह के अनेक प्रकार के बन्धनों से बँधा रहता है, ऐसा भी वे
अपनी स्वबुद्धि से कहते हैं। उसमें देह का मिथ्याभिमान रहता है। योगी का यह गुह्यज्ञान किसी की समझ में
नहीं आता। रस्सी के साँप ने क्या किसी को काटकर मारा है? उसी प्रकार आत्मा चिदाकाश में रहते हुए मिथ्या
देह में मिथ्या रूप से ही प्रतिबिम्बित होकर देहकर्म को दर्शाता है, इसीलिये वह कर्म उसे बाधक नहीं होता।
अपना प्रतिबिम्ब वह जल में देखता है लेकिन यह नहीं कहता कि मैं जल में डूब गया हूँ। उसी प्रकार वह देह
से भिन्न है, इसका जिसे पक्का ज्ञान हो गया है वह देहकर्म से नहीं डरता। मृगजल की बाढ़ देखकर जो नाव
पकड़ने के लिये दौड़ पड़ते हैं,वे मूर्ख हैं। उसी प्रकार संसार खुद ही मिथ्या है। मूर्ख उसे भयंकर समझता है

सातवाँ अध्याय १८७
इसलिये घरबार, स्त्री, बच्चे, जमीन-जायदाद आदि पर अधिक प्रेम करना ही नहीं चाहिये। इसलिये अवधूत राजा
को कपोतपक्षी की कथा सुनाने लगे।
नातिस्नेहः प्रसंगो वा कर्तव्यः क्वापि केनचित्।
कुर्वन् विन्देत संतापं कपोत इव दीनधीः ॥ ५२ ॥
संसार दुःख का मूल कारण है, स्त्री की आसक्ति ! जहाँ स्त्री के प्रति लंपटता का जोर अधिक रहता है,
वहीं सारा दुःख रहता है। स्त्री से पुत्र होते हैं और उन पर विचित्र मोह जड़ता है। इसलिये सांसारिक लोग दुःख
के पात्र बनते हैं। आसक्ति और मोहजाल से मनुष्य पराधीन होकर पग-पग पर विलक्षण दुःख भोगते रहते हैं।
इसलिये किसी को किसी के प्रति आसक्ति अथवा स्नेह नहीं रखना चाहिये। जिसने अतिस्नेह किया उसे दुःख
भोगना ही पड़ेगा। हे राजेश्वर ! स्नेह और दुःख का परिणाम मालूम हो इसलिये तुम्हें कपोत-कपोती की कथा
सुनाता हूँ, उसे शांतचित्त होकर सुनो।
कपोतः कश्चनारण्ये कृतनीडो वनस्पतौ।
कपोत्या भार्यया सार्धमुवास कतिचित्समाः ॥ ५३ ॥
एक वन में एक कपोत पक्षी रहता था। वह कपोती के प्रेम से अत्यन्त क्षुब्ध हुआ। स्त्री सुख की लालसा
से उसने एक कठिन पेड़ देखकर उस पर अपना घरौंदा बनाया। वन में विहार करने वाले उस कपोत ने स्त्री के
मोह में पड़कर अपनी स्त्री की संगति में काफी समय व्यतीत किया।
कपोतौ स्नेहगुणितहृदयौ गृहधर्मिणौ।
दृष्टिं दृष्ट्याऽङ्गमङ्गेन बुद्धिं बुद्ध्या बबन्धतुः ॥ ५४ ॥
कपोत और कपोती का परस्पर बहुत प्रेम था। उनका वह प्रेम निरन्तर बढ़ता ही गया। हृदय में नित नयी
आसक्ति उत्पन्न होने लगी। वे कामुक दृष्टि से एक दूसरे की ओर देखते, अनेक प्रकार की कामचेष्टाएँ करते,
एक दूसरे को प्रेम से सहलाते, एक दूसरे को गले लगाते। तन से या मन से एक दूसरे को अलग न होते, दोनों
दो शरीर एक प्राण बनकर रहते, खाना-पीना साथ-साथ। ऐसा निरन्तर चल रहा था।
शय्यासनाटनस्थानवार्ताक्रीडाशनादिकम्।
मिथुनीभूय विस्रब्धौ चेरतुर्वनराजिषु ॥ ५५ ॥
खाते समय उन्हें जो वस्तु अत्यन्त प्रिय लगती उसे वे एक-दूसरे को खिलाते। कपोत बड़े कष्ट से जो
चीज ले आता उसे वह प्यार से अपनी स्त्री को देता। स्त्री को छोड़कर वह कहीं नहीं जाता था। एक दूजे का
हाथ थामकर वे भीतर-बाहर टहलते। वे सदा एकान्त में बैठते, दोनों एक ही जगह रहते, नाना प्रकार की क्रीड़ा
करते, नाना प्रकार के बिहार करते और आनन्दपूर्वक अनेक प्रकार के खेल खेलते। स्त्रियाँ जब एकान्त में होती
हैं तो बड़ी मीठी बातें करती हैं, पति के मन में सास-ससुर के सम्बन्ध में विकल्प भर देते हैं, देवर-भाभी की
निन्दा करती हैं और मीठी बातों से पति को भुलावा देती हैं। खैर! वे एक ही आसन पर बैठते, एक-दूसरे से
टिक कर बैठते और रात-रात भर एक ही शय्या पर सोते। इस प्रकार स्त्री समागम सुख पर विश्वास कर वे
अपने हित-अहित को भूल गये। गृहिणी के वैभव में ही वह नाचने लगा। वन उपवन में उनका समागम होता
था। घरौंदा केवल नाम मात्र के लिये था। विषय विलास सब कुछ वन में ही होता था।

१८८ श्रीमद् एकनाथी भागवत
यं यं वाञ्छति सा राजंस्तर्पयन्त्यनुकम्पिता।
तं तं समनयत्कामंकृच्छ्रेणाप्यजितेन्द्रियः ॥ ५६ ॥
प्राणों से भी मूल्यवान् जो कुछ भी वह माँगती, उसे वह काममोहित होकर अत्यधिक परिश्रम करके देता
था। उसकी इच्छा भाँप कर ही वह उसे उसकी इच्छित वस्तु ला देता था फिर माँगने पर क्या कहना ? अपने को
बेचकर भी वह उसके लिये ले आता। धर्म का स्मरण नहीं, गरीब पर दया करना तो मालूम नहीं, जो भी कृपा
करता वह केवल स्त्री पर। शक्कर पर बैठी हुई मक्खी मारने पर भी नहीं उड़ जाती उसी प्रकार विषय का भोग
करते समय वृद्धावस्था की तथा मृत्यु भी याद नहीं रहती। सत्यवादी लोग जिस प्रकार पूर्वजों के दिये वचन का
पालन करते हैं, उसी प्रकार कामीजन स्त्रीसुख में बाधा नहीं आने देते। जिस प्रकार कामोपासक की सर्वत्र
एकात्मता होती है, उसी प्रकार संसार में स्त्री के अतिरिक्त उसे कुछ भी नहीं दिखायी देता।
कपोती प्रथमं गर्भं गृह्णती काल आगते।
अण्डानि सुषुवे नीडे स्वपत्युः संनिधौ सती ॥ ५७ ॥
वैसे ही लाडली पत्नी, तिस पर वह गर्भवती हुई, फिर क्या पूछने ? धन के लालची को जैसे एकाएक धन
की पेटी मिल जाय, उसी प्रकार वह उसके गर्भ का कुछ ज्यादा ही कौतुक करने लगा। दारू पीकर वह बन्दर
जिस प्रकार मस्त होकर नाचने-डोलने लगता है उसी प्रकार वह गर्भ का कौतुक करने लगा। गर्भिणी के सारे
मनोरथ उसने पूरे किये और प्रसूति काल आने तक वह उसी के लाड़-प्यार में खेलता रहा। इतने में अपने घरौंदे
में प्रसूत होकर उसने अण्डे दिये। उसके प्रसूत होने की वार्ता सुनकर उसकी प्रसन्नता का ठिकाना नहीं रहा।
तेषु काले व्यजायन्त रचितावयवा हरेः।
शक्तिभिर्दुर्विभाव्याभिः कोमलाङ्गतनूरुहाः ॥ ५८ ॥
हरि की माया अघटित को घटित करने वाली है। वह दुर्गम होने के कारण उसकी लीला साक्षात ब्रह्मदेव
की भी समझ में नहीं आती। उस देवमाया ने अण्डे में अवयवों की रचना की। पहले उस अण्डे में केवल रस
भरा हुआ था। हरि की माया से उसी में नाखून, पंख, चोंच तथा नेत्रों के द्वार खुलकर चमत्कार हुआ।
अण्डे अपने आप फूटे और उसमें से नन्हें-नन्हें कोमल चूजे बाहर निकले। उन्हें देखते ही माँ-बाप जीव-प्राण
भूल गये।
प्रजाः पुपुषतुः प्रीतौ दम्पती पुत्रवत्सलौ।
शृण्वन्तौ कूजितं तासां निर्वृतौ कालभाषितैः ॥ ५९॥
बच्चे अत्यन्त कोमल और लुभावने थे इसलिये माता-पिता पुत्र वात्सल्य के कारण मंजुल वाणी तथा स्नेह
से उनका सांत्वन करते थे। जिस समय जो करना उचित होता था, उसके अनुसार वे दोनों मिलकर अपने
उस शिशु का पालन-पोषण करते थे। उनके मंजुल शब्द सुनकर वे दोनों खुशी से डोलने लगते और बच्चों की
नजर उतारते।
तासां पतत्रैः सुस्पर्शैः कूजितैर्मुग्धचेष्टितैः ।
प्रत्युद्गमैरदीनानां पितरौ मुदमापतुः ॥ ६० ॥
उन्हें आलिंगन और चुम्बन लेने से, उनके वे मधुर, मृदु और मंजुल शब्द सुनने से, उनके पंखों के स्पर्श से

सातवाँ अध्याय १८९
उन दोनों को अत्यन्त आनन्द होता था। माँ-बाप जब बैठे होते तो नन्हें-नन्हें बच्चे दौड़कर इधर-उधर आड़े-
तिरछे दौड़कर तथा एक-दूसरे की चोंच से चोंच मिलाकर एक दूसरे को दिखाते थे और फिर आलिंगन देकर
चुपचाप भागकर दूर चले जाते और फिर वहाँ से दौड़ते हुए उनके पास आते। माँ-बाप के पंखों की छाया रहने
से बालकों में हीनता नहीं रहती। ऐसे बच्चों को जन्म देने के कारण उन्हें धन्यता मालूम होती है। उनके वे बच्चे
अत्यन्त दुलारे होने के कारण वे उनसे बहुत लाड़-प्यार करते और उनकी इच्छा पूरी करते। उन्हें देखकर उनके
नेत्र तृप्त हो जाते थे। एक-दूसरे पर उनका अत्यन्त प्रेम था। बालकों को खेलते देखकर वे उन्हें प्रेम से उठा लेते
और उनके कोमल मुख का चुम्बन ले लेते।
स्नेहानुबद्धहृदयावन्योऽन्यं विष्णुमायया।
विमोहितौ दीनधियौ शिशून्युपुषतुः प्रजाः ॥ ६१ ॥
हे राजा! उस अजन्मा 'अजा' माया ने कैसा भुलावा दिया, जरा देखो। हृदय में परस्पर प्रेमबन्धन होने के
कारण वे उनका पोषण करने के लिये तत्पर रहते थे। स्त्री-पुत्रों का मोह बड़ा कठिन है। उनका पोषण करने के
लिये वे चिन्तातुर होकर अन्न के लिये भ्रमण करते फिरते थे।
एकदा जग्मतुस्तासामन्नार्थौ तौ कुटुम्बिनौ।
परितः कानने तस्मिन्नर्थिनौ चेरतुश्चिरम् ॥ ६२ ॥
इस प्रकार वे बच्चे थोड़े बड़े हुए। परिवार बढ़ गया, भोजन की अधिक आवश्यकता मालूम होने लगी।
तब गृहस्थी के विचार से वे चिन्ता में पड़ गये। इस प्रकार कुटुम्ब वत्सल वह कपोत और कपोती पुत्र प्रेम में
बद्ध होने के कारण दोनों एक साथ बाहर निकल पड़ते और अधिक समय बाहर रहकर भक्ष्य ले आते। अब एक
ही स्थान पर भक्ष्य कैसे मिलेगा? इसलिये वे जंगल-जंगल घूमने लगे लेकिन पर्याप्त भक्ष्य नहीं मिल पाता था।
बहुत-सा चारा एकत्र कर फिर अपने घरौंदे की ओर जाएँ और अपने बच्चों को नाना प्रकार का भक्ष्य देकर
उनका पोषण करें इस विचार से वे दोनों अनेक स्थानों, अनेक वनों और उपवनों में घूमने लगे।
दृष्ट्वा ताँल्लुब्धकः कश्चिद्यदृच्छातो वनेचरः।
जगृहे जालमातत्यचरतः स्वालयान्तिके ॥ ६३ ॥
इस प्रकार एक दिन जब इनके माँ-बाप दूर गये हुए थे उनके बच्चे घरौंदे में ही उड़ रहे थे। वे भूख से
क्षुब्ध हो गये और दुर्भाग्यवश बाहर निकल पड़े। उसी जंगल में एक बहेलिया पक्षी पकड़ने के काम में बहुत
माहिर था। संयोगवश उसकी दृष्टि इन कपोत बच्चों पर पड़ी। उसने जाल फैलाकर उन बच्चों को उसमें फँसाया
और अब कपोत कपोती के आने की प्रतीक्षा करने लगा।
कपोतश्च कपोती च प्रजापोषे सदोत्सुकौ।
गतौ पोषणमादाय स्वनीडमुपजग्मतुः ॥ ६४ ॥
बच्चों के प्रति मोह के कारण कपोत और कपोती जल्दी-जल्दी घरौंदे की ओर आये। स्त्री सुख की
आसक्ति ही बढ़ती व्यथा का मूल कारण है। स्त्री की संगति के कारण कितना अनिवार दुःख भोगना पड़ता है,
कौन बताये ? पुरुष को दुःख देने के लिये स्त्री संग ही कारण है। वही पुत्र, नाती आदि के द्वारा कैसे-कैसे दुःख
भोगने को बाध्य करता है।

gra? "दीनचित्ताऽजमायया।"?
Yes! "दीनचित्ताऽजमायया।".

Line 9:
"स्वयं चाबध्यत शिचा बद्धान्पश्यन्त्यपस्मृतिः॥ ६६॥"

Line 10:
"अपने मृत पुत्रों को देख उसका अंतःकरण प्रेम से भर आया। पति को दुःखी करने के लिये वह कपोती कैसा"
Wait, "अंतःकरण" or "अन्तःकरण"?
Line 10: "अंतःकरण" (with anusvara and visarga).
"दुःखी": with visarga.
"लिये": लिये.

Line 11:
"विलाप कर रही थी। पुत्र स्नेह ने उन्हें बेचैन कर दिया था। उनके गुणों को याद कर वह रोने लगी। उसके आगे उसे"

Line 12:
"अपना हित-अहित भी नहीं दिखायी दिया और वह अपने से ही जाल में फँस गयी। मायामोह के कारण वह कैसे"

Line 13:
"भुलावे में आ फँसी! जिस जाल में बच्चे बँधे हुए थे, उसी जाल में वह स्वयं फँस गयी।"

Line 14:
"कपोतश्चात्मजान् बद्धानात्मनोऽप्यधिकान् प्रियान्।"
Notice avagraha: "बद्धानात्मनोऽप्यधिकान्".
Danda at the end: "प्रियान्।"

Line 15:
"भार्या

सातवाँ अध्याय १९१
करती हैं। कुछ गन्दी और आलसी होती हैं। कुछ अत्यन्त झगड़ालू होती हैं, कुछ नाजुक और विलासिनी होती हैं।
लेकिन मेरी पत्नी वैसी नहीं थी। वह मेरे लिये सदा अनुकूल रही। वह यथार्थ में मेरी धर्मपत्नी थी और मेरे
अनुरूप आचरण करती थी। मैं धर्म कर्म की ओर प्रवृत्त होता तो वह भी भक्तिपूर्वक मेरी सहायता करती थी और
मुझमें जब कामेच्छा होती थी तो उसे भी पूरा करने में वह कुशल थी। सचमुच वह मेरे सिवा किसी देवता को नहीं
भजती थी। मुझे छोड़कर वह किसी तीर्थ को नहीं जाती थीं। मेरी बात का तो उसने कभी भी उल्लंघन नहीं किया।
इस प्रकार मेरी पत्नी रूपगुण तथा शील आदि से सुसम्पन्न, मेरे लिये सदा अनुकूल, पतिव्रता तथा अत्यन्त निर्मल
थी। वह महासाध्वी मुझे घर में अकेला छोड़ कर मुझे संकट में डालकर अपने पुत्रों के साथ स्वर्ग सिधर गयी।
सोऽहं शून्ये गृहे दीनो मृतदारो मृतप्रजः।
जिजीविषे किमर्थं वा विधुरो दुःखजीवितः ॥ ७० ॥
स्त्री गयी, पुत्र चले गये, अब मैं भी यहाँ किसके लिये रहूँ? लोकलज्जा और निन्दा के दुःख से मेरे प्राण
निकल जायेंगे। इतना दुःख आन पड़ा, अब लोगों को मुँह कैसे दिखाया जाय ? संसार का सुख तो नष्ट ही हो
गया। अब यदि जीवित रहा तो लोग मुझे मूर्ख कहेंगे। आग लगे ऐसे विधुर के जीने को। वह निन्दनीय और
लज्जास्पद रहता है। श्राद्ध का निमंत्रण भी कोई नहीं देता। हमेशा अकेले पड़े रहना। इस प्रकार यदि मैं इन लोगों
में रहा तो उस उजाड़ घर में मुझे अकेले बैठा रहना पड़ेगा, ठीक से खाने को भी नहीं मिलेगा। इससे मुझे और
भी दुःख होगा।
तांस्तथैवावृताञ्छिग्भिर्मृत्युग्रस्तान् विचेष्टतः।
स्वयं च कृपणः शिक्षु, पश्यन्नप्यबुधोऽपतत् ॥ ७१ ॥
ऐसा बोलकर उसने क्या किया? उसने मृत स्त्रीपुत्रों को देखा। उसने पत्नी और बच्चों को कालपाश में
बँधा देखा। उनकी हलचल बिलकुल बन्द हो गयी थी। यह देखकर भी उस मूर्ख ने विचार नहीं किया और स्वयं
भी उस जाल में फँस गया। मृत के पीछे मरना यह तो सबके पीछे लगा हुआ है लेकिन जन्म-मृत्यु को टाल कर
अपना हित साध्य करना यह कोई नहीं करता। देखिये, स्त्री-पुत्रों के लिये अपना प्राण भी दे देते हैं, लेकिन
भगवद्पद प्राप्त कर लिया जाय यह बात किसी के मन में नहीं आती।
तं लब्ध्वा लुब्धकः क्रूरः कपोतं गृहमेधिनम्।
कपोतकान्कपोतीं च सिद्धार्थः प्रययौ गृहम् ॥ ७२ ॥
इस प्रकार वह दुर्बुद्धि कपोत जाल में फँसते ही बहेलिया का काम अनायास ही हो गया। कपोत को
सपरिवार कन्धे पर लाद कर वह अपने घर की ओर चल पड़ा। ऐसा जो भी कोई मोहग्रस्त गृहस्थाश्रमी होता है,
उसे काल तत्काल हरण करके ले जाता है। जैसी बुद्धि कपोत की थी वैसी ही घर गृहस्थी पर आसक्ति रखने
वाले की होती है। नयों के लिये बिलखते हुए कपोती मर गयी यह अपनी आँखों से देखते हुए भी उस मूर्खबुद्धि
ने फिर उसी जाल में छलांग लगायी। इस प्रकार वह कपोत परिवार की चिन्ता करते-करते स्वयं भी मर गया।
मन में जरा भी विचार नहीं किया।
एवं कुटुम्ब्यशान्तात्मा द्वन्द्वारामः पतत्रिवत्।
पुष्णन्कुटुम्बं कृपणः सानुबन्धोऽवसीदति ॥ ७३ ॥

१९२ श्रीमद् एकनाथी भागवत
इस प्रकार सांसारिक व्यक्ति कुटुम्ब का पोषण करने में ही आसक्त हो जाने के कारण विषयवासना से
सदा अतृप्त रहता है, इसीलिये उसका परिवार के साथ विनाश होता है। गृह की आसक्ति और गृहस्थाश्रम यह
केवल द्वंद्व का सुख है। इसलिए वह कपोत की तरह संभ्रमित होता है। इसलिये इस प्रकार अपने जन्म को व्यर्थ
नहीं करना चाहिये।
यः प्राप्य मानुषं लोकं मुक्तिदारमपावृतम्।
गृहेषु खगवत्सक्तस्तमारूढच्युतं विदुः ॥ ७४॥
श्लोक ७४-इस मृत्युलोक में आकर जिसे उत्तम देह प्राप्त हुआ है और वह भी श्रेष्ठवर्ण ब्राह्मण का
जन्म, जो मनुष्य देह प्राप्त करता है, उसके लिये मुक्ति का द्वार सदा खुला रहता है। एक दिन में एक क्षण में वह
इस जन्म से पार निकल जाता है। यह बात अन्य वर्णों की है, फिर ब्राह्मण तो वैसे भी पूण्यमूर्ति ही है। वे सदा
मुक्त ही हैं लेकिन व्यर्थ ही आसक्ति में फँसे रहते हैं। विद्वत्ता के साथ वैराग्य का होना बड़े भाग्य की बात है।
वह ब्रह्मदेव आदि को भी प्राप्त नहीं होती। व्यर्थ की आसक्ति में अभागे हुए ये लोग शिश्नोदर के अधीन होकर
व्यर्थ चले जाते हैं। मनुष्यदेह प्राप्त कर जो गृहासक्त होता है, उसे 'आरूढच्युत' अथवा पढ़तमूर्ख कहते हैं। वह
हाथ में आये स्वार्थ को छोड़कर कपोत की तरह दुःखी होता है। विषय से कभी तृप्ति नहीं होती ऐसा वेद और
पुराण कहते हैं। ऐसा होते हुए विषय से आसक्ति कर, व्यर्थ ही नरदेह को नष्ट करते हैं। नरदेह की महत्ता
विचित्र है। केवल रामनाम का आवर्तन करने से भी चारों मुक्ति दासी बनकर रहती हैं। ऐसा होते हुए भी वही
देह विषय के लिये नष्ट करते हैं। विषयसुख की आसक्ति से आज तक किसी को तृप्ति नहीं हुई। प्यासा व्यक्ति
मृगजल पाकर कैसे शान्त होगा? इसलिये ज्ञानी पुरुष नरदेह प्राप्त होते हुए विषय के प्रयास में पागल बनकर
क्यों कष्ट सहे? नरदेह जैसी निधि अनायास ही प्राप्त हुई है। इसलिये अभिमान बिलकुल छोड़ दो। तभी तुम्हें
समाधान प्राप्त होगा। इसके बाद पुनः नरदेह प्राप्त होगा ही इसकी कोई आशा नहीं है। इसलिये विषयासक्ति
छोड़ कर भक्तिभाव से श्रीहरि का भजन करना चाहिये। कलियुग में साधन बिलकुल सरल है। न योग की
आवश्यकता है न यज्ञ की, न त्याग चाहिये न दान चाहिये। बिना लज्जा के हरिकीर्तन करने से चारों मुक्तियाँ
चरणों पर आकर गिरती हैं। ऊब कर यदि उसके बदले में पारस मिले तो दुःख क्यों हो? उसी प्रकार कीर्तन के
बल पर साक्षात ईश्वर की प्राप्ति होती है, इसे ध्यान में रखो। एकाजनार्दन कहता है, नश्वर देह के साधन से ही
जन में जनार्दन होना यही स्पष्टतया बतलाया। एका जनार्दन की शरण में आया तभी जनार्दन एकत्व से एका हो
गया, वैसे जैसे सुवर्ण और कंगन नाम से दो होते हुए भी मूलतया एक ही होते हैं। एकादश स्कन्ध में श्रीकृष्ण ने
जो गुरुपदेश उद्धव को सुनाया तथा अवधूत ने यदु को बताया वही गुरुपदेश जनार्दनरूप एकनाथ सुना रहा है।
इति श्रीमद्भागवते एकादश स्कंधे, श्रीकृष्ण उद्धव संवादे,
यदु अवधूत इतिहासे एकाकार टीकायाम सप्तमोध्यायः ॥७॥

अष्टम अध्याय
हे ओंकाररूप सद्गुरु! तुम्हें प्रणाम! तुम एक बहुत बड़े ज्योतिषी हो। तुम जीव का तथा चिद्ब्रह्म का
भविष्य देखकर 'ओं पुण्या' (मैं प्रणवरूप पुण्यस्वरूप हूँ) इस मंत्र से जीव-ब्रह्म का विवाह कराते हो। दुल्हा-
दुल्हन का विवाह तो अनेक लोग देखते हैं, किन्तु हे गुरुराजा! स्वयं से स्वयं का विवाह करा देने का तुम्हारा
कौशल अत्यन्त अलौकिक है और विवाह कराने का तुम्हारा कौशल कुछ ऐसा है कि तुम पाँच पंचों की झंझट
पाले बिना, काल की दृष्टि से बचाकर आत्मबोध की स्थापना करते हो। चारों पुरुषार्थों का लड्डू तथा पापड़
आदि से समर्पण कर अहंभाव को न्योछावर कर देते हो। साधन चतुष्टय का मधुपर्क कर जीव भाव का पिण्ड
सहज अर्पण कर देते हो। विषय सुख जो पीछे छूटता है वही पैर का पाँवड़ा बन जाता है और दोनों ओर खड़े
होकर सावधान कहते हो यही तुम्हारा सच्चा उपदेश है। विषय का व्यवधान यही सच्चा अंतरपट है जो सहज
समाधि से दूर होता है और शब्द स्तब्ध होकर चारों ओर शान्ति हो जाती है। ऐसा यह तुम्हारा मुहूर्त अत्यन्त
मंगलकारी होता है। अर्धमात्रा समदृष्टि होने पर ब्रह्मस्वरूप से भेंट होकर ऐक्य भाव की मुट्ठी बँध जाती है।
विवाह कराने का तुम्हारा ढंग बिलकुल अनूठा है। वहाँ न कुछ काला है न कुछ सफेद है, न गोरा है न साँवला
है। सच तो यह है कि वह आँखों से दिखायी ही नहीं देता। ऐसे स्थान पर विवाह समारोह कराते हो। लेकिन हे
गुरुराया! कैसा आश्चर्य है, कैसा चमत्कार है कि दूसरा कोई न दिखायी देते हुए भी एक ओर एक के साथ
अकेले ही विवाह कराने वाले तुम एक ही हो। गुरु समझ कर तुम्हें बाहर प्रणाम करने जाता हूँ तो अन्तर की
आत्मा भी तुम ही हो। भीतर या बाहर, सर्वत्र तुम ही भरे दिखायी देते हो। तुम्हारा 'तूपन' देखने जाओ तो मेरा
'मैं पन' नष्ट हो जाता है। हे गुरुनाथ! ऐसा करते हुए भी आप मुझसे ग्रन्थ रचना करवाते हैं। सातवें अध्याय के
अन्त में अवधूत ने यदु को कपोत की कथा सुनायी। प्रारम्भ से लेकर अन्त तक, पृथ्वी से लेकर कपोत तक
अत्यन्त श्रेष्ठ आठ गुरुओं के बारे में बताया। आत्मबोध से ही गुरुओं में श्रेष्ठत्व आता है। अब शेष बच रहे
गुरुओं के लक्षण भी अवधूत यदु को बताएगा, तो उधर भी ध्यान दें। श्रवण करने से वह बोध स्थिति तुम्हें भी
प्राप्त होगी।
ब्राह्मण उवाच
सुखमैन्द्रियकं राजन् स्वर्गे नरक एव च।
देहिनां यद्यथादुःखं तस्मान्नेच्छेत तद् बुधः ॥ १ ॥
यदु को श्रवण में आस्था है, यह देखकर ब्राह्मण को बड़ा सन्तोष हुआ। आनन्द के उसी उल्हास में उसने
आगे का निरूपण प्रारम्भ किया। उसने कहा, हे राजा! ध्यानपूर्वक सुनो! विषय का सुख स्वर्ग में तथा नरक में
समान रहता है इसमें जरा भी सन्देह नहीं है। उर्वशी का भोग करते समय स्वर्ग में इन्द्र को जो सुख प्राप्त होता है
वही सुख विष्टा में विचर रहे सूअर को अपनी मादा का भोग करते समय मालूम होता है। इसी कारण से
साधुजन दोनों जगह के भोग में मन नहीं लगाते। जिस प्रकार कोई प्रेत को आलिंगन नहीं देता उसी प्रकार साधु
पुरुष विषय को स्पर्श नहीं करते। जीवित सर्प को हाथ में लेने की इच्छा किसी भी प्राणी को नहीं होती, उसी
प्रकार साधुपुरुष मन में कभी विषय की आसक्ति नहीं रखते। जिस प्रकार बिना निमंत्रण दिये ही प्राणी के हिस्से

१९४ श्रीमद् एकनाथी भागवत
में दुःख आता है उसी प्रकार बिना इच्छा किये ही अदृश्य प्राणी को बलात्कार से इन्द्रिय सुख भोगने को बाध्य
करता है। कोई भी दुःख भोगना नहीं चाहता किन्तु भाग्य जिस प्रकार बिना माँगे दुःख देता है, उसी प्रकार वह
सुख भी उसे भोगने को बाध्य करता है। ऐसा होते हुए भी लोग उसके लिये प्रयास करते ही हैं जिससे सारे
जीवन का विनाश होता है। इसलिये विषय की आस्था छोड़ परमार्थ के लिये भजन करना चाहिये। लेकिन तुम
कहोगे कि यदि परमार्थ के चक्कर में पड़ें तो यह देह बिना आहार के नहीं रह पायेगा। तो उसी का अनुभव लेने
के लिये मैंने अजगर को गुरु बना लिया।
ग्रासं सुमृष्टं विरसं महान्तं स्तोकमेववा।
यदृच्छयैवापतितं ग्रसेदाजगरोऽक्रियः ॥ २ ॥
अजगर बिना कुछ प्रयास किये सहज ही जो आहार मिलता है उसका सेवन करता है। वह घबरा कर
धीरज नहीं खोता। उसका निश्चय पक्का रहता है। स्वभावतः वह मुँह खोलता है और जो भी वस्तु मुँह में
सरलता से आती है— भले ही वह सरस हो या नीरस हो, उसे सन्तोषपूर्वक ग्रहण करता है। यही बात योगियों
की है। वे सर्वदा निजात्मस्थिति में ही तल्लीन रहते हैं। वे रस के प्रति कोई आसक्ति न रखते हुए जो भी सहज
रूप से मिल जाता है उसे ग्रहण करते हैं। योगी क्या सेवन करते हैं इसका पता रसना को भी नही चलता। रसना
की जानकारी के बिना जो आहार लिया जाता है वह स्वात्म दृष्टि से लिया जाता है। खट्टा, तीता आदि स्वाद वह
जानता है लेकिन वह सब कुछ एक ही स्वाद से—ब्रह्मरस भाव से ग्रहण करता है। वह सरस, नीरस ये भाव
नहीं जानता, आत्म सुख के माधुर्य से ही उसे स्वादिष्ट बना लेता है। मुँह खोलने पर यदि उसमें हवा भी भर
जाय तो वह अजगर का आहार बन जाता है। उसी से उसके शरीर का पोषण होता है। वही स्थिति योगियों की
भी रहती है। वे वायुभक्षण करके भी सुखी रहते हैं। आहार के लिये वे दूसरों के आगे याचना नहीं करते। कम,
अधिक, सरस, नीरस यह भावना ही उनमें नहीं होती। स्वभाव से ही, जो भी मुँह में आकर गिरता है उसे वे
शान्त चित्त से सेवन करते हैं।
शयीताहानि भूरीणि निराहारोऽनुपक्रमः।
यदि नोपनमेद्ग्रासो महाहिरिव दिष्टभुक् ॥ ३॥
अजगर को यदि लम्बे समय तक आहार न मिले तो भी उसकी स्थिरता नहीं टलती, वह अपने ही स्थान
पर वैसे ही लोटता रहता है। उसी प्रकार योगी को भी यदि बहुत समय तक आहार न मिले तो वह लम्बा आसन
लगाकर निद्रा के बिना भी सोया रहता है। निद्रा तो उसे आती ही नहीं लेकिन वह दिन-रात निजसुख की तंद्रा में
ही पड़ा रहता है। वह कोई बाह्य उपाय नहीं करता, भाग्य से जो मिलता है वही उसका भक्ष्य बन जाता है। जिस
समय जो कुछ भाग्य में होगा वह सब उस समय मिलेगा ही, इस निश्चय से उसका ज्ञान मलीन नहीं होता।
निजात्मबोध के कारण उसका निश्चय नहीं टलता।
ओजःसहोबलयुतं बिभ्रद्देहमकर्मकम्।
शयानो वीतनिद्रश्च नेहेतेन्द्रियवानपि ॥ ४ ॥
अजगर की शक्ति उद्दंड तथा देह और पराक्रम प्रचण्ड रहता है वह प्रयास के नाम पर कुछ भी नहीं करता।
केवल मुँह खोलकर पड़ा रहता है। योगी भी उसी प्रकार का होता है, उसमें शरीर सामर्थ्य होता है उसकी बुद्धि

भी कुशल रहती है और इन्द्रिय बल भी पर्याप्त रहता है लेकिन वह आहार की कल्पना का स्पर्श भी मन को
नहीं होने देता। काया और वाचा को वह उसके स्वभाव से विचलित नहीं होने देता। वह स्वप्न और जागृति से
वंचित रहता है, सुषुप्ति का त्याग कर सोता है तथा शून्य का विस्तार समाप्त कर स्वरूपानंद में शयन करता है।
मुनिः प्रसन्नगम्भीरो दुर्विगाह्यो दुरत्यय।
अनन्तपारो ह्यक्षोभ्यस्तिमितोद इवार्णव ॥ ५ ॥
अब, मैंने जिस समुद्र को गुरु बनाया उसके लक्षण सुनो। उसमें गांभीर्य, परिपूर्णता तथा निर्मलता आदि
गुण होते हैं। समुद्र हमेशा प्रसन्न रहता है उसी प्रकार योगी भी सदा प्रसन्नमुख रहता है। आत्मबोध के कारण
उसमें व्याकुलता नहीं होती। नदियों के गन्दे जल के मिलने से भी वह मैला नहीं होता, वह निर्मल ही रहता है।
उसी प्रकार योगी भी सदासर्वदा, नाना प्रकार के. कर्म करते हुए भी सदा शान्त एवं अलिप्त रहता है। जिस प्रकार
समुद्र जल में गम्भीर रहता है, उसी प्रकार योगी स्वभाव के अनुसार स्वात्मानुभव से गम्भीर रहता है। जिस प्रकार
वह सीमा का उल्लंघन नहीं करता उसी प्रकार योगीश्वर गुरु आज्ञा का उल्लंघन नहीं करता। समुद्र में हर किसी
को घुसने का साहस नहीं होता। वह सबको जल और लहरों के नीचे डुबा देता है। उसी प्रकार जो योगी के पास
जाता है, उसके जन्म-मरण रूप संसार को योगी डुबो देता है। समुद्र में घुसना और बाहर निकलना इसे जो
जानता है वही समुद्र में स्नान कर सकता है। दूसरों को वह अपने कोलाहल से व्याकुल कर छोड़ता है। उसी
प्रकार सबका योगियों का साथ नहीं हो सकता। वे स्वयं अपने ही से भयभीत रहते हैं। भाविक लोग ही उनके
साथ संगत कर सकते हैं। बड़ा धनवान भी जिस प्रकार किसी भी उपाय से समुद्र का उल्लंघन नहीं कर सकता
उसी प्रकार देवता, राजा, मनुष्य अथवा किन्नर भी योगीश्वर का उल्लंघन नहीं कर सकते। समुद्र में मैल नहीं रह
पाता, अपनी लहरों से वह उसे किनारे पर फेंक देता है। उसी प्रकार योगियों में भी ध्यान के कारण मैल नहीं रह
पाता। ताम्रपर्णी नदी समुद्र से जा मिलती है तो वह मोतियों की खान बन जाती है उसी प्रकार जब श्रद्धा की
योगियों से भेंट होती है तो वह भी मोतियों की खान बन जाती है। जो समुद्र में गोता लगाता है उसे नाना प्रकार
के रत्न प्राप्त होते हैं, उसी प्रकार जो योगी के साथ समरस होकर रहता है उसके चरणों पर ज्ञानरत्नों की राशि
आ जाती है। जिस प्रकार समुद्र की कोई सीमा नहीं होती, उसी प्रकार वेद और शास्त्र भी योगियों को सीमा में
नहीं बाँध सकते। समुद्र का पानी जिस प्रकार प्रवाहरहित, निश्चल रहता है उसी प्रकार योगी भी मृत्युभयरहित
होता है तथा निश्चल बनकर रहता है। समुद्र में कभी प्रवाह नहीं होता, वह हमेशा वैसा ही परिपूर्ण रहता है,
उसी प्रकार योगी भी जन्म-मरण की बाधा से मुक्त रहता है। समुद्र के लक्षण निश्चित करते-करते योगी में उससे
भी अधिक विशेषतायें मालूम हुईं। तो अब योगी की महानता बताता हूँ, ध्यान से सुनो। समुद्र का पानी लहरों के
नीचे अत्यन्त चंचल रहता है लेकिन योगी भीतर से बिलकुल शान्त रहता है। न व्याकुलता रहती है न विचार
रहता है। समुद्र बाह्य रूप से क्षुब्ध दिखायी देता है लेकिन योगी कभी क्षुब्ध नहीं होता। योगी का मन किसी भी
प्रकार से विचलित नहीं होता। वह हमेशा योगबल के कारण सावधान रहता है। पूर्णिमा अमावस्या के पर्व में
समुद्र में ज्वार आता है, किन्तु योगी सदा स्वरूपानंद से परिपूर्ण रहता है। चन्द्रमा के कारण समुद्र में ज्वार-भाटा
आता रहता है लेकिन योगी आत्मानुभव से सदा समभाव रहता है। समुद्र का जल खारा रहता है किन्तु योगीराज
वैसा नहीं होता। वह समस्त प्राणिमात्र के लिये मधुर रहता है। उसका बोध भी मधुर तथा सत्य रहता है जिसमें
पूर्ण बोध नहीं होता, जिसे निजात्मता का अनुभव नहीं रहता, उसमें अपरिपक्व फल की तरह माधुर्य कहाँ से

१९६ श्रीमद् एकनाथी भागवत
आयेगा ? सागर के ऊपर मेघवृष्टि होने से वह जीवन व्यर्थ हो जाता है। लेकिन योगी में यह बात नहीं है।
उसकी यदि सेवा की जाय तो वह उसे व्यर्थ नहीं जाने देता। योगी यदि थोड़ी भी सेवा ग्रहण करता है तो उतने
ही से वह भव्यथा का निवारण करता है। इसलिये मुमुक्षुजनों को सदा हरिभक्तों की सेवा करनी चाहिय।
समृद्धकामो हीनो वा नारायणपरो मुनिः।
नोत्सर्पेत न शुष्येत सरिद्भिरिव सागरः ॥ ६ ॥
पर्जन्यकाल में सभी नदियाँ अपार जल लेकर आती हैं लेकिन उससे समुद्र का जलस्तर नहीं बढ़ता।
ग्रीष्मऋतु के आते ही नदियों का प्रवाह बन्द हो जाता है लेकिन उससे नदियों का वह स्वामी दुःखी नहीं होता।
उसी प्रकार योगी के पास नाना प्रकार की समृद्धियाँ यदि स्वयं भी चलकर आ जाएँ तो उससे उसका अहंकार
नहीं बढ़ता। यदि वह समृद्धि चली भी जाए तो उसका अंतःकरण दुःखी नहीं होता। वह सदा नारायणात्मक दृष्टि
से सुखानन्द में ही विचरण करता रहता है। अमीर होने पर भी ‘समृद्धि’ का भाव उसे नहीं छू पाता। यदि वह
दरिद्र भी हो जाय तो योगी को दरिद्रता मालूम ही नहीं होती। अमीरी हो या गरीबी, उसके लिये दोनों ही एक
समान हैं। उसे प्रपंच की आसक्ति नहीं होती। स्वात्मानुभव से वह तत्वतः नारायण स्वरूप ही हुआ रहता है।
प्रपंच का यह बन्धन बहुत कठिन है। इस सम्बन्ध में मैंने पतंगे को गुरु बनाया उसका किस्सा सुनो।
दृष्ट्वा स्त्रियं देवमायां तद्भावैरजितेन्द्रियः।
प्रलोभितः पतत्यन्धे, तमस्यग्नौ पतङ्गवत् ॥ ७ ॥
‘दैवी गुणमयी’ माया का सगुण-स्वरूप ही स्त्रियाँ हैं। प्राणियों में स्त्री-सुख भोगने की तीव्र इच्छा उत्पन्न
हुई। हावभाव आदि गुणों से तथा चंचल कटाक्ष से वे पुरुष के धैर्यरूपी कवच को तोड़कर हृदयप्रदेश में संचार
करती हैं। भीषण कटाक्ष के प्रहार से वे पुरुष का धैर्य नष्ट कर स्त्री रूप पाश में फँसा कर भोगरूपी कारागार में
जकड़ देती हैं। स्त्री भोग का सुख केवल दुःख है, इसे ध्यान में रखो। मधुर विष मुँह में डालने पर उसका
परिणाम प्राण नाश में ही होगा। दीपक के पास जाकर चिपकने से पतंगा को क्या सुख प्राप्त होता है ? जोर-जोर
से लिपट कर मृत्यु के मार्ग पर अवश्य ही लग जाते हैं। आगे वाले को मरा हुआ देखते हैं लेकिन पीछे वाले को
दीपक का मोह वैसा ही कायम है। उसी प्रकार स्त्री के काम में एक बलि चढ़ता है लेकिन दूसरा उस विषय में
आसक्त होता ही है। इस प्रकार विवेकहीन मूर्ख लोग स्त्रीसुख के लिये ललचाते हैं लेकिन उनके संसर्ग से आने
वाली मृत्यु नहीं टलती। दीपक के रूप के भुलावे में पतंगा जलकर तेल में गिर पड़ता है उसी प्रकार स्त्रियों की
संगति से निश्चय ही ‘अंधतम’ नामक नरक में पतन होता है।
योषिद्धिरण्याभरणाम्बरादिद्रव्येषु मायारचितेषु मूढः।
प्रलोभितात्मा ह्युपभोगबुद्ध्या पतङ्गवन्नश्यति नष्टदृष्टिः ॥ ८ ॥
देखो ! स्त्रियाँ, सुवर्ण, वस्त्र, अलंकार तथा रत्न ये सारी चीजें माया ने तैयार किये हुए पतन के साधन हैं।
एक स्त्री ही पहले नरक में ढकेलती है। सुवर्ण का लोभ तो उससे भी भीषण नरक, है। रत्न और आभूषण भी
तत्काल नरकुण्ड में ढकेलते हैं। अनर्थ के ये सारे स्थल एक स्त्री में सिमट गये हैं। ऐसी स्त्री दिखायी देते ही
लोग कहीं के नहीं रह जाते। शरीर में पहले ही पिशाच का संचार हुआ रहता है तिस पर दारू पीते ही फिर
मनुष्य के नाचने और उन्मत्त होने की पराकाष्ठा नहीं रहती। या जिस प्रकार कोई वाचाल व्यर्थ की गप हाँकने

अष्टम अध्याय १९७

लगे और तिस पर होली का मौसम हो तो जो दुर्गति वाणी की होती है उधर कौन ध्यान देगा ? मदिरा तो वैसे भी
लोगों के होश उड़ा देती है, तिस पर यदि उसमें कोई मादक पदार्थ मिला दिया जाय तो फिर उसे प्राशन करने पर
संभ्रम की कोई सीमा नहीं रह जाती। उसीप्रकार मोह का जो असली रूप है वही स्त्री का स्वरूप है, तिस पर
वस्त्र, आभूषण आदि उसे और भी बढ़ाते हैं। काजल, बिन्दी, अलंकार, वस्त्र, तरह-तरह की साड़ियों से स्त्री
सुन्दर दिखायी देने लगती है, उसमें माया के विकार फैल जाते हैं। जिन्होंने इन्द्रियों का दमन नहीं किया है उन्हें
ही माया का ताप होता है। किन्तु भक्तों के सामने वह त्रिकाल में भी खड़ी नहीं रह सकती। श्रीगोविन्द के प्रति
जिसके मन में अत्यन्त भक्ति रहती है, उसकी रक्षा स्वयं कृपानिधि ही करते हैं। अगर पूछोगे कि वे भक्तों की
रक्षा किस प्रकार करते हैं तो इसका रहस्य यह है कि मूल रूप से 'आत्मा' में स्त्री-पुरुष यह भेद नहीं है।
भगवान ही स्त्री रूप में दिखायी देता है ऐसा आभास देकर वह भक्तों की रक्षा करता है। सुन्दर स्त्री को देखकर
जिसकी विवेकदृष्टि नष्ट होती है और जो आसक्ति से उपभोग को गले लगाते हैं वह अनन्त दुःख भोगते हैं।
दीपक के रूप में जगमगाहट देखकर पतंगा में उपभोग की लालसा उत्पन्न होती है इसलिये वे दीपक पर झपट्टा
मारते हैं और अग्नि में जलकर खाक हो जाते हैं। इस प्रकार माया स्त्री रूप से उपभोग की लालसा से जीवों को
भुलावा देती है। जो हरिचरण से विमुख रहते हैं, उनको ही माया भुलावा देती है। फिर मैंने मधुकरी की वृत्ति से
भ्रमर को गुरू बनाया। दूसरों को दुःख दिये बिना अपना कार्य पूरा करना होता है। उसके भी लक्षण सुन लो।
स्तोकं स्तोकं ग्रसेद् ग्रासं देहो वर्तेत यावता।
गृहानहिंसन्नातिष्ठेद् वृत्तिं माधुकरीं मुनिः ॥ ९॥
भ्रमर फूल को बिना रौंदे उसमें प्रवेश करता है और अपना काम कर लेता है। वैसे भ्रमर की बुद्धि अच्छी
रहती है। यही बात योगियों की है। वह घर-घर जाकर मधुकरी माँग कर अपना निर्वाह करता है। गृहस्थों को
कष्ट नहीं देता। समर्थ अथवा दुर्बल ऐसा भेदभाव न कर वह केवल प्राण रक्षा के लिए भिक्षा माँगता है। भ्रमर
कमलिनी में घुसकर परिमल पर लुब्ध हो जाता है। सूर्यास्त के समय कमल की फाँक बन्द हो जाती है और वही
भ्रमर के लिये बन्धक हो जाती है। जो सूखी हुई लकड़ी में प्रवेश कर जाता है वही कमलदल में फँस जाता है।
प्रेमिका कहीं दुःखी न हो जाय इसलिये स्तब्ध रहता है। बाहर निकलने का रास्ता नहीं ढूँढ़ता। उसी प्रकार
संन्यासी भी यदि एक ही जगह आसक्त होकर रह जाय तो वही उसके लिये बन्धन हो जाता है। वह विषय के
लोभ में लिप्त हो जाता है।
अणुभ्यश्च महद्भ्यश्च शास्त्रेभ्यः कुशलो नरः।
सर्वतः सारमादद्यात्पुष्पेभ्य इव षट्पदः॥ १०॥
कितना ही छोटा फूल क्यों न हो लेकिन वहाँ भ्रमर का अनादर नहीं होता। उसमें घुस कर वह परिमल का
सेवन करता रहता है। जो पूरी तरह विकसित कमलिनी हैं उनमें घुसकर भी वह उसका सार-अंश ले लेता है।
उसी प्रकार योगी भी यथाशास्त्र तथा व्यवस्थित आदि का विचार या छोटे-बड़े तर्क का विचार करते नहीं बैठते।
केवल सार-तत्त्व ग्रहण करते हैं। वेदान्त में वर्णित ब्रह्मस्थिति का भी वे समुचित सम्मान करते हैं। उसी प्रकार
अन्य स्रोतों आदि में वर्णित ब्रह्मव्युत्पत्ति का भी आदर करते हैं। पण्डितों का वचन मानते हैं, उसी प्रकार यदि
कोई साधारण आदमी कोई हित की बात करता है तो उसे भी आदरणीय मानकर उसमें का सार ग्रहण करता है।
पति के हृदय में प्रेम उत्पन्न होने के लिये जिस प्रकार कुलवधु सास-ससुर का सम्मान करती है उसी प्रकार उस

१९८ श्रीमद् एकनाथी भागवत
प्रेम को दृष्टि में रखकर उनके नौकर चाकरों को भी आदर देती है। पानी और दूध भले ही मिल जाएँ लेकिन
जिस प्रकार राजस उसमें से दूध ही ग्रहण करता है, उसी प्रकार योगी भी विवेकपूर्वक केवल सार अंश ही ग्रहण
करता है। समस्त प्राणियों में भगवान के प्रति भक्ति यही मुख्य सारांश है इसे ध्यान में रखना चाहिये। हे महाबाहु!
यही निष्ठा जिसके मन में जम जाती है उसे स्वप्न में भी नुकसान नहीं होगा। इस भरे-पूरे संसार में जो सारग्रही
होता है वही योगी है। इस प्रकार अवधूत ने यदू को गुरु के लक्षण बताये। अवधूत ने आगे कहा, हे राजा, मैंने दो
प्रकार की मक्खियों को अपना गुरु बनाया—एक थी मधुमक्खी और दूसरी थी सादी मक्खी।
सायंतनं श्वस्तनं वा न संगृह्लीत भिक्ष्रितम्।
पाणिपात्रोदरामत्रो मक्षिकैव न संग्रही ॥ ११॥
देखो! घर की मक्खी भले ही चीनी के ढेर पर बैठी रहे लेकिन वह अपने हाथ से मुँह में चीनी डालती है
लेकिन उसके पास उसका संग्रह नहीं होता। योगी संन्यासियों का भी यही हाल होता है। भिक्षा में जो भी मिले
उसे मुँह में डालना, संग्रह कुछ नहीं करना। हाथ में भिक्षापात्र और एकत्र करने के लिये पेट। इसके अतिरिक्त
संग्रह करने के लिये कोई घर या बर्तन नहीं होता।
सायंयनं श्वस्तनं वा न संगृह्लीत भिक्षुकः।
मक्षिका इव संगृह्लीन् सह तेन विनश्यति ॥ १२॥
भिक्षु के पास सुबह तथा शाम के लिये अन्न का संग्रह नहीं होता। संग्रह करने पर उसका विनाश होता है।
इसी सम्बन्ध में मैंने मधुमक्खी को गुरु बनाया। कैसे-कैसे कठिन स्थानों पर मधुमक्खी मधु का संग्रह करती है।
मधु ले जाने वाले लोग जब आते हैं तो वह संग्रह ही उसके विनाश का कारण होता है। संग्रह के लालच में वे
कठिन से कठिन किनारों पर छत्ता लगाती हैं। वैसी जगहों पर भी मधु निकालने वाले लोग पहुँच जाते हैं और
छत्ता झाड़ते हैं। उसके साथ ही मक्खियों का ढेर भी नीचे गिर पड़ता है। इस प्रकार संग्रह के फेर में प्राणनाश
होता है। संसार की यह रीति देखकर भक्त, भिक्षु, योगी तथा अन्य सज्जनों को संग्रह के चक्कर में नहीं पड़ना
चाहिये। सत्कर्म का आचरण कर धर्म का संग्रह करना चाहिये यह मर्म न समझ अधम लोग धन के लालच में
नष्ट हो जाते हैं। द्रव्य विनाश का फल है उसी प्रकार नाश का भी मूलकारण है और विशेष नाश का विस्तीर्ण
स्थान स्त्री है। जीवन के विनाश का प्रमुख कारण है कनक और कांता। इनके प्रति जितनी अधिक आसक्ति होती
है उतना ही संसार का दुःख भी बढ़ता है। कनक और कांता इनके प्रति जिसके मन में अरुचि है वही जन में
जनार्दन है। जिसे आत्मसुख की इच्छा है उसे स्त्रियों का संसर्ग नहीं करना चाहिये। इसीलिये मैंने विशेष रूप से
हाथी को गुरु बनाया।
पदाऽपि युवतीं भिक्षुर्न स्पृशेद्दारवीमपि।
स्पृशन्करीव बध्येत करिण्या अङ्गसङ्गतः ॥ १३॥
जरा देखो, साठ वर्ष तक जीवित रहने वाले हाथी के सामने मनुष्य की औकात ही क्या है? लेकिन ये
हाथी, हथिनी के शरीर संग की लिप्सा के कारण मनुष्य के बन्धन में फँस जाते हैं जो मनुष्य को अपने सामने
फटकने नहीं देता वह हाथी स्त्री के कारण मनुष्य का दास बन जाता है। उसके इशारे पर उठता बैठता है और
माथे पर अंकुश की मार सहता है। इसलिये जो धर्मनिष्ठ संन्यासी हैं उन्हें यदि संसार पर विजय प्राप्त करनी है

तो स्त्रियों को देखते ही तत्काल भाग जाना चाहिये। न स्त्री का दर्शन करे न उससे भाषण करे। स्त्री पर दृष्टि
पड़ते ही पलायन करना चाहिये। भागते-भागते यदि लकड़ी की पुतली भी मार्ग में आ जाय तो बुद्धिमान व्यक्ति
को उसका स्पर्श भी नहीं करना चाहिये। निर्जीव स्त्री भी पुरुष को कष्ट दे सकती है। अनिरुद्ध ने उषा को स्वप्न
में देखा और चित्ररेखा उसे भगा कर ले गयी। कृष्ण जैसा उसका सखा होते हुए भी बाणासुर ने उसे बाँध कर
रखा। उसे छुड़ाने के लिये श्रीहरि दौड़कर आया तो शंकर बीच में आ गये। दोनों में तुमुल युद्ध हुआ। इस प्रकार
हरिहर भिड़े हुए थे लेकिन स्वप्न में जिस स्त्री ने बाँध रखा था उससे प्रयत्न करने पर भी वे अनिरुद्ध को नहीं
छुड़ा सके। फिर औरों की क्या बात है ? देखो जिसे कोई बाँध नहीं सकता उसे भी जब स्वप्न की स्त्री ने बाँध
लिया तो फिर यदि यथार्थ की स्त्री हाथ पकड़ ले तो उसका छुटकारा कैसे हो पायेगा ? स्वयं को 'पुरुष' कहते हैं
लेकिन आखिर स्त्रियों के पैरों पर गिर पड़ते हैं। उन्हें मुक्ति कैसे मिलेगी ? स्त्रियों की संगति में पतन ही पतन है।
नाऽधिगच्छेत स्त्रियं प्राज्ञः कहिचिन्मृत्युमात्मानः।
बलाधिकैः स हन्येत गजैरन्यैर्गजो यथा ॥ १४ ॥
गजराज हथिनी के साथ क्रीड़ा कर रहा था तभी अन्य बलवान हाथियों ने उस पर आक्रमण किया और
उसे मार डाला। उनमें जो प्रबल हाथी था उसने सारी हथिनियों का भोग कर डाला। सारांश यह कि विनाश का
मूल कारण स्त्री है। अहिल्या के सम्बन्ध को लकर ही गौतम ने इन्द्र की बदनामी की। भस्मासुर का नाश भी स्त्री
संगति के ही कारण हुआ। तिलोत्तमा जैसी स्त्री को देखकर कर सुंद और उपसुंद सगे भाई होते हुए भी, उसकी
अभिलाषा के कारण अपना रिश्ता भूल गये और रणभूमि में एक-दूसरे पर प्रहार कर मर गये। आखिर स्त्री भोग
नहीं ही हो पाया। स्त्री मृत्यु का कारण है इसे ध्यान में रखो। इसी प्रकार पूर्व कल्प की एक कथा है। अवतारी
श्रीकृष्ण को शिशुपाल सदा कष्ट देता था। वह उनकी कांता भगाकर ले गया। सारांश यह कि चाहे देवता हों या
मनुष्य हो या पशु ही क्यों न हो लेकिन उसके विनाश का कारण स्त्री संगति ही है। उसी के कारण घर पर
आसक्ति होती है। कलह उत्पन्न करने के लिये भी स्त्री ही कारण होती है। वेश्याओं की संगत तो मृत्यु का द्वार
है। इसलिये भले ही मृत्यु आ जाय लेकिन वेश्या के साथ समागम नहीं करना चाहिये। अब इसका अर्थ यह
कदापि नहीं है कि वेश्या के साथ समागम करने से विशेष नाश होता है और अपनी स्त्री से रत होने में बाधकता
नहीं है क्योंकि बार-बार स्त्री सेवन करने से काम बढ़ता है और काम के बढ़ने से अधःपतन ही होता है। सारांश
यही है कि स्त्री समागम इतना भयंकर है कि यदि भूल से भी स्त्री संग हुआ तो वह नरक में पहुँचा देगा। नरक
में जायेगा यह बात निश्चित है। वेश्याएँ तो नरक का ही रूप हैं। एक स्त्री और दूसरा धन ये दोनों इस लोक के
भीषण अनर्थ हैं। इसके कारण जीवन का मुख्य उद्देश्य अर्थात आत्मप्राप्ति तो दूर ही रह जाती है, हाँ प्राणघात
अवश्य होता है।
न दे यं नोपभोग्यं च लुब्धैर्यद्दुःखसंचितम्।
भुङ्क्ते तदपि तच्चान्यो मधुहेवार्थविन्मधु ॥ १५ ॥
भाग्यहीन पुरुष न स्वयं खाता है, न धर्म करता है और न घरवालों को ही खाने देता है। मधुमक्खी की
तरह संग्रह करता रहता है। मधुमक्खी बड़े प्रयत्न से छत्ता लगाती है और उसमें शहद भरा रहता है। उसे देखकर
लोगों की दृष्टि उस पर लगी रहती है कि किस उपाय से वह शहद प्राप्त किया जाय। इस प्रकार बिना किसी की
चिन्ता किये लोग छत्ता तोड़ते हैं, बर्तनों में शहद भरते हैं और श्रीमान लोग उसके माधुर्य का सेवन करते हैं।

२०० श्रीमद् एकनाथी भागवत
बेचारी मक्खियाँ तो शहद खाती नहीं, जो शहद निकालते हैं उनके हाथ शहद से सने रहते हैं और जिन पर
लक्ष्मी प्रसन्न रहती हैं वे उसका स्वाद लूटते हैं। उसी प्रकार कंजूस का धन यक्ष की तरह होता है, न दान न धर्म
का संरक्षण, चोर मार कर उठा कर ले जाते हैं और चोर को सजा देकर राजा उसे उठा कर ले जाता है। जो कष्ट
करके धन संग्रह करते हैं उसका वे उपभोग नहीं कर पाते, वह कोई तीसरा ही ले जाता है। भाग्य की लीला
विचित्र है। गृहस्थ आदमी बड़े प्रयत्न से भोजन तैयार करता है और संन्यासी बिना परिश्रम किये उसे खा जाता
है। इसलिये भाग्य ही प्रमुख चीज है। इसलिये जो भाग्य के भरोसे रहता है वह संग्रह की लालसा नहीं रखता।
आखिर भाग्य का ही सहारा रहता है लेकिन लोग व्यर्थ ही कंजूसी करते हैं।
सुदुःखोपार्जितैर्वित्तैराशासानां गृहाशिषः।
मधुहेवाग्रतो भुङ्क्ते यतिर्वै गृहमेधिनाम्॥ १६॥
परिश्रमपूर्वक द्रव्य एकत्र कर पुरुष गृहस्थी का सामान तथा नाना प्रकार की चीजें अपने भोग के लिये
एकत्र करता है, उसके पकवान तैयार करता है, तभी ऐन वक्त पर कोई अन्नार्थी ब्रह्मचारी अथवा संन्यासी अतिथि
बनकर आता है और उस गृहस्थ के पहले ही खाना खाकर चला जाता है। गृहस्थाश्रमी उसकी ओर देखता रह
जाता है। जिस प्रकार शहद की मक्खियों को भगा कर शहद पीने वाला शहद पीता है, वैसी ही स्थिति उस
गृहस्थ की होती है। तैयार किया हुआ भोजन संन्यासी खा जाते हैं। यदि संन्यासी विन्मुख चला जाय तो सारे
पुण्य व्यर्थ चले जाते हैं। यथा समय अतिथि के आ जाने से धर्म की रक्षा होती है। अर्थ संग्रह में क्या दोष है
उसका तत्त्व मैंने तुम्हें बताया। अब मैंने 'मृग' को गुरु क्यों बनाया उसका वृत्तांत सुनो।
ग्राम्यगीतं न शृणुयाद् यतिर्वनचरः क्वचित्।
शिक्षेत हरिणाद् बद्धान्मृगयोर्गीतमोहितात् ॥ १७॥
जो दुर्व्यसनियों की वार्ता या वेश्याओं द्वारा गाये गीत चाव से सुनते हैं उसे निश्चय ही बन्धन होता है।
एकटक दीपक की ओर देखने वाला मृग घंटानाद सुनकर पागल-सा हो जाता है और उसे सामने कुछ भी नहीं
दिखाई देता। अन्त में वह जाल में फँस जाता है। वेश्याओं का गाना सुनकर कौन नहीं मोहित होता ? प्रायः सभी
मृग की तरह स्वार्थ से मोहित होकर गिर पड़ते हैं। जिसे तपस्वियों का मुकुटमणि कहते हैं तथा जिसकी पहले
कभी स्त्री से भेंट नहीं हुई थी वह ऋष्यश्रृंग एकाएक स्त्री गीत के भुलावे में आ गया।
नृत्यवादित्रगीतानि जुषन् ग्राम्याणि योषिताम्।
आसां क्रीडनको वश्य ऋष्यशृङ्गो मृगीसुतः॥ १८॥
वीणा की तार से निकली हुई मधुर झंकार, वेश्या का गायन तथा नृत्य आदि देखकर पुरुष गले में रस्सी से
बँधे हुए बन्दर की तरह स्त्री के वश में हो जाते हैं। हिरनी के गर्भ में जन्म लेने वाला वह जो तपस्वियों में श्रेष्ठ
था, जिसने स्त्री का दर्शन या भाषण नहीं सुना था वह ऋष्यश्रृंग स्त्री दर्शन के साथ ही उनके वश में हो गया,
स्त्रियों के पीछे दौड़ पड़ा और उनके वचनों पर चलने लगा। जिस प्रकार मदारी का बन्दर नाचता है, उसी प्रकार
वह स्त्रियों के साथ नाचने लगा, युवतियों के दर्शन से पागल हो गया, उसके मन में विवेक नाम की कोई चीज
ही नहीं रह गयी। वह तप का श्रम भूल गया, पिता विभांडक को भी भूल गया, ब्रह्मचर्य का संकल्प भी भूल
गया और स्त्रियों के अनुरोध पर नाचने लगा। संसार में स्त्रियों के जैसा उपसर्ग और कोई नहीं है। स्त्रियों के साथ

अष्टम अध्याय २०१
विनोद भी ठीक नहीं है। स्त्री संग सभी के लिये दुःखदायी है। वेश्याओं का गीत नहीं सुनना चाहिये, उन्हें
बिलकुल वर्जित रखना चाहिये। सच तो यह है कि जहाँ हरिकीर्तन हो रहा हो वहाँ केवल परमार्थ की दृष्टि से
भक्तिगीत सुनना चाहिये। जिसमें रामनाम का वर्णन नहीं है ऐसे ग्राम्यगीत कभी नहीं सुनिये चाहिये। कौतूहल के
लिए भी उधर नहीं झाँकना चाहिये। अब 'मछली' को गुरु बनाने के भी लक्षण सुनो। वह केवल रसना की
लोलुपता से अपने प्राणों से हाथ धो बैठता है।
जिह्वयाऽतिप्रमाथिन्या जनो रसविमोहितः।
मृत्युमृच्छत्यसद्बुद्धिर्मीनस्तु बडिशैर्यथा ॥ १९॥
अर्थसंग्रह से जीवन का नाश, स्त्रियों की संगत से अधःपतन तथा रसना की लोलुपता से मृत्यु, इस प्रकार
जीव को तीन प्रकार के आघात होते हैं। जिसका जिह्वालौल्य प्रबल है, उसके हिस्से में अनर्थ ही आता है। रसना
अनेक दुःखों का भोग कराती है। रसना की लालसा अर्थात भक्ष्य का माधुर्य जबर्दस्त है, उसके लालच में मछली
बंसी में लगाया हुआ भोजन खाती है लेकिन तभी गले में काँटा धँसता है और प्राणपखेरू उड़ जाते हैं। वैसे
देखने पर विषयरस उत्तम मालूम होता है लेकिन उसमें गुप्त रोग की फाँस छिपी रहती है। जो आसक्ति से उस
रस का सेवन करते हैं वे भवरोग से छटपटाते रहते हैं। काँटे में फँसी हुई मछली जिस प्रकार जीवन और मृत्यु के
बीच छटपटाती रहती है उसी प्रकार रोग से ग्रस्त मनुष्य दुःख भोगता रहता है। जिसमें रसना लोलुपता का दोष है
उसे सुबुद्धि कहाँ से आयेगी? केवल विषयों के संसर्ग के कारण वह अनन्त जन्म-मरण का दुःख भोगता रहता
है। केवल विषय रस का सेवन करने के कारण उसे करोड़ों जन्म भोगने पड़ते हैं। अगर ऐसा भोग न भोगना पड़े
तो हे राजा! एक उदाहरण सुनाता हूँ। इन्द्रियों की सजीवता सर्वथा रसना पर निर्भर रहती है। रसना के द्वारा
रसग्रहण करने से इन्द्रियों में उन्मत्तता आती है। जब इन्द्रियों की शक्ति प्रबल हो जाती है तो वह अधःपतन
कराती है। यदि रसना पर विजय नहीं प्राप्त की तो भवव्यथा से कभी छुटकारा नहीं मिल पाएगा। आहार के बिना
शरीर नहीं चलता, लेकिन उसका सेवन करने से इन्द्रिय प्रबल हो जाते हैं, इसलिये रसना को जीतने का मूल
कारण मालूम होने से सभी दुःख समाप्त हो जाते हैं।
इन्द्रियाणि जयन्त्याशु निराहारा मनीषिणः।
वर्जयित्वा तु रसनं तन्निरन्नस्य वर्धते॥२०॥
देखो! साधक आहार वर्ज्य कर इन्द्रियों को जीतने की ज्यों-ज्यों कोशिश करता है, त्यों-त्यों रसना और भी
बढ़ जाती है। वह कम नहीं होती। इन्द्रियों में आहार से ही बल आता है। निराहार से जैसे-जैसे वे इन्द्रिय
व्याकुल हो जाते हैं वैसे-वैसे रसना और भी अधिक बलवती हो जाती है। रसना का जोर निराहार से घटता नहीं,
अपितु बढ़ जाता है।
तावज्जितेन्द्रियो न स्याद् विजितान्येन्द्रियः पुमान्।
न जयेद्रसनं यावज्जितं सर्वं जिते रसे॥२१॥
कहते हैं कि उपवास से इन्द्रियों पर विजय प्राप्त होती है, किन्तु यह बात मिथ्या है क्योंकि अन्नग्रहण करने
पर वे पुनः बलशाली हो जाती हैं और अपने-अपने कर्मस्थल पर जागृत हो जाती हैं। जब तक रसना को नहीं
जीता तब तक 'जितेन्द्रिय' कहना मिथ्या है। जब विषयचैतन्य और इन्द्रियचैतन्य में ऐक्य हो जाता है, तभी रसना

२०२ श्रीमद् एकनाथी भागवत
पर विजय प्राप्त हुई ऐसा समझना चाहिये। समस्त मधुर पदार्थों में जो मधुर है उस पर जिसने विजय प्राप्त कर
ली उसी के वश में रसना रहती है। उसे रस-अपचन की बाधा नहीं होती। रसना विजयी का अभियान
ब्रह्मसायुज्यता में स्थान पाता है। वही परमानन्द का सुख भोगता है।
पिङ्गला नाम वेश्याऽऽसीद् विदेहनगरे पुरा।
तस्या मे शिक्षितं किंचिन्निबोध नृपनन्दन ॥ २२॥
अवधूत कहते हैं—हे राजा! देखो, मैंने एक वेश्या को गुरु बनाया। हे चतुर! उससे मैंने जो बातें सीखीं,
उन्हें सुन लो। किसी समय जनक राजा की नगरी में 'पिंगला' नाम की वेश्या रहती थी। उसकी आशा निराशा में
बदलने पर उसमें तीव्र वैराग्य उत्पन्न हुआ।
सा स्वैरिण्येकदा कान्तं संकेत उपनेष्यती।
अभूत् काले बहिर्द्वारि बिभ्रती रूपमुत्तमम् ॥ २३॥
वह स्वच्छन्द विचरण करती थी। शाम को नाना प्रकार के शृंगारों से अलंकृत होकर वह दरवाजे पर खड़ी
रहती थी। रूप तो उत्तम था ही, तिस पर मनोरम शृंगार किया हुआ। इस प्रकार वह सज-धज कर उत्तम पुरुष
की बाट जोह रही थी।
मार्ग आगच्छतो वीक्ष्य पुरुषान् पुरुषर्षभ।
ताञ्छुल्कदान् वित्तवतः कान्तान् मेनेऽर्थकामुका ॥ २४ ॥
गुणी, रूपवान तथा धनवान होने के साथ-साथ कामशास्त्र में भी निपुण तथा धन से सम्पन्न करने वाले
पुरुष की वह प्रतीक्षा कर रही थी। हे पुरुषश्रेष्ठ, सुनो! राह में किसी पुरुष को आते देख वह अपने नेत्रकटाक्ष
तथा शृंगाराभिनय से उसे इशारा करती थी।
आगतेष्वपयातेषु सा संकेतोपजीविनी।
अप्यन्यो वित्तवान् कोऽपि मामुपैष्यति भूरिदः ॥ २५॥
किसी के ऊपर कंकड़ फेंकती, तो किसी को कहती, “महाराज! पान तो खाकर जाइये। राह चलने वालों
को आँख मारती तो किसी को देखकर व्यर्थ ही लज्जा का अभिनय करती। मन की योजना को पूरा करने के
लिये वह उपर्युक्त अनेक प्रकार के संकेत किया करती थी। लेकिन उधर से जाने वाले कामकाजी लोग उसकी
ओर नहीं देखते थे। ऐसे लोगों को वह 'दरिद्री, दुर्बल' कहकर निन्दा करती थी, अब कोई तो धन देने वाला
नौजवान आये और मुझे स्वीकार करेगा कह कर अपने मन को सांत्वना देने लगी। "
एवं दुराशया ध्वस्तनिद्रा द्वार्यवलम्बती।
निर्गच्छन्ती प्रविशती निशीथं समपद्यत ॥ २६॥
इस प्रकार निराशा से भरी, उद्वेग के कारण नींद से भी वंचित हुई, दरवाजे के पास खड़ी पुरुषभोग की
इच्छा से व्याकुल। घर के अन्दर जाती, दो चार कदम चलकर पुनः वापस चली आती। इस प्रकार भीतर-बाहर
करते-करते आधी रात बीत गयी। पुरुष के आने का समय बीत चला, रात समाप्त हो चली। लोग निद्रा में लीन।
लेकिन उस समय पिंगला व्यथित होकर पड़ी थी।