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सर्वकोश
श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

पृष्ठ 202, कुल 869 में से

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१८६ श्रीमद् एकनाथी भागवत
भी प्रवेश नहीं कर पाता। सब कुछ अकस्मात ही हो जाता है। कालरूप इस नदी की जाति बड़ी विचित्र है। अत्यन्त
सूक्ष्म होने के कारण उसका निश्चित स्वरूप ध्यान में नहीं आ पाता। उस सूक्ष्म गति की यथार्थ स्थिति अब जान
लो। कहते हैं दीप वही है लेकिन उसकी शिखा क्षण प्रतिक्षण विलय होती है और दूसरी उत्पन्न होती है। लेकिन
यह सूक्ष्म बात लोगों की समझ में नहीं आती और अन्त में वह दीप बुझ जाता है। नदी का पानी जो प्रतिक्षण बहता
रहता है वह भी सदा नया ही रहता है लेकिन अनाड़ी लोग सारा पानी एक ही समझते हैं। उसी प्रकार काल की गति
सब की समझ में नहीं आती। यदि देह को ही देखा जाय तो काल उसे ग्रसता ही रहता है। बाल्य, कौमार्य अथवा
युवावस्था में काल भी निकट ही रहता है लेकिन कोई उसे नहीं देखता। इसीलिये मैंने काल सूर्य को गुरु बनाया।
उससे मैंने क्या सीखा यह भी सुन लो।
गुणैर्गुणानुपादत्ते यथाकालं विमुञ्चति।
न तेषु युज्यते योगी गोभिर्गा इव गोपतिः ॥५०॥
सूर्य धीरे-धीरे अपनी किरणों से रसों के साथ पृथ्वी पर के समुद्र आदि का पानी सोख लेता है और वही
बरसात में उस जल की वृष्टि कर लोगों को अनेक प्रकार से तृप्त कर देता है। किन्तु सूर्य अपने किरणों से जो
शोषण क्रिया करता है वह किसी की समझ में नहीं आती फिर भी मेघों के द्वारा वृष्टि कराकर वह समस्त लोगों
के साथ पृथ्वी को शीतल कर देता है। योगियों की बात भी वैसी ही है। वह थोड़ा बहुत जो किसी से लेता है
उसका कल्याण करने के लिये हजार प्रकार से उसके मनोरथ पूरे करता है। आत्मानन्द में निमग्न योगी जिस
किसी का भी कुछ सेवन करते हैं, उनके सारे मनोरथ परिपूर्ण होते हैं और अन्त में वे उन्हें निष्काम कर
विश्रामस्थल तक ले जाते हैं। इस प्रकार योगी अपने योगबल से इन्द्रियों के द्वारा विषयों का सेवन करते रहते हैं।
उन्हें यदि कोई कुछ देता है तो वह योग्य समय पर कृपा के बल से सन्तुष्ट कर देते हैं। उनमें विषय देते समय
या लेते समय किसी प्रकार की आसक्ति नहीं होती। जल का शोषण करते समय या वर्षा के रूप में उसे वापस
करते समय सूर्य जिस प्रकार अलिप्त रहता है उसी प्रकार वे भी अलिप्त रहते हैं।
बुद्धयते स्वेन भेदेन व्यक्तिस्थ इव तद्गतः।
लक्ष्यतेस्थूलमतिभिरात्मा चावस्थितोऽर्कवत् ॥५१॥
जलाशय में सूर्य का प्रतिबिम्ब दिखायी देता है इसलिये मूढ़ लोग कहते हैं कि सूर्य जलाशय में डूब गया।
यदि उसमें का पानी हिलता है तो समझते हैं कि सूर्य ही हिल गया और यदि जल गन्दा होता है तो मानते हैं कि
सूर्य गन्दा हो गया। लेकिन सूर्य उस जलाशय का स्पर्श भी नहीं करता और आकाश में निर्बाध रूप से रहता है,
उसी प्रकार योगी की योग्यता देहकर्म में रहते हुए भी देहातीत रहती है। लोग कहते हैं कि देहबुद्धि के छंद से
योगी देह में विचरण करता है। उसी प्रकार वह देह के अनेक प्रकार के बन्धनों से बँधा रहता है, ऐसा भी वे
अपनी स्वबुद्धि से कहते हैं। उसमें देह का मिथ्याभिमान रहता है। योगी का यह गुह्यज्ञान किसी की समझ में
नहीं आता। रस्सी के साँप ने क्या किसी को काटकर मारा है? उसी प्रकार आत्मा चिदाकाश में रहते हुए मिथ्या
देह में मिथ्या रूप से ही प्रतिबिम्बित होकर देहकर्म को दर्शाता है, इसीलिये वह कर्म उसे बाधक नहीं होता।
अपना प्रतिबिम्ब वह जल में देखता है लेकिन यह नहीं कहता कि मैं जल में डूब गया हूँ। उसी प्रकार वह देह
से भिन्न है, इसका जिसे पक्का ज्ञान हो गया है वह देहकर्म से नहीं डरता। मृगजल की बाढ़ देखकर जो नाव
पकड़ने के लिये दौड़ पड़ते हैं,वे मूर्ख हैं। उसी प्रकार संसार खुद ही मिथ्या है। मूर्ख उसे भयंकर समझता है