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सर्वकोश
श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

पृष्ठ 203, कुल 869 में से

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पृष्ठ 203

सातवाँ अध्याय १८७
इसलिये घरबार, स्त्री, बच्चे, जमीन-जायदाद आदि पर अधिक प्रेम करना ही नहीं चाहिये। इसलिये अवधूत राजा
को कपोतपक्षी की कथा सुनाने लगे।
नातिस्नेहः प्रसंगो वा कर्तव्यः क्वापि केनचित्।
कुर्वन् विन्देत संतापं कपोत इव दीनधीः ॥ ५२ ॥
संसार दुःख का मूल कारण है, स्त्री की आसक्ति ! जहाँ स्त्री के प्रति लंपटता का जोर अधिक रहता है,
वहीं सारा दुःख रहता है। स्त्री से पुत्र होते हैं और उन पर विचित्र मोह जड़ता है। इसलिये सांसारिक लोग दुःख
के पात्र बनते हैं। आसक्ति और मोहजाल से मनुष्य पराधीन होकर पग-पग पर विलक्षण दुःख भोगते रहते हैं।
इसलिये किसी को किसी के प्रति आसक्ति अथवा स्नेह नहीं रखना चाहिये। जिसने अतिस्नेह किया उसे दुःख
भोगना ही पड़ेगा। हे राजेश्वर ! स्नेह और दुःख का परिणाम मालूम हो इसलिये तुम्हें कपोत-कपोती की कथा
सुनाता हूँ, उसे शांतचित्त होकर सुनो।
कपोतः कश्चनारण्ये कृतनीडो वनस्पतौ।
कपोत्या भार्यया सार्धमुवास कतिचित्समाः ॥ ५३ ॥
एक वन में एक कपोत पक्षी रहता था। वह कपोती के प्रेम से अत्यन्त क्षुब्ध हुआ। स्त्री सुख की लालसा
से उसने एक कठिन पेड़ देखकर उस पर अपना घरौंदा बनाया। वन में विहार करने वाले उस कपोत ने स्त्री के
मोह में पड़कर अपनी स्त्री की संगति में काफी समय व्यतीत किया।
कपोतौ स्नेहगुणितहृदयौ गृहधर्मिणौ।
दृष्टिं दृष्ट्याऽङ्गमङ्गेन बुद्धिं बुद्ध्या बबन्धतुः ॥ ५४ ॥
कपोत और कपोती का परस्पर बहुत प्रेम था। उनका वह प्रेम निरन्तर बढ़ता ही गया। हृदय में नित नयी
आसक्ति उत्पन्न होने लगी। वे कामुक दृष्टि से एक दूसरे की ओर देखते, अनेक प्रकार की कामचेष्टाएँ करते,
एक दूसरे को प्रेम से सहलाते, एक दूसरे को गले लगाते। तन से या मन से एक दूसरे को अलग न होते, दोनों
दो शरीर एक प्राण बनकर रहते, खाना-पीना साथ-साथ। ऐसा निरन्तर चल रहा था।
शय्यासनाटनस्थानवार्ताक्रीडाशनादिकम्।
मिथुनीभूय विस्रब्धौ चेरतुर्वनराजिषु ॥ ५५ ॥
खाते समय उन्हें जो वस्तु अत्यन्त प्रिय लगती उसे वे एक-दूसरे को खिलाते। कपोत बड़े कष्ट से जो
चीज ले आता उसे वह प्यार से अपनी स्त्री को देता। स्त्री को छोड़कर वह कहीं नहीं जाता था। एक दूजे का
हाथ थामकर वे भीतर-बाहर टहलते। वे सदा एकान्त में बैठते, दोनों एक ही जगह रहते, नाना प्रकार की क्रीड़ा
करते, नाना प्रकार के बिहार करते और आनन्दपूर्वक अनेक प्रकार के खेल खेलते। स्त्रियाँ जब एकान्त में होती
हैं तो बड़ी मीठी बातें करती हैं, पति के मन में सास-ससुर के सम्बन्ध में विकल्प भर देते हैं, देवर-भाभी की
निन्दा करती हैं और मीठी बातों से पति को भुलावा देती हैं। खैर! वे एक ही आसन पर बैठते, एक-दूसरे से
टिक कर बैठते और रात-रात भर एक ही शय्या पर सोते। इस प्रकार स्त्री समागम सुख पर विश्वास कर वे
अपने हित-अहित को भूल गये। गृहिणी के वैभव में ही वह नाचने लगा। वन उपवन में उनका समागम होता
था। घरौंदा केवल नाम मात्र के लिये था। विषय विलास सब कुछ वन में ही होता था।