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सर्वकोश
श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

पृष्ठ 212, कुल 869 में से

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पृष्ठ 212

१९६ श्रीमद् एकनाथी भागवत
आयेगा ? सागर के ऊपर मेघवृष्टि होने से वह जीवन व्यर्थ हो जाता है। लेकिन योगी में यह बात नहीं है।
उसकी यदि सेवा की जाय तो वह उसे व्यर्थ नहीं जाने देता। योगी यदि थोड़ी भी सेवा ग्रहण करता है तो उतने
ही से वह भव्यथा का निवारण करता है। इसलिये मुमुक्षुजनों को सदा हरिभक्तों की सेवा करनी चाहिय।
समृद्धकामो हीनो वा नारायणपरो मुनिः।
नोत्सर्पेत न शुष्येत सरिद्भिरिव सागरः ॥ ६ ॥
पर्जन्यकाल में सभी नदियाँ अपार जल लेकर आती हैं लेकिन उससे समुद्र का जलस्तर नहीं बढ़ता।
ग्रीष्मऋतु के आते ही नदियों का प्रवाह बन्द हो जाता है लेकिन उससे नदियों का वह स्वामी दुःखी नहीं होता।
उसी प्रकार योगी के पास नाना प्रकार की समृद्धियाँ यदि स्वयं भी चलकर आ जाएँ तो उससे उसका अहंकार
नहीं बढ़ता। यदि वह समृद्धि चली भी जाए तो उसका अंतःकरण दुःखी नहीं होता। वह सदा नारायणात्मक दृष्टि
से सुखानन्द में ही विचरण करता रहता है। अमीर होने पर भी ‘समृद्धि’ का भाव उसे नहीं छू पाता। यदि वह
दरिद्र भी हो जाय तो योगी को दरिद्रता मालूम ही नहीं होती। अमीरी हो या गरीबी, उसके लिये दोनों ही एक
समान हैं। उसे प्रपंच की आसक्ति नहीं होती। स्वात्मानुभव से वह तत्वतः नारायण स्वरूप ही हुआ रहता है।
प्रपंच का यह बन्धन बहुत कठिन है। इस सम्बन्ध में मैंने पतंगे को गुरु बनाया उसका किस्सा सुनो।
दृष्ट्वा स्त्रियं देवमायां तद्भावैरजितेन्द्रियः।
प्रलोभितः पतत्यन्धे, तमस्यग्नौ पतङ्गवत् ॥ ७ ॥
‘दैवी गुणमयी’ माया का सगुण-स्वरूप ही स्त्रियाँ हैं। प्राणियों में स्त्री-सुख भोगने की तीव्र इच्छा उत्पन्न
हुई। हावभाव आदि गुणों से तथा चंचल कटाक्ष से वे पुरुष के धैर्यरूपी कवच को तोड़कर हृदयप्रदेश में संचार
करती हैं। भीषण कटाक्ष के प्रहार से वे पुरुष का धैर्य नष्ट कर स्त्री रूप पाश में फँसा कर भोगरूपी कारागार में
जकड़ देती हैं। स्त्री भोग का सुख केवल दुःख है, इसे ध्यान में रखो। मधुर विष मुँह में डालने पर उसका
परिणाम प्राण नाश में ही होगा। दीपक के पास जाकर चिपकने से पतंगा को क्या सुख प्राप्त होता है ? जोर-जोर
से लिपट कर मृत्यु के मार्ग पर अवश्य ही लग जाते हैं। आगे वाले को मरा हुआ देखते हैं लेकिन पीछे वाले को
दीपक का मोह वैसा ही कायम है। उसी प्रकार स्त्री के काम में एक बलि चढ़ता है लेकिन दूसरा उस विषय में
आसक्त होता ही है। इस प्रकार विवेकहीन मूर्ख लोग स्त्रीसुख के लिये ललचाते हैं लेकिन उनके संसर्ग से आने
वाली मृत्यु नहीं टलती। दीपक के रूप के भुलावे में पतंगा जलकर तेल में गिर पड़ता है उसी प्रकार स्त्रियों की
संगति से निश्चय ही ‘अंधतम’ नामक नरक में पतन होता है।
योषिद्धिरण्याभरणाम्बरादिद्रव्येषु मायारचितेषु मूढः।
प्रलोभितात्मा ह्युपभोगबुद्ध्या पतङ्गवन्नश्यति नष्टदृष्टिः ॥ ८ ॥
देखो ! स्त्रियाँ, सुवर्ण, वस्त्र, अलंकार तथा रत्न ये सारी चीजें माया ने तैयार किये हुए पतन के साधन हैं।
एक स्त्री ही पहले नरक में ढकेलती है। सुवर्ण का लोभ तो उससे भी भीषण नरक, है। रत्न और आभूषण भी
तत्काल नरकुण्ड में ढकेलते हैं। अनर्थ के ये सारे स्थल एक स्त्री में सिमट गये हैं। ऐसी स्त्री दिखायी देते ही
लोग कहीं के नहीं रह जाते। शरीर में पहले ही पिशाच का संचार हुआ रहता है तिस पर दारू पीते ही फिर
मनुष्य के नाचने और उन्मत्त होने की पराकाष्ठा नहीं रहती। या जिस प्रकार कोई वाचाल व्यर्थ की गप हाँकने