श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१९४ श्रीमद् एकनाथी भागवत
में दुःख आता है उसी प्रकार बिना इच्छा किये ही अदृश्य प्राणी को बलात्कार से इन्द्रिय सुख भोगने को बाध्य
करता है। कोई भी दुःख भोगना नहीं चाहता किन्तु भाग्य जिस प्रकार बिना माँगे दुःख देता है, उसी प्रकार वह
सुख भी उसे भोगने को बाध्य करता है। ऐसा होते हुए भी लोग उसके लिये प्रयास करते ही हैं जिससे सारे
जीवन का विनाश होता है। इसलिये विषय की आस्था छोड़ परमार्थ के लिये भजन करना चाहिये। लेकिन तुम
कहोगे कि यदि परमार्थ के चक्कर में पड़ें तो यह देह बिना आहार के नहीं रह पायेगा। तो उसी का अनुभव लेने
के लिये मैंने अजगर को गुरु बना लिया।
ग्रासं सुमृष्टं विरसं महान्तं स्तोकमेववा।
यदृच्छयैवापतितं ग्रसेदाजगरोऽक्रियः ॥ २ ॥
अजगर बिना कुछ प्रयास किये सहज ही जो आहार मिलता है उसका सेवन करता है। वह घबरा कर
धीरज नहीं खोता। उसका निश्चय पक्का रहता है। स्वभावतः वह मुँह खोलता है और जो भी वस्तु मुँह में
सरलता से आती है— भले ही वह सरस हो या नीरस हो, उसे सन्तोषपूर्वक ग्रहण करता है। यही बात योगियों
की है। वे सर्वदा निजात्मस्थिति में ही तल्लीन रहते हैं। वे रस के प्रति कोई आसक्ति न रखते हुए जो भी सहज
रूप से मिल जाता है उसे ग्रहण करते हैं। योगी क्या सेवन करते हैं इसका पता रसना को भी नही चलता। रसना
की जानकारी के बिना जो आहार लिया जाता है वह स्वात्म दृष्टि से लिया जाता है। खट्टा, तीता आदि स्वाद वह
जानता है लेकिन वह सब कुछ एक ही स्वाद से—ब्रह्मरस भाव से ग्रहण करता है। वह सरस, नीरस ये भाव
नहीं जानता, आत्म सुख के माधुर्य से ही उसे स्वादिष्ट बना लेता है। मुँह खोलने पर यदि उसमें हवा भी भर
जाय तो वह अजगर का आहार बन जाता है। उसी से उसके शरीर का पोषण होता है। वही स्थिति योगियों की
भी रहती है। वे वायुभक्षण करके भी सुखी रहते हैं। आहार के लिये वे दूसरों के आगे याचना नहीं करते। कम,
अधिक, सरस, नीरस यह भावना ही उनमें नहीं होती। स्वभाव से ही, जो भी मुँह में आकर गिरता है उसे वे
शान्त चित्त से सेवन करते हैं।
शयीताहानि भूरीणि निराहारोऽनुपक्रमः।
यदि नोपनमेद्ग्रासो महाहिरिव दिष्टभुक् ॥ ३॥
अजगर को यदि लम्बे समय तक आहार न मिले तो भी उसकी स्थिरता नहीं टलती, वह अपने ही स्थान
पर वैसे ही लोटता रहता है। उसी प्रकार योगी को भी यदि बहुत समय तक आहार न मिले तो वह लम्बा आसन
लगाकर निद्रा के बिना भी सोया रहता है। निद्रा तो उसे आती ही नहीं लेकिन वह दिन-रात निजसुख की तंद्रा में
ही पड़ा रहता है। वह कोई बाह्य उपाय नहीं करता, भाग्य से जो मिलता है वही उसका भक्ष्य बन जाता है। जिस
समय जो कुछ भाग्य में होगा वह सब उस समय मिलेगा ही, इस निश्चय से उसका ज्ञान मलीन नहीं होता।
निजात्मबोध के कारण उसका निश्चय नहीं टलता।
ओजःसहोबलयुतं बिभ्रद्देहमकर्मकम्।
शयानो वीतनिद्रश्च नेहेतेन्द्रियवानपि ॥ ४ ॥
अजगर की शक्ति उद्दंड तथा देह और पराक्रम प्रचण्ड रहता है वह प्रयास के नाम पर कुछ भी नहीं करता।
केवल मुँह खोलकर पड़ा रहता है। योगी भी उसी प्रकार का होता है, उसमें शरीर सामर्थ्य होता है उसकी बुद्धि