श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसातवाँ अध्याय १९१
करती हैं। कुछ गन्दी और आलसी होती हैं। कुछ अत्यन्त झगड़ालू होती हैं, कुछ नाजुक और विलासिनी होती हैं।
लेकिन मेरी पत्नी वैसी नहीं थी। वह मेरे लिये सदा अनुकूल रही। वह यथार्थ में मेरी धर्मपत्नी थी और मेरे
अनुरूप आचरण करती थी। मैं धर्म कर्म की ओर प्रवृत्त होता तो वह भी भक्तिपूर्वक मेरी सहायता करती थी और
मुझमें जब कामेच्छा होती थी तो उसे भी पूरा करने में वह कुशल थी। सचमुच वह मेरे सिवा किसी देवता को नहीं
भजती थी। मुझे छोड़कर वह किसी तीर्थ को नहीं जाती थीं। मेरी बात का तो उसने कभी भी उल्लंघन नहीं किया।
इस प्रकार मेरी पत्नी रूपगुण तथा शील आदि से सुसम्पन्न, मेरे लिये सदा अनुकूल, पतिव्रता तथा अत्यन्त निर्मल
थी। वह महासाध्वी मुझे घर में अकेला छोड़ कर मुझे संकट में डालकर अपने पुत्रों के साथ स्वर्ग सिधर गयी।
सोऽहं शून्ये गृहे दीनो मृतदारो मृतप्रजः।
जिजीविषे किमर्थं वा विधुरो दुःखजीवितः ॥ ७० ॥
स्त्री गयी, पुत्र चले गये, अब मैं भी यहाँ किसके लिये रहूँ? लोकलज्जा और निन्दा के दुःख से मेरे प्राण
निकल जायेंगे। इतना दुःख आन पड़ा, अब लोगों को मुँह कैसे दिखाया जाय ? संसार का सुख तो नष्ट ही हो
गया। अब यदि जीवित रहा तो लोग मुझे मूर्ख कहेंगे। आग लगे ऐसे विधुर के जीने को। वह निन्दनीय और
लज्जास्पद रहता है। श्राद्ध का निमंत्रण भी कोई नहीं देता। हमेशा अकेले पड़े रहना। इस प्रकार यदि मैं इन लोगों
में रहा तो उस उजाड़ घर में मुझे अकेले बैठा रहना पड़ेगा, ठीक से खाने को भी नहीं मिलेगा। इससे मुझे और
भी दुःख होगा।
तांस्तथैवावृताञ्छिग्भिर्मृत्युग्रस्तान् विचेष्टतः।
स्वयं च कृपणः शिक्षु, पश्यन्नप्यबुधोऽपतत् ॥ ७१ ॥
ऐसा बोलकर उसने क्या किया? उसने मृत स्त्रीपुत्रों को देखा। उसने पत्नी और बच्चों को कालपाश में
बँधा देखा। उनकी हलचल बिलकुल बन्द हो गयी थी। यह देखकर भी उस मूर्ख ने विचार नहीं किया और स्वयं
भी उस जाल में फँस गया। मृत के पीछे मरना यह तो सबके पीछे लगा हुआ है लेकिन जन्म-मृत्यु को टाल कर
अपना हित साध्य करना यह कोई नहीं करता। देखिये, स्त्री-पुत्रों के लिये अपना प्राण भी दे देते हैं, लेकिन
भगवद्पद प्राप्त कर लिया जाय यह बात किसी के मन में नहीं आती।
तं लब्ध्वा लुब्धकः क्रूरः कपोतं गृहमेधिनम्।
कपोतकान्कपोतीं च सिद्धार्थः प्रययौ गृहम् ॥ ७२ ॥
इस प्रकार वह दुर्बुद्धि कपोत जाल में फँसते ही बहेलिया का काम अनायास ही हो गया। कपोत को
सपरिवार कन्धे पर लाद कर वह अपने घर की ओर चल पड़ा। ऐसा जो भी कोई मोहग्रस्त गृहस्थाश्रमी होता है,
उसे काल तत्काल हरण करके ले जाता है। जैसी बुद्धि कपोत की थी वैसी ही घर गृहस्थी पर आसक्ति रखने
वाले की होती है। नयों के लिये बिलखते हुए कपोती मर गयी यह अपनी आँखों से देखते हुए भी उस मूर्खबुद्धि
ने फिर उसी जाल में छलांग लगायी। इस प्रकार वह कपोत परिवार की चिन्ता करते-करते स्वयं भी मर गया।
मन में जरा भी विचार नहीं किया।
एवं कुटुम्ब्यशान्तात्मा द्वन्द्वारामः पतत्रिवत्।
पुष्णन्कुटुम्बं कृपणः सानुबन्धोऽवसीदति ॥ ७३ ॥