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सर्वकोश
श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

पृष्ठ 199, कुल 869 में से

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पृष्ठ 199

सातवाँ अध्याय १८३

के अनुसार वह सबको कोमल और मधुर मालूम होता है। प्राणि पवित्र हो सके इसीलिये तीर्थ स्थानों में जल में
पवित्रता होती है। योगियों के शरीर में भी रात दिन इतने लक्षण होने चाहिये। मैले शरीर से जो भी कोई जल में
प्रवेश करता है उन्हें वह अपने स्वभाव धर्म से निर्मल कर छोड़ता है। लेकिन मैंने इन सबका मैल साफ किया
ऐसा अहंकार वह मन में नहीं रखता। उसी प्रकार योगी भी केवल भक्ति से भजन में लगे भक्त लोगों के,
कलिकालजन्य पापों का विनाश करके भी गुरुत्व का अहंकार नहीं धरते। उससे जो भी कोई मिलता है, उसके
साथ उसका व्यवहार इतना कोमल रहता है कि भले ही उसके प्राण चले जाएँ लेकिन उसके मन में प्राणिमात्र के
प्रति कठोरता नहीं उत्पन्न होती। चकोर के लिये जिस प्रकार चन्द्र किरण है अथवा पक्षी के बच्चों के लिये उसकी
माताओं के पंख हैं या जीवों के लिये जीवन है, उसी प्रकार उसकी सबके प्रति मृदुता रहती है। उदक केवल
बाह्य मल को स्वच्छ करता है लेकिन योगी यह अंतर्बाह्य दोषों का क्षालन कर उसे भीतर और बाहर से शुद्ध
करता है। उदक केवल एक ही बार सुखी करता है लेकिन योगी सभी काल सुख प्रदान करता है। उदक का
सुख रहता ही कितना है? क्षणभर के बाद पुनः प्यास लगती है किन्तु योगी आत्मानन्द से इस प्रकार तृप्त कर
देता है कि उस सुख में पुनः बाधा नहीं आती। उदक का माधुर्य केवल जिह्वा को ही मालूम होता है लेकिन योगी
का माधुर्य सारी इन्द्रियों को तृप्त कर देता है। योगी की मिठास एक बार मालूम हो जाय तो उसके आगे अमृत
का स्वाद भी फीका मालूम होता है। वह घड़ी आधी घड़ी में ब्रह्मदेव अथवा इन्द्र के पदों को भी ठुकरा देती है।
धूप से संतप्त लोग जब जल के पास आते हैं तो वह अपने स्पर्शमात्र से उन्हें शीतल कर छोड़ता है। योगी की
स्थिति भी वैसी ही है। वह भी अपने स्पर्श से सबका ताप दूर करता है। उदक जिसे शान्त करता है, उसे पुनः
ताप होता ही है लेकिन योगी कृपा करके जिसे स्पर्श करता है, वह त्रिविध तापों से भी मुक्त हो जाता है। योगी
जिसका ताप हरते हैं उसे जीवनपर्यन्त पुनः ताप नहीं होता। वह शान्ति में ही रम जाता है और स्वानुभव में डोलता
है। मेघ के मुख से उदक का अधःपतन होता है और उसके नीचे आने से ही सारे लोग शान्त होते हैं और उन्हें
अन्नदान भी मिलता है। योगी इस लोक में इसीलिये जन्म लेते हैं कि लोग श्रवण-कीर्तन से तृप्त हो जाएँ और
आत्मज्ञान से उनका उद्धार हो सके। पर्जन्य का जल देखते ही जिस प्रकार सब लोग प्रसन्न हो उठते हैं अथवा
गंगादि तीर्थों का दर्शन करने से जिस प्रकार पापों का क्षालन होता है, उसी प्रकार योगियों का दर्शन भी बिना
भाग्य के नहीं होता। उसके चरणों का जो दर्शन करता है वह भवरोगों से मुक्त हो जाता है। उसका दर्शन या
स्पर्श न हो सके तो उसका नामस्मरण करना चाहिये ताकि केवल उतने से ही वह नाम संसार के मूल में छिद्र
कर देगा। भगवान का कीर्तन करने के बजाए भक्त का नामस्मरण करने से संसार बन्धन कैसे टूटेगा यह नहीं
पूछना चाहिये। सच तो यह है कि भगवान का कोई नाम ही नहीं होता। भक्तों ने उसकी प्रतिष्ठा के अनुरूप उसे
नाम, रूप आदि विलास अर्पित किये हैं। इस प्रकार भक्तों ने ही भगवान की प्रतिष्ठा बढ़ायी और उसे वैकुंठ में
बैठाया। ऐसे भक्त के उपकार से ही वह झुक जाता है और उसकी आज्ञा में रहता है। भक्त के वचन के अनुसार
भगवान न नर है न सिंह है, ऐसा रूप धारण कर वह खम्भे में से प्रकट हुआ और उसने भक्त का वचन सच कर
दिखलाया। आज भी इस बात का प्रमाण है कि वह ज्ञानानंदघन भगवान अपने भक्तों के वचन के अनुसार पाषाण
में भी प्रकट होता है। भक्तों के प्रेम से भगवान झुक जाता है, भक्तों का वचन वह तोड़ नहीं सकता। इसलिये
जहाँ भक्त का नाम आता है वहाँ भगवान दौड़ कर आता है। भक्त के उपकार का ऋण चुकाने के लिये उसे
तत्काल दौड़ कर आना पड़ता है। यह कहते समय अवधूत का प्रेम भी उफनने लगता है। इसके बाद का गुरु
अग्नि है, उसके भी लक्षण बताता हूँ। उन्हें कर्ण और मन को एकत्र लाकर सुनो।