श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
पृष्ठ 211, कुल 869 में से
संदर्भ में पढ़ेंभी कुशल रहती है और इन्द्रिय बल भी पर्याप्त रहता है लेकिन वह आहार की कल्पना का स्पर्श भी मन को
नहीं होने देता। काया और वाचा को वह उसके स्वभाव से विचलित नहीं होने देता। वह स्वप्न और जागृति से
वंचित रहता है, सुषुप्ति का त्याग कर सोता है तथा शून्य का विस्तार समाप्त कर स्वरूपानंद में शयन करता है।
मुनिः प्रसन्नगम्भीरो दुर्विगाह्यो दुरत्यय।
अनन्तपारो ह्यक्षोभ्यस्तिमितोद इवार्णव ॥ ५ ॥
अब, मैंने जिस समुद्र को गुरु बनाया उसके लक्षण सुनो। उसमें गांभीर्य, परिपूर्णता तथा निर्मलता आदि
गुण होते हैं। समुद्र हमेशा प्रसन्न रहता है उसी प्रकार योगी भी सदा प्रसन्नमुख रहता है। आत्मबोध के कारण
उसमें व्याकुलता नहीं होती। नदियों के गन्दे जल के मिलने से भी वह मैला नहीं होता, वह निर्मल ही रहता है।
उसी प्रकार योगी भी सदासर्वदा, नाना प्रकार के. कर्म करते हुए भी सदा शान्त एवं अलिप्त रहता है। जिस प्रकार
समुद्र जल में गम्भीर रहता है, उसी प्रकार योगी स्वभाव के अनुसार स्वात्मानुभव से गम्भीर रहता है। जिस प्रकार
वह सीमा का उल्लंघन नहीं करता उसी प्रकार योगीश्वर गुरु आज्ञा का उल्लंघन नहीं करता। समुद्र में हर किसी
को घुसने का साहस नहीं होता। वह सबको जल और लहरों के नीचे डुबा देता है। उसी प्रकार जो योगी के पास
जाता है, उसके जन्म-मरण रूप संसार को योगी डुबो देता है। समुद्र में घुसना और बाहर निकलना इसे जो
जानता है वही समुद्र में स्नान कर सकता है। दूसरों को वह अपने कोलाहल से व्याकुल कर छोड़ता है। उसी
प्रकार सबका योगियों का साथ नहीं हो सकता। वे स्वयं अपने ही से भयभीत रहते हैं। भाविक लोग ही उनके
साथ संगत कर सकते हैं। बड़ा धनवान भी जिस प्रकार किसी भी उपाय से समुद्र का उल्लंघन नहीं कर सकता
उसी प्रकार देवता, राजा, मनुष्य अथवा किन्नर भी योगीश्वर का उल्लंघन नहीं कर सकते। समुद्र में मैल नहीं रह
पाता, अपनी लहरों से वह उसे किनारे पर फेंक देता है। उसी प्रकार योगियों में भी ध्यान के कारण मैल नहीं रह
पाता। ताम्रपर्णी नदी समुद्र से जा मिलती है तो वह मोतियों की खान बन जाती है उसी प्रकार जब श्रद्धा की
योगियों से भेंट होती है तो वह भी मोतियों की खान बन जाती है। जो समुद्र में गोता लगाता है उसे नाना प्रकार
के रत्न प्राप्त होते हैं, उसी प्रकार जो योगी के साथ समरस होकर रहता है उसके चरणों पर ज्ञानरत्नों की राशि
आ जाती है। जिस प्रकार समुद्र की कोई सीमा नहीं होती, उसी प्रकार वेद और शास्त्र भी योगियों को सीमा में
नहीं बाँध सकते। समुद्र का पानी जिस प्रकार प्रवाहरहित, निश्चल रहता है उसी प्रकार योगी भी मृत्युभयरहित
होता है तथा निश्चल बनकर रहता है। समुद्र में कभी प्रवाह नहीं होता, वह हमेशा वैसा ही परिपूर्ण रहता है,
उसी प्रकार योगी भी जन्म-मरण की बाधा से मुक्त रहता है। समुद्र के लक्षण निश्चित करते-करते योगी में उससे
भी अधिक विशेषतायें मालूम हुईं। तो अब योगी की महानता बताता हूँ, ध्यान से सुनो। समुद्र का पानी लहरों के
नीचे अत्यन्त चंचल रहता है लेकिन योगी भीतर से बिलकुल शान्त रहता है। न व्याकुलता रहती है न विचार
रहता है। समुद्र बाह्य रूप से क्षुब्ध दिखायी देता है लेकिन योगी कभी क्षुब्ध नहीं होता। योगी का मन किसी भी
प्रकार से विचलित नहीं होता। वह हमेशा योगबल के कारण सावधान रहता है। पूर्णिमा अमावस्या के पर्व में
समुद्र में ज्वार आता है, किन्तु योगी सदा स्वरूपानंद से परिपूर्ण रहता है। चन्द्रमा के कारण समुद्र में ज्वार-भाटा
आता रहता है लेकिन योगी आत्मानुभव से सदा समभाव रहता है। समुद्र का जल खारा रहता है किन्तु योगीराज
वैसा नहीं होता। वह समस्त प्राणिमात्र के लिये मधुर रहता है। उसका बोध भी मधुर तथा सत्य रहता है जिसमें
पूर्ण बोध नहीं होता, जिसे निजात्मता का अनुभव नहीं रहता, उसमें अपरिपक्व फल की तरह माधुर्य कहाँ से