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सर्वकोश
श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

पृष्ठ 204, कुल 869 में से

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पृष्ठ 204

१८८ श्रीमद् एकनाथी भागवत
यं यं वाञ्छति सा राजंस्तर्पयन्त्यनुकम्पिता।
तं तं समनयत्कामंकृच्छ्रेणाप्यजितेन्द्रियः ॥ ५६ ॥
प्राणों से भी मूल्यवान् जो कुछ भी वह माँगती, उसे वह काममोहित होकर अत्यधिक परिश्रम करके देता
था। उसकी इच्छा भाँप कर ही वह उसे उसकी इच्छित वस्तु ला देता था फिर माँगने पर क्या कहना ? अपने को
बेचकर भी वह उसके लिये ले आता। धर्म का स्मरण नहीं, गरीब पर दया करना तो मालूम नहीं, जो भी कृपा
करता वह केवल स्त्री पर। शक्कर पर बैठी हुई मक्खी मारने पर भी नहीं उड़ जाती उसी प्रकार विषय का भोग
करते समय वृद्धावस्था की तथा मृत्यु भी याद नहीं रहती। सत्यवादी लोग जिस प्रकार पूर्वजों के दिये वचन का
पालन करते हैं, उसी प्रकार कामीजन स्त्रीसुख में बाधा नहीं आने देते। जिस प्रकार कामोपासक की सर्वत्र
एकात्मता होती है, उसी प्रकार संसार में स्त्री के अतिरिक्त उसे कुछ भी नहीं दिखायी देता।
कपोती प्रथमं गर्भं गृह्णती काल आगते।
अण्डानि सुषुवे नीडे स्वपत्युः संनिधौ सती ॥ ५७ ॥
वैसे ही लाडली पत्नी, तिस पर वह गर्भवती हुई, फिर क्या पूछने ? धन के लालची को जैसे एकाएक धन
की पेटी मिल जाय, उसी प्रकार वह उसके गर्भ का कुछ ज्यादा ही कौतुक करने लगा। दारू पीकर वह बन्दर
जिस प्रकार मस्त होकर नाचने-डोलने लगता है उसी प्रकार वह गर्भ का कौतुक करने लगा। गर्भिणी के सारे
मनोरथ उसने पूरे किये और प्रसूति काल आने तक वह उसी के लाड़-प्यार में खेलता रहा। इतने में अपने घरौंदे
में प्रसूत होकर उसने अण्डे दिये। उसके प्रसूत होने की वार्ता सुनकर उसकी प्रसन्नता का ठिकाना नहीं रहा।
तेषु काले व्यजायन्त रचितावयवा हरेः।
शक्तिभिर्दुर्विभाव्याभिः कोमलाङ्गतनूरुहाः ॥ ५८ ॥
हरि की माया अघटित को घटित करने वाली है। वह दुर्गम होने के कारण उसकी लीला साक्षात ब्रह्मदेव
की भी समझ में नहीं आती। उस देवमाया ने अण्डे में अवयवों की रचना की। पहले उस अण्डे में केवल रस
भरा हुआ था। हरि की माया से उसी में नाखून, पंख, चोंच तथा नेत्रों के द्वार खुलकर चमत्कार हुआ।
अण्डे अपने आप फूटे और उसमें से नन्हें-नन्हें कोमल चूजे बाहर निकले। उन्हें देखते ही माँ-बाप जीव-प्राण
भूल गये।
प्रजाः पुपुषतुः प्रीतौ दम्पती पुत्रवत्सलौ।
शृण्वन्तौ कूजितं तासां निर्वृतौ कालभाषितैः ॥ ५९॥
बच्चे अत्यन्त कोमल और लुभावने थे इसलिये माता-पिता पुत्र वात्सल्य के कारण मंजुल वाणी तथा स्नेह
से उनका सांत्वन करते थे। जिस समय जो करना उचित होता था, उसके अनुसार वे दोनों मिलकर अपने
उस शिशु का पालन-पोषण करते थे। उनके मंजुल शब्द सुनकर वे दोनों खुशी से डोलने लगते और बच्चों की
नजर उतारते।
तासां पतत्रैः सुस्पर्शैः कूजितैर्मुग्धचेष्टितैः ।
प्रत्युद्गमैरदीनानां पितरौ मुदमापतुः ॥ ६० ॥
उन्हें आलिंगन और चुम्बन लेने से, उनके वे मधुर, मृदु और मंजुल शब्द सुनने से, उनके पंखों के स्पर्श से