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सर्वकोश
श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

पृष्ठ 213, कुल 869 में से

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पृष्ठ 213

अष्टम अध्याय १९७

लगे और तिस पर होली का मौसम हो तो जो दुर्गति वाणी की होती है उधर कौन ध्यान देगा ? मदिरा तो वैसे भी
लोगों के होश उड़ा देती है, तिस पर यदि उसमें कोई मादक पदार्थ मिला दिया जाय तो फिर उसे प्राशन करने पर
संभ्रम की कोई सीमा नहीं रह जाती। उसीप्रकार मोह का जो असली रूप है वही स्त्री का स्वरूप है, तिस पर
वस्त्र, आभूषण आदि उसे और भी बढ़ाते हैं। काजल, बिन्दी, अलंकार, वस्त्र, तरह-तरह की साड़ियों से स्त्री
सुन्दर दिखायी देने लगती है, उसमें माया के विकार फैल जाते हैं। जिन्होंने इन्द्रियों का दमन नहीं किया है उन्हें
ही माया का ताप होता है। किन्तु भक्तों के सामने वह त्रिकाल में भी खड़ी नहीं रह सकती। श्रीगोविन्द के प्रति
जिसके मन में अत्यन्त भक्ति रहती है, उसकी रक्षा स्वयं कृपानिधि ही करते हैं। अगर पूछोगे कि वे भक्तों की
रक्षा किस प्रकार करते हैं तो इसका रहस्य यह है कि मूल रूप से 'आत्मा' में स्त्री-पुरुष यह भेद नहीं है।
भगवान ही स्त्री रूप में दिखायी देता है ऐसा आभास देकर वह भक्तों की रक्षा करता है। सुन्दर स्त्री को देखकर
जिसकी विवेकदृष्टि नष्ट होती है और जो आसक्ति से उपभोग को गले लगाते हैं वह अनन्त दुःख भोगते हैं।
दीपक के रूप में जगमगाहट देखकर पतंगा में उपभोग की लालसा उत्पन्न होती है इसलिये वे दीपक पर झपट्टा
मारते हैं और अग्नि में जलकर खाक हो जाते हैं। इस प्रकार माया स्त्री रूप से उपभोग की लालसा से जीवों को
भुलावा देती है। जो हरिचरण से विमुख रहते हैं, उनको ही माया भुलावा देती है। फिर मैंने मधुकरी की वृत्ति से
भ्रमर को गुरू बनाया। दूसरों को दुःख दिये बिना अपना कार्य पूरा करना होता है। उसके भी लक्षण सुन लो।
स्तोकं स्तोकं ग्रसेद् ग्रासं देहो वर्तेत यावता।
गृहानहिंसन्नातिष्ठेद् वृत्तिं माधुकरीं मुनिः ॥ ९॥
भ्रमर फूल को बिना रौंदे उसमें प्रवेश करता है और अपना काम कर लेता है। वैसे भ्रमर की बुद्धि अच्छी
रहती है। यही बात योगियों की है। वह घर-घर जाकर मधुकरी माँग कर अपना निर्वाह करता है। गृहस्थों को
कष्ट नहीं देता। समर्थ अथवा दुर्बल ऐसा भेदभाव न कर वह केवल प्राण रक्षा के लिए भिक्षा माँगता है। भ्रमर
कमलिनी में घुसकर परिमल पर लुब्ध हो जाता है। सूर्यास्त के समय कमल की फाँक बन्द हो जाती है और वही
भ्रमर के लिये बन्धक हो जाती है। जो सूखी हुई लकड़ी में प्रवेश कर जाता है वही कमलदल में फँस जाता है।
प्रेमिका कहीं दुःखी न हो जाय इसलिये स्तब्ध रहता है। बाहर निकलने का रास्ता नहीं ढूँढ़ता। उसी प्रकार
संन्यासी भी यदि एक ही जगह आसक्त होकर रह जाय तो वही उसके लिये बन्धन हो जाता है। वह विषय के
लोभ में लिप्त हो जाता है।
अणुभ्यश्च महद्भ्यश्च शास्त्रेभ्यः कुशलो नरः।
सर्वतः सारमादद्यात्पुष्पेभ्य इव षट्पदः॥ १०॥
कितना ही छोटा फूल क्यों न हो लेकिन वहाँ भ्रमर का अनादर नहीं होता। उसमें घुस कर वह परिमल का
सेवन करता रहता है। जो पूरी तरह विकसित कमलिनी हैं उनमें घुसकर भी वह उसका सार-अंश ले लेता है।
उसी प्रकार योगी भी यथाशास्त्र तथा व्यवस्थित आदि का विचार या छोटे-बड़े तर्क का विचार करते नहीं बैठते।
केवल सार-तत्त्व ग्रहण करते हैं। वेदान्त में वर्णित ब्रह्मस्थिति का भी वे समुचित सम्मान करते हैं। उसी प्रकार
अन्य स्रोतों आदि में वर्णित ब्रह्मव्युत्पत्ति का भी आदर करते हैं। पण्डितों का वचन मानते हैं, उसी प्रकार यदि
कोई साधारण आदमी कोई हित की बात करता है तो उसे भी आदरणीय मानकर उसमें का सार ग्रहण करता है।
पति के हृदय में प्रेम उत्पन्न होने के लिये जिस प्रकार कुलवधु सास-ससुर का सम्मान करती है उसी प्रकार उस