श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१९८ श्रीमद् एकनाथी भागवत
प्रेम को दृष्टि में रखकर उनके नौकर चाकरों को भी आदर देती है। पानी और दूध भले ही मिल जाएँ लेकिन
जिस प्रकार राजस उसमें से दूध ही ग्रहण करता है, उसी प्रकार योगी भी विवेकपूर्वक केवल सार अंश ही ग्रहण
करता है। समस्त प्राणियों में भगवान के प्रति भक्ति यही मुख्य सारांश है इसे ध्यान में रखना चाहिये। हे महाबाहु!
यही निष्ठा जिसके मन में जम जाती है उसे स्वप्न में भी नुकसान नहीं होगा। इस भरे-पूरे संसार में जो सारग्रही
होता है वही योगी है। इस प्रकार अवधूत ने यदू को गुरु के लक्षण बताये। अवधूत ने आगे कहा, हे राजा, मैंने दो
प्रकार की मक्खियों को अपना गुरु बनाया—एक थी मधुमक्खी और दूसरी थी सादी मक्खी।
सायंतनं श्वस्तनं वा न संगृह्लीत भिक्ष्रितम्।
पाणिपात्रोदरामत्रो मक्षिकैव न संग्रही ॥ ११॥
देखो! घर की मक्खी भले ही चीनी के ढेर पर बैठी रहे लेकिन वह अपने हाथ से मुँह में चीनी डालती है
लेकिन उसके पास उसका संग्रह नहीं होता। योगी संन्यासियों का भी यही हाल होता है। भिक्षा में जो भी मिले
उसे मुँह में डालना, संग्रह कुछ नहीं करना। हाथ में भिक्षापात्र और एकत्र करने के लिये पेट। इसके अतिरिक्त
संग्रह करने के लिये कोई घर या बर्तन नहीं होता।
सायंयनं श्वस्तनं वा न संगृह्लीत भिक्षुकः।
मक्षिका इव संगृह्लीन् सह तेन विनश्यति ॥ १२॥
भिक्षु के पास सुबह तथा शाम के लिये अन्न का संग्रह नहीं होता। संग्रह करने पर उसका विनाश होता है।
इसी सम्बन्ध में मैंने मधुमक्खी को गुरु बनाया। कैसे-कैसे कठिन स्थानों पर मधुमक्खी मधु का संग्रह करती है।
मधु ले जाने वाले लोग जब आते हैं तो वह संग्रह ही उसके विनाश का कारण होता है। संग्रह के लालच में वे
कठिन से कठिन किनारों पर छत्ता लगाती हैं। वैसी जगहों पर भी मधु निकालने वाले लोग पहुँच जाते हैं और
छत्ता झाड़ते हैं। उसके साथ ही मक्खियों का ढेर भी नीचे गिर पड़ता है। इस प्रकार संग्रह के फेर में प्राणनाश
होता है। संसार की यह रीति देखकर भक्त, भिक्षु, योगी तथा अन्य सज्जनों को संग्रह के चक्कर में नहीं पड़ना
चाहिये। सत्कर्म का आचरण कर धर्म का संग्रह करना चाहिये यह मर्म न समझ अधम लोग धन के लालच में
नष्ट हो जाते हैं। द्रव्य विनाश का फल है उसी प्रकार नाश का भी मूलकारण है और विशेष नाश का विस्तीर्ण
स्थान स्त्री है। जीवन के विनाश का प्रमुख कारण है कनक और कांता। इनके प्रति जितनी अधिक आसक्ति होती
है उतना ही संसार का दुःख भी बढ़ता है। कनक और कांता इनके प्रति जिसके मन में अरुचि है वही जन में
जनार्दन है। जिसे आत्मसुख की इच्छा है उसे स्त्रियों का संसर्ग नहीं करना चाहिये। इसीलिये मैंने विशेष रूप से
हाथी को गुरु बनाया।
पदाऽपि युवतीं भिक्षुर्न स्पृशेद्दारवीमपि।
स्पृशन्करीव बध्येत करिण्या अङ्गसङ्गतः ॥ १३॥
जरा देखो, साठ वर्ष तक जीवित रहने वाले हाथी के सामने मनुष्य की औकात ही क्या है? लेकिन ये
हाथी, हथिनी के शरीर संग की लिप्सा के कारण मनुष्य के बन्धन में फँस जाते हैं जो मनुष्य को अपने सामने
फटकने नहीं देता वह हाथी स्त्री के कारण मनुष्य का दास बन जाता है। उसके इशारे पर उठता बैठता है और
माथे पर अंकुश की मार सहता है। इसलिये जो धर्मनिष्ठ संन्यासी हैं उन्हें यदि संसार पर विजय प्राप्त करनी है