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सर्वकोश
श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

पृष्ठ 217, कुल 869 में से

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पृष्ठ 217

अष्टम अध्याय २०१
विनोद भी ठीक नहीं है। स्त्री संग सभी के लिये दुःखदायी है। वेश्याओं का गीत नहीं सुनना चाहिये, उन्हें
बिलकुल वर्जित रखना चाहिये। सच तो यह है कि जहाँ हरिकीर्तन हो रहा हो वहाँ केवल परमार्थ की दृष्टि से
भक्तिगीत सुनना चाहिये। जिसमें रामनाम का वर्णन नहीं है ऐसे ग्राम्यगीत कभी नहीं सुनिये चाहिये। कौतूहल के
लिए भी उधर नहीं झाँकना चाहिये। अब 'मछली' को गुरु बनाने के भी लक्षण सुनो। वह केवल रसना की
लोलुपता से अपने प्राणों से हाथ धो बैठता है।
जिह्वयाऽतिप्रमाथिन्या जनो रसविमोहितः।
मृत्युमृच्छत्यसद्बुद्धिर्मीनस्तु बडिशैर्यथा ॥ १९॥
अर्थसंग्रह से जीवन का नाश, स्त्रियों की संगत से अधःपतन तथा रसना की लोलुपता से मृत्यु, इस प्रकार
जीव को तीन प्रकार के आघात होते हैं। जिसका जिह्वालौल्य प्रबल है, उसके हिस्से में अनर्थ ही आता है। रसना
अनेक दुःखों का भोग कराती है। रसना की लालसा अर्थात भक्ष्य का माधुर्य जबर्दस्त है, उसके लालच में मछली
बंसी में लगाया हुआ भोजन खाती है लेकिन तभी गले में काँटा धँसता है और प्राणपखेरू उड़ जाते हैं। वैसे
देखने पर विषयरस उत्तम मालूम होता है लेकिन उसमें गुप्त रोग की फाँस छिपी रहती है। जो आसक्ति से उस
रस का सेवन करते हैं वे भवरोग से छटपटाते रहते हैं। काँटे में फँसी हुई मछली जिस प्रकार जीवन और मृत्यु के
बीच छटपटाती रहती है उसी प्रकार रोग से ग्रस्त मनुष्य दुःख भोगता रहता है। जिसमें रसना लोलुपता का दोष है
उसे सुबुद्धि कहाँ से आयेगी? केवल विषयों के संसर्ग के कारण वह अनन्त जन्म-मरण का दुःख भोगता रहता
है। केवल विषय रस का सेवन करने के कारण उसे करोड़ों जन्म भोगने पड़ते हैं। अगर ऐसा भोग न भोगना पड़े
तो हे राजा! एक उदाहरण सुनाता हूँ। इन्द्रियों की सजीवता सर्वथा रसना पर निर्भर रहती है। रसना के द्वारा
रसग्रहण करने से इन्द्रियों में उन्मत्तता आती है। जब इन्द्रियों की शक्ति प्रबल हो जाती है तो वह अधःपतन
कराती है। यदि रसना पर विजय नहीं प्राप्त की तो भवव्यथा से कभी छुटकारा नहीं मिल पाएगा। आहार के बिना
शरीर नहीं चलता, लेकिन उसका सेवन करने से इन्द्रिय प्रबल हो जाते हैं, इसलिये रसना को जीतने का मूल
कारण मालूम होने से सभी दुःख समाप्त हो जाते हैं।
इन्द्रियाणि जयन्त्याशु निराहारा मनीषिणः।
वर्जयित्वा तु रसनं तन्निरन्नस्य वर्धते॥२०॥
देखो! साधक आहार वर्ज्य कर इन्द्रियों को जीतने की ज्यों-ज्यों कोशिश करता है, त्यों-त्यों रसना और भी
बढ़ जाती है। वह कम नहीं होती। इन्द्रियों में आहार से ही बल आता है। निराहार से जैसे-जैसे वे इन्द्रिय
व्याकुल हो जाते हैं वैसे-वैसे रसना और भी अधिक बलवती हो जाती है। रसना का जोर निराहार से घटता नहीं,
अपितु बढ़ जाता है।
तावज्जितेन्द्रियो न स्याद् विजितान्येन्द्रियः पुमान्।
न जयेद्रसनं यावज्जितं सर्वं जिते रसे॥२१॥
कहते हैं कि उपवास से इन्द्रियों पर विजय प्राप्त होती है, किन्तु यह बात मिथ्या है क्योंकि अन्नग्रहण करने
पर वे पुनः बलशाली हो जाती हैं और अपने-अपने कर्मस्थल पर जागृत हो जाती हैं। जब तक रसना को नहीं
जीता तब तक 'जितेन्द्रिय' कहना मिथ्या है। जब विषयचैतन्य और इन्द्रियचैतन्य में ऐक्य हो जाता है, तभी रसना