सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

पृष्ठ 215, कुल 869 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 215

तो स्त्रियों को देखते ही तत्काल भाग जाना चाहिये। न स्त्री का दर्शन करे न उससे भाषण करे। स्त्री पर दृष्टि
पड़ते ही पलायन करना चाहिये। भागते-भागते यदि लकड़ी की पुतली भी मार्ग में आ जाय तो बुद्धिमान व्यक्ति
को उसका स्पर्श भी नहीं करना चाहिये। निर्जीव स्त्री भी पुरुष को कष्ट दे सकती है। अनिरुद्ध ने उषा को स्वप्न
में देखा और चित्ररेखा उसे भगा कर ले गयी। कृष्ण जैसा उसका सखा होते हुए भी बाणासुर ने उसे बाँध कर
रखा। उसे छुड़ाने के लिये श्रीहरि दौड़कर आया तो शंकर बीच में आ गये। दोनों में तुमुल युद्ध हुआ। इस प्रकार
हरिहर भिड़े हुए थे लेकिन स्वप्न में जिस स्त्री ने बाँध रखा था उससे प्रयत्न करने पर भी वे अनिरुद्ध को नहीं
छुड़ा सके। फिर औरों की क्या बात है ? देखो जिसे कोई बाँध नहीं सकता उसे भी जब स्वप्न की स्त्री ने बाँध
लिया तो फिर यदि यथार्थ की स्त्री हाथ पकड़ ले तो उसका छुटकारा कैसे हो पायेगा ? स्वयं को 'पुरुष' कहते हैं
लेकिन आखिर स्त्रियों के पैरों पर गिर पड़ते हैं। उन्हें मुक्ति कैसे मिलेगी ? स्त्रियों की संगति में पतन ही पतन है।
नाऽधिगच्छेत स्त्रियं प्राज्ञः कहिचिन्मृत्युमात्मानः।
बलाधिकैः स हन्येत गजैरन्यैर्गजो यथा ॥ १४ ॥
गजराज हथिनी के साथ क्रीड़ा कर रहा था तभी अन्य बलवान हाथियों ने उस पर आक्रमण किया और
उसे मार डाला। उनमें जो प्रबल हाथी था उसने सारी हथिनियों का भोग कर डाला। सारांश यह कि विनाश का
मूल कारण स्त्री है। अहिल्या के सम्बन्ध को लकर ही गौतम ने इन्द्र की बदनामी की। भस्मासुर का नाश भी स्त्री
संगति के ही कारण हुआ। तिलोत्तमा जैसी स्त्री को देखकर कर सुंद और उपसुंद सगे भाई होते हुए भी, उसकी
अभिलाषा के कारण अपना रिश्ता भूल गये और रणभूमि में एक-दूसरे पर प्रहार कर मर गये। आखिर स्त्री भोग
नहीं ही हो पाया। स्त्री मृत्यु का कारण है इसे ध्यान में रखो। इसी प्रकार पूर्व कल्प की एक कथा है। अवतारी
श्रीकृष्ण को शिशुपाल सदा कष्ट देता था। वह उनकी कांता भगाकर ले गया। सारांश यह कि चाहे देवता हों या
मनुष्य हो या पशु ही क्यों न हो लेकिन उसके विनाश का कारण स्त्री संगति ही है। उसी के कारण घर पर
आसक्ति होती है। कलह उत्पन्न करने के लिये भी स्त्री ही कारण होती है। वेश्याओं की संगत तो मृत्यु का द्वार
है। इसलिये भले ही मृत्यु आ जाय लेकिन वेश्या के साथ समागम नहीं करना चाहिये। अब इसका अर्थ यह
कदापि नहीं है कि वेश्या के साथ समागम करने से विशेष नाश होता है और अपनी स्त्री से रत होने में बाधकता
नहीं है क्योंकि बार-बार स्त्री सेवन करने से काम बढ़ता है और काम के बढ़ने से अधःपतन ही होता है। सारांश
यही है कि स्त्री समागम इतना भयंकर है कि यदि भूल से भी स्त्री संग हुआ तो वह नरक में पहुँचा देगा। नरक
में जायेगा यह बात निश्चित है। वेश्याएँ तो नरक का ही रूप हैं। एक स्त्री और दूसरा धन ये दोनों इस लोक के
भीषण अनर्थ हैं। इसके कारण जीवन का मुख्य उद्देश्य अर्थात आत्मप्राप्ति तो दूर ही रह जाती है, हाँ प्राणघात
अवश्य होता है।
न दे यं नोपभोग्यं च लुब्धैर्यद्दुःखसंचितम्।
भुङ्क्ते तदपि तच्चान्यो मधुहेवार्थविन्मधु ॥ १५ ॥
भाग्यहीन पुरुष न स्वयं खाता है, न धर्म करता है और न घरवालों को ही खाने देता है। मधुमक्खी की
तरह संग्रह करता रहता है। मधुमक्खी बड़े प्रयत्न से छत्ता लगाती है और उसमें शहद भरा रहता है। उसे देखकर
लोगों की दृष्टि उस पर लगी रहती है कि किस उपाय से वह शहद प्राप्त किया जाय। इस प्रकार बिना किसी की
चिन्ता किये लोग छत्ता तोड़ते हैं, बर्तनों में शहद भरते हैं और श्रीमान लोग उसके माधुर्य का सेवन करते हैं।