श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२०० श्रीमद् एकनाथी भागवत
बेचारी मक्खियाँ तो शहद खाती नहीं, जो शहद निकालते हैं उनके हाथ शहद से सने रहते हैं और जिन पर
लक्ष्मी प्रसन्न रहती हैं वे उसका स्वाद लूटते हैं। उसी प्रकार कंजूस का धन यक्ष की तरह होता है, न दान न धर्म
का संरक्षण, चोर मार कर उठा कर ले जाते हैं और चोर को सजा देकर राजा उसे उठा कर ले जाता है। जो कष्ट
करके धन संग्रह करते हैं उसका वे उपभोग नहीं कर पाते, वह कोई तीसरा ही ले जाता है। भाग्य की लीला
विचित्र है। गृहस्थ आदमी बड़े प्रयत्न से भोजन तैयार करता है और संन्यासी बिना परिश्रम किये उसे खा जाता
है। इसलिये भाग्य ही प्रमुख चीज है। इसलिये जो भाग्य के भरोसे रहता है वह संग्रह की लालसा नहीं रखता।
आखिर भाग्य का ही सहारा रहता है लेकिन लोग व्यर्थ ही कंजूसी करते हैं।
सुदुःखोपार्जितैर्वित्तैराशासानां गृहाशिषः।
मधुहेवाग्रतो भुङ्क्ते यतिर्वै गृहमेधिनाम्॥ १६॥
परिश्रमपूर्वक द्रव्य एकत्र कर पुरुष गृहस्थी का सामान तथा नाना प्रकार की चीजें अपने भोग के लिये
एकत्र करता है, उसके पकवान तैयार करता है, तभी ऐन वक्त पर कोई अन्नार्थी ब्रह्मचारी अथवा संन्यासी अतिथि
बनकर आता है और उस गृहस्थ के पहले ही खाना खाकर चला जाता है। गृहस्थाश्रमी उसकी ओर देखता रह
जाता है। जिस प्रकार शहद की मक्खियों को भगा कर शहद पीने वाला शहद पीता है, वैसी ही स्थिति उस
गृहस्थ की होती है। तैयार किया हुआ भोजन संन्यासी खा जाते हैं। यदि संन्यासी विन्मुख चला जाय तो सारे
पुण्य व्यर्थ चले जाते हैं। यथा समय अतिथि के आ जाने से धर्म की रक्षा होती है। अर्थ संग्रह में क्या दोष है
उसका तत्त्व मैंने तुम्हें बताया। अब मैंने 'मृग' को गुरु क्यों बनाया उसका वृत्तांत सुनो।
ग्राम्यगीतं न शृणुयाद् यतिर्वनचरः क्वचित्।
शिक्षेत हरिणाद् बद्धान्मृगयोर्गीतमोहितात् ॥ १७॥
जो दुर्व्यसनियों की वार्ता या वेश्याओं द्वारा गाये गीत चाव से सुनते हैं उसे निश्चय ही बन्धन होता है।
एकटक दीपक की ओर देखने वाला मृग घंटानाद सुनकर पागल-सा हो जाता है और उसे सामने कुछ भी नहीं
दिखाई देता। अन्त में वह जाल में फँस जाता है। वेश्याओं का गाना सुनकर कौन नहीं मोहित होता ? प्रायः सभी
मृग की तरह स्वार्थ से मोहित होकर गिर पड़ते हैं। जिसे तपस्वियों का मुकुटमणि कहते हैं तथा जिसकी पहले
कभी स्त्री से भेंट नहीं हुई थी वह ऋष्यश्रृंग एकाएक स्त्री गीत के भुलावे में आ गया।
नृत्यवादित्रगीतानि जुषन् ग्राम्याणि योषिताम्।
आसां क्रीडनको वश्य ऋष्यशृङ्गो मृगीसुतः॥ १८॥
वीणा की तार से निकली हुई मधुर झंकार, वेश्या का गायन तथा नृत्य आदि देखकर पुरुष गले में रस्सी से
बँधे हुए बन्दर की तरह स्त्री के वश में हो जाते हैं। हिरनी के गर्भ में जन्म लेने वाला वह जो तपस्वियों में श्रेष्ठ
था, जिसने स्त्री का दर्शन या भाषण नहीं सुना था वह ऋष्यश्रृंग स्त्री दर्शन के साथ ही उनके वश में हो गया,
स्त्रियों के पीछे दौड़ पड़ा और उनके वचनों पर चलने लगा। जिस प्रकार मदारी का बन्दर नाचता है, उसी प्रकार
वह स्त्रियों के साथ नाचने लगा, युवतियों के दर्शन से पागल हो गया, उसके मन में विवेक नाम की कोई चीज
ही नहीं रह गयी। वह तप का श्रम भूल गया, पिता विभांडक को भी भूल गया, ब्रह्मचर्य का संकल्प भी भूल
गया और स्त्रियों के अनुरोध पर नाचने लगा। संसार में स्त्रियों के जैसा उपसर्ग और कोई नहीं है। स्त्रियों के साथ