श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसातवाँ अध्याय १८९
उन दोनों को अत्यन्त आनन्द होता था। माँ-बाप जब बैठे होते तो नन्हें-नन्हें बच्चे दौड़कर इधर-उधर आड़े-
तिरछे दौड़कर तथा एक-दूसरे की चोंच से चोंच मिलाकर एक दूसरे को दिखाते थे और फिर आलिंगन देकर
चुपचाप भागकर दूर चले जाते और फिर वहाँ से दौड़ते हुए उनके पास आते। माँ-बाप के पंखों की छाया रहने
से बालकों में हीनता नहीं रहती। ऐसे बच्चों को जन्म देने के कारण उन्हें धन्यता मालूम होती है। उनके वे बच्चे
अत्यन्त दुलारे होने के कारण वे उनसे बहुत लाड़-प्यार करते और उनकी इच्छा पूरी करते। उन्हें देखकर उनके
नेत्र तृप्त हो जाते थे। एक-दूसरे पर उनका अत्यन्त प्रेम था। बालकों को खेलते देखकर वे उन्हें प्रेम से उठा लेते
और उनके कोमल मुख का चुम्बन ले लेते।
स्नेहानुबद्धहृदयावन्योऽन्यं विष्णुमायया।
विमोहितौ दीनधियौ शिशून्युपुषतुः प्रजाः ॥ ६१ ॥
हे राजा! उस अजन्मा 'अजा' माया ने कैसा भुलावा दिया, जरा देखो। हृदय में परस्पर प्रेमबन्धन होने के
कारण वे उनका पोषण करने के लिये तत्पर रहते थे। स्त्री-पुत्रों का मोह बड़ा कठिन है। उनका पोषण करने के
लिये वे चिन्तातुर होकर अन्न के लिये भ्रमण करते फिरते थे।
एकदा जग्मतुस्तासामन्नार्थौ तौ कुटुम्बिनौ।
परितः कानने तस्मिन्नर्थिनौ चेरतुश्चिरम् ॥ ६२ ॥
इस प्रकार वे बच्चे थोड़े बड़े हुए। परिवार बढ़ गया, भोजन की अधिक आवश्यकता मालूम होने लगी।
तब गृहस्थी के विचार से वे चिन्ता में पड़ गये। इस प्रकार कुटुम्ब वत्सल वह कपोत और कपोती पुत्र प्रेम में
बद्ध होने के कारण दोनों एक साथ बाहर निकल पड़ते और अधिक समय बाहर रहकर भक्ष्य ले आते। अब एक
ही स्थान पर भक्ष्य कैसे मिलेगा? इसलिये वे जंगल-जंगल घूमने लगे लेकिन पर्याप्त भक्ष्य नहीं मिल पाता था।
बहुत-सा चारा एकत्र कर फिर अपने घरौंदे की ओर जाएँ और अपने बच्चों को नाना प्रकार का भक्ष्य देकर
उनका पोषण करें इस विचार से वे दोनों अनेक स्थानों, अनेक वनों और उपवनों में घूमने लगे।
दृष्ट्वा ताँल्लुब्धकः कश्चिद्यदृच्छातो वनेचरः।
जगृहे जालमातत्यचरतः स्वालयान्तिके ॥ ६३ ॥
इस प्रकार एक दिन जब इनके माँ-बाप दूर गये हुए थे उनके बच्चे घरौंदे में ही उड़ रहे थे। वे भूख से
क्षुब्ध हो गये और दुर्भाग्यवश बाहर निकल पड़े। उसी जंगल में एक बहेलिया पक्षी पकड़ने के काम में बहुत
माहिर था। संयोगवश उसकी दृष्टि इन कपोत बच्चों पर पड़ी। उसने जाल फैलाकर उन बच्चों को उसमें फँसाया
और अब कपोत कपोती के आने की प्रतीक्षा करने लगा।
कपोतश्च कपोती च प्रजापोषे सदोत्सुकौ।
गतौ पोषणमादाय स्वनीडमुपजग्मतुः ॥ ६४ ॥
बच्चों के प्रति मोह के कारण कपोत और कपोती जल्दी-जल्दी घरौंदे की ओर आये। स्त्री सुख की
आसक्ति ही बढ़ती व्यथा का मूल कारण है। स्त्री की संगति के कारण कितना अनिवार दुःख भोगना पड़ता है,
कौन बताये ? पुरुष को दुःख देने के लिये स्त्री संग ही कारण है। वही पुत्र, नाती आदि के द्वारा कैसे-कैसे दुःख
भोगने को बाध्य करता है।