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सर्वकोश
श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

पृष्ठ 201, कुल 869 में से

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पृष्ठ 201

सातवाँ अध्याय १८५
प्रकार गंगा का जल एक ही होते हुए भी, भँवरा, तरंग आदि विभिन्न स्वरूपों में भासमान होता है। अथवा मण्डप
के छायाचित्र बत्तियों के प्रकाश से ही निर्मित होते हैं। राम, रावण आदि नामों से लोगों को परदे पर नाट्याभिनय
करके दिखलाते हैं। उसी प्रकार नाना प्रकार के प्राणी, नाना प्रकार के मत, नाना प्रकार की आकृतियाँ दिखायी
पड़ती हैं, उन सब में श्रीहरि ही प्रवेश कर सहज रीति से उन्हें नचाता रहता है। योगी की स्थिति भी वैसी ही
रहती है। नाना प्रकार के आकार और व्यक्ति दिखायी पड़ने पर भी वह उन सब में समदृष्टि से स्वयं को ही
देखता है इसलिये उसे किसी प्रकार भ्रम नहीं होता। वह जो भी कुछ देखता है वह सब वह स्वयं ही रहता है
ऐसी मीमांसा अवधूत ने हाथ उठा कर की। जन्म और मृत्यु इस देह का ही होता है, आत्मा यह नित्य और
अविनाशी है यह निश्चय चन्द्रमा को गुरु बना कर दृढ़ कर लिया।
विसर्गाद्याः श्मशानान्ता भावा देहस्य नात्मनः।
कलानामिव चन्द्रस्य कालेनाव्यक्तवर्त्मन ॥ ४८ ॥
शुक्लपक्ष और कृष्णपक्ष के योग से चन्द्रमा की कलाएँ बढ़ती हैं और घटती हैं लेकिन मूल चन्द्रमा को
वृद्धि या क्षय नहीं होता। वैसी ही स्थिति सच्चे योगी की रहती है। जन्म, मृत्यु आदि जो छह विकार हैं वे
सचमुच देह के ही लिये हैं। आत्मा स्वरूप से ही अविनाशी निर्विकार, अनंत और अमर है। घट स्वाभाविक रूप
से ही नाशवान है, लेकिन उसमें चन्द्रमा का प्रतिबिम्ब रहता है, उसी प्रकार अशाश्वत में शाश्वत दिखाई देता है,
लेकिन उसे नश्वर का विकार नहीं लगता। घट के साथ चन्द्रमा की उत्पत्ति नहीं होती किन्तु घट के विनाश के
साथ चन्द्रमा का विनाश नहीं होता। चन्द्रमा अपनी सहज स्थिति के अनुसार नाश तथा उत्पत्ति रहित ही होता है।
उसी प्रकार योगी आत्मस्वरूप होने के कारण देह के साथ जन्म नहीं लेता और न देह के साथ उसका विनाश
होता है। वह अखण्ड रूप से परिपूर्ण ही रहता है। काल की गति अत्यन्त गहन है। उसी के कारण नाश और
उत्पत्ति हुई दिखाई पड़ती है। लेकिन काल का यह प्रभाव शरीर पर है, आत्मस्थिति पर वह लागू नहीं होता।
सारांश यह कि काल का सामर्थ्य अगाध है यह जो कहा जाता है वह देह के कारण ही। आत्मस्थिति की ओर
देखा जाए तो वहाँ काल रहता ही नहीं है। काल की सूक्ष्म गति का विवेचन करते हुए अवधूत को सहसा स्मरण
हुआ और उसने सिंहावलोकन करते हुए अग्नि का पुनः उदाहरण दिया।
कालेन ह्योघवेगेन भूतानां प्रभवाप्ययौ।
नित्यानापि न दृश्येते आत्मनोऽग्नेर्यथार्चिषाम् ॥ ४९ ॥
उस काल की नदी की गति अत्यन्त प्रचण्ड है। उसकी गति अत्यन्त सूक्ष्म है। उसमें प्राणीरूप तरंगें उठती हैं
और टूटती हैं लेकिन यह जगत को दिखायी नहीं देता। इस नदी में जरा से जर्जर हुए लोगों का कचरा तैरता रहता
है और षड्विकाररूप भयंकर भँवरे उसमें घूमते रहते हैं। बाह्य और युवावस्था की उछाल चलती रहती है। वार्धक्य
का जल मन्द गति से बहता रहता है और जन्म-मरण की लहरें उछल-उछल कर शोर मचाती रहती हैं। प्रवाह की
धारा के प्रहार से जीवन के बुर्ज ढहते हैं। स्वर्गादि मन्दिर तोड़कर शिखरों पर स्थित इन्द्रों को भी वह प्रवाह वेग
नीचे गिराता है। यही जल पाताल में प्रवेश करता है और सर्पों का संहार कर उनकी हड्डी-पसली एक कर देता है।
काल के ऐसे प्रवाह में भूत तरंगों का बनना-टूटना रात-दिन निरन्तर चलता रहता है। लेकिन मजे की बात है कि
यह सब किसी के ध्यान में नहीं आता। महाप्रलय के समय जब प्रलयमेघों की गर्जना होती है, तो उस समय भयंकर
बाढ़ आती है और उसमें ब्रह्मदेवादि अनेक बड़े-बड़े वृक्ष टूट कर, जड़ के साथ उखड़ कर बह जाते हैं। वहाँ काल