श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
पृष्ठ 209, कुल 869 में से
संदर्भ में पढ़ेंअष्टम अध्याय
हे ओंकाररूप सद्गुरु! तुम्हें प्रणाम! तुम एक बहुत बड़े ज्योतिषी हो। तुम जीव का तथा चिद्ब्रह्म का
भविष्य देखकर 'ओं पुण्या' (मैं प्रणवरूप पुण्यस्वरूप हूँ) इस मंत्र से जीव-ब्रह्म का विवाह कराते हो। दुल्हा-
दुल्हन का विवाह तो अनेक लोग देखते हैं, किन्तु हे गुरुराजा! स्वयं से स्वयं का विवाह करा देने का तुम्हारा
कौशल अत्यन्त अलौकिक है और विवाह कराने का तुम्हारा कौशल कुछ ऐसा है कि तुम पाँच पंचों की झंझट
पाले बिना, काल की दृष्टि से बचाकर आत्मबोध की स्थापना करते हो। चारों पुरुषार्थों का लड्डू तथा पापड़
आदि से समर्पण कर अहंभाव को न्योछावर कर देते हो। साधन चतुष्टय का मधुपर्क कर जीव भाव का पिण्ड
सहज अर्पण कर देते हो। विषय सुख जो पीछे छूटता है वही पैर का पाँवड़ा बन जाता है और दोनों ओर खड़े
होकर सावधान कहते हो यही तुम्हारा सच्चा उपदेश है। विषय का व्यवधान यही सच्चा अंतरपट है जो सहज
समाधि से दूर होता है और शब्द स्तब्ध होकर चारों ओर शान्ति हो जाती है। ऐसा यह तुम्हारा मुहूर्त अत्यन्त
मंगलकारी होता है। अर्धमात्रा समदृष्टि होने पर ब्रह्मस्वरूप से भेंट होकर ऐक्य भाव की मुट्ठी बँध जाती है।
विवाह कराने का तुम्हारा ढंग बिलकुल अनूठा है। वहाँ न कुछ काला है न कुछ सफेद है, न गोरा है न साँवला
है। सच तो यह है कि वह आँखों से दिखायी ही नहीं देता। ऐसे स्थान पर विवाह समारोह कराते हो। लेकिन हे
गुरुराया! कैसा आश्चर्य है, कैसा चमत्कार है कि दूसरा कोई न दिखायी देते हुए भी एक ओर एक के साथ
अकेले ही विवाह कराने वाले तुम एक ही हो। गुरु समझ कर तुम्हें बाहर प्रणाम करने जाता हूँ तो अन्तर की
आत्मा भी तुम ही हो। भीतर या बाहर, सर्वत्र तुम ही भरे दिखायी देते हो। तुम्हारा 'तूपन' देखने जाओ तो मेरा
'मैं पन' नष्ट हो जाता है। हे गुरुनाथ! ऐसा करते हुए भी आप मुझसे ग्रन्थ रचना करवाते हैं। सातवें अध्याय के
अन्त में अवधूत ने यदु को कपोत की कथा सुनायी। प्रारम्भ से लेकर अन्त तक, पृथ्वी से लेकर कपोत तक
अत्यन्त श्रेष्ठ आठ गुरुओं के बारे में बताया। आत्मबोध से ही गुरुओं में श्रेष्ठत्व आता है। अब शेष बच रहे
गुरुओं के लक्षण भी अवधूत यदु को बताएगा, तो उधर भी ध्यान दें। श्रवण करने से वह बोध स्थिति तुम्हें भी
प्राप्त होगी।
ब्राह्मण उवाच
सुखमैन्द्रियकं राजन् स्वर्गे नरक एव च।
देहिनां यद्यथादुःखं तस्मान्नेच्छेत तद् बुधः ॥ १ ॥
यदु को श्रवण में आस्था है, यह देखकर ब्राह्मण को बड़ा सन्तोष हुआ। आनन्द के उसी उल्हास में उसने
आगे का निरूपण प्रारम्भ किया। उसने कहा, हे राजा! ध्यानपूर्वक सुनो! विषय का सुख स्वर्ग में तथा नरक में
समान रहता है इसमें जरा भी सन्देह नहीं है। उर्वशी का भोग करते समय स्वर्ग में इन्द्र को जो सुख प्राप्त होता है
वही सुख विष्टा में विचर रहे सूअर को अपनी मादा का भोग करते समय मालूम होता है। इसी कारण से
साधुजन दोनों जगह के भोग में मन नहीं लगाते। जिस प्रकार कोई प्रेत को आलिंगन नहीं देता उसी प्रकार साधु
पुरुष विषय को स्पर्श नहीं करते। जीवित सर्प को हाथ में लेने की इच्छा किसी भी प्राणी को नहीं होती, उसी
प्रकार साधुपुरुष मन में कभी विषय की आसक्ति नहीं रखते। जिस प्रकार बिना निमंत्रण दिये ही प्राणी के हिस्से