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सर्वकोश
श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

पृष्ठ 218, कुल 869 में से

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पृष्ठ 218

२०२ श्रीमद् एकनाथी भागवत
पर विजय प्राप्त हुई ऐसा समझना चाहिये। समस्त मधुर पदार्थों में जो मधुर है उस पर जिसने विजय प्राप्त कर
ली उसी के वश में रसना रहती है। उसे रस-अपचन की बाधा नहीं होती। रसना विजयी का अभियान
ब्रह्मसायुज्यता में स्थान पाता है। वही परमानन्द का सुख भोगता है।
पिङ्गला नाम वेश्याऽऽसीद् विदेहनगरे पुरा।
तस्या मे शिक्षितं किंचिन्निबोध नृपनन्दन ॥ २२॥
अवधूत कहते हैं—हे राजा! देखो, मैंने एक वेश्या को गुरु बनाया। हे चतुर! उससे मैंने जो बातें सीखीं,
उन्हें सुन लो। किसी समय जनक राजा की नगरी में 'पिंगला' नाम की वेश्या रहती थी। उसकी आशा निराशा में
बदलने पर उसमें तीव्र वैराग्य उत्पन्न हुआ।
सा स्वैरिण्येकदा कान्तं संकेत उपनेष्यती।
अभूत् काले बहिर्द्वारि बिभ्रती रूपमुत्तमम् ॥ २३॥
वह स्वच्छन्द विचरण करती थी। शाम को नाना प्रकार के शृंगारों से अलंकृत होकर वह दरवाजे पर खड़ी
रहती थी। रूप तो उत्तम था ही, तिस पर मनोरम शृंगार किया हुआ। इस प्रकार वह सज-धज कर उत्तम पुरुष
की बाट जोह रही थी।
मार्ग आगच्छतो वीक्ष्य पुरुषान् पुरुषर्षभ।
ताञ्छुल्कदान् वित्तवतः कान्तान् मेनेऽर्थकामुका ॥ २४ ॥
गुणी, रूपवान तथा धनवान होने के साथ-साथ कामशास्त्र में भी निपुण तथा धन से सम्पन्न करने वाले
पुरुष की वह प्रतीक्षा कर रही थी। हे पुरुषश्रेष्ठ, सुनो! राह में किसी पुरुष को आते देख वह अपने नेत्रकटाक्ष
तथा शृंगाराभिनय से उसे इशारा करती थी।
आगतेष्वपयातेषु सा संकेतोपजीविनी।
अप्यन्यो वित्तवान् कोऽपि मामुपैष्यति भूरिदः ॥ २५॥
किसी के ऊपर कंकड़ फेंकती, तो किसी को कहती, “महाराज! पान तो खाकर जाइये। राह चलने वालों
को आँख मारती तो किसी को देखकर व्यर्थ ही लज्जा का अभिनय करती। मन की योजना को पूरा करने के
लिये वह उपर्युक्त अनेक प्रकार के संकेत किया करती थी। लेकिन उधर से जाने वाले कामकाजी लोग उसकी
ओर नहीं देखते थे। ऐसे लोगों को वह 'दरिद्री, दुर्बल' कहकर निन्दा करती थी, अब कोई तो धन देने वाला
नौजवान आये और मुझे स्वीकार करेगा कह कर अपने मन को सांत्वना देने लगी। "
एवं दुराशया ध्वस्तनिद्रा द्वार्यवलम्बती।
निर्गच्छन्ती प्रविशती निशीथं समपद्यत ॥ २६॥
इस प्रकार निराशा से भरी, उद्वेग के कारण नींद से भी वंचित हुई, दरवाजे के पास खड़ी पुरुषभोग की
इच्छा से व्याकुल। घर के अन्दर जाती, दो चार कदम चलकर पुनः वापस चली आती। इस प्रकार भीतर-बाहर
करते-करते आधी रात बीत गयी। पुरुष के आने का समय बीत चला, रात समाप्त हो चली। लोग निद्रा में लीन।
लेकिन उस समय पिंगला व्यथित होकर पड़ी थी।