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सर्वकोश
श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

पृष्ठ 200, कुल 869 में से

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पृष्ठ 200

१८४ श्रीमद् एकनाथी भागवत
तेजस्वी तपसा दीप्तो दुर्धर्षोदरभाजनः।
सर्वभक्षोऽपि युक्तात्मा नादत्ते मलमग्निवत्॥ ४५॥
अग्नि अपने स्वयंभू तेज से ही देदीप्यमान रहता है। उसे हाथ में पकड़ना सम्भव नहीं है, लेकिन वही
अग्नि सबके पेट में उपस्थित रहकर अपने तेज से सब कुछ भक्षण कर लेता है। उसी प्रकार योगी भी
भगवद्भाव से दीप्त होने के कारण, देवादि भी उसे नहीं पकड़ पाते। जिस प्रकार हाथ में अंगार रखना कठिन है
उसी प्रकार योगी को पकड़ना भी अत्यन्त कठिन है। माया भी अपने गुणों से उस पर काबू नहीं पा सकती।
अग्नि के लिये जिस प्रकार मुख यही एक पात्र रहता है, उसी प्रकार योगी का एकमात्र पात्र उदर ही होता है।
किसी विशिष्ट निधि को रखने के लिये उसके पास पात्र ही नहीं होता। अग्नि जो कुछ भी सेवन करता है, उसे
वह जलाकर अपने ही जैसा कर डालता है। इसी प्रकार योगी सब कुछ भक्षण करता है लेकिन मलिनता को
स्पर्श नहीं करता। सुगन्ध से युक्त चन्दन की लकड़ी हो, अथवा दुर्गन्धयुक्त कोई अन्य लकड़ी हो, नीम की
कडुई लकड़ी हो या गन्ने की लकड़ी हो, उनका आकार-विकार आदि सब कुछ जलाकर वह उन्हें अपने जैसा
बना देता है। उसी प्रकार योगी जिस वस्तु को स्वीकार कर लेता है, उसकी ओर वह पहले आत्मदृष्टि से देखता
है, उसके सारे दोष दूर कर फिर उन पदार्थों को आत्मभाव से स्वीकार करता है। जिस भोग्य पदार्थ का भोग
करने के लिये वह जाता है, वहाँ वह स्वयं को ही देखता है इसलिये भोक्ता भी तद्रूप ही हो जाता है। यही योगी
का भोग है। अग्नि में जो मैली वस्तु पड़ती है वह अग्निमुख से निर्मल ही हो जाती है। उसी प्रकार योगी भी जो
थोड़ा-बहुत सेवन करता है वह परमपवित्र ही हो जाता है। अग्नि के मुख में आहुति पड़ने से यज्ञ होता है और
उस कर्म से स्वर्ग प्राप्त होता है लेकिन योगी के मुख में जो पड़ता है उससे आत्मपद ही प्राप्त होता है। हे राजा!
अग्नि का एक और भी लक्षण है। वह भी ठीक से सुन लो। वही साधक का साधन और सिद्धों का लक्षण है।
क्वचिच्छन्नः क्वचित्स्पष्ट उपास्यः श्रेय इच्छताम्।
भुङ्क्ते सर्वत्र दातॄणां दहनप्रागुत्तराशुभम् ॥ ४६ ॥
होमकुण्ड में दबाया हुआ अग्नि भीतर तेजस्वी होता है किन्तु ऊपर से राख से ढँका रहता है, अथवा
यज्ञशाला में उसे प्रज्ज्वलित कर याज्ञिक लोग बड़ा यज्ञ भी करते हैं। उपासक के मन में जैसी भावना रहती है,
वैसा श्रेय वह उसके लिये उत्पन्न करके देता है और पहले के सारे पापों को जलाकर हवि ग्रहण करता है। उसी
प्रकार योगी की लीला भी भक्तों के नेत्रों में प्रकट होती है। किसी से वह बिल्कुल गुप्त रहता है, आँखों से
दिखायी भी नहीं देता। ऐसे लोगों की जगह लोग भक्ति के बल पर जो भी अर्पण करते हैं उससे मुमुक्षुओं को
मोक्ष प्राप्त होता है। योगी के मुख में उसके पड़ते ही सारे संचित सुख-दुःखों को जलाकर उसे आत्मपद दिला
कर सुखी करता है। हे राजा! जिसके योग से सगुण और निर्गुण समभाव से एकरूप दिखायी देते हैं ऐसे अग्नि
का एक और लक्षण तुम्हें बताता हूँ।
स्वमायया सृष्टमिदं सदसल्लक्षणं विभुः।
प्रविष्ट ईयते तत्तत्स्वरूपोऽग्निरिवैधसि ॥ ४७॥
स्वभावतः अग्नि निराकार ही है। लकड़ियाँ लम्बी, टेढ़ी, गोल, बड़ी या छोटी जिस आकार की होती हैं
उसी आकार का वह मालूम होता है। भगवत्स्वरूप की जाति भी वैसी ही है। स्वमाया की कल्पना से ही
आकृतियों का निर्माण कर वह उसमें सहज रूप से घुसा रहता है इसलिये अनेक रूपों में भासित होता है। जिस