श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१९२ श्रीमद् एकनाथी भागवत
इस प्रकार सांसारिक व्यक्ति कुटुम्ब का पोषण करने में ही आसक्त हो जाने के कारण विषयवासना से
सदा अतृप्त रहता है, इसीलिये उसका परिवार के साथ विनाश होता है। गृह की आसक्ति और गृहस्थाश्रम यह
केवल द्वंद्व का सुख है। इसलिए वह कपोत की तरह संभ्रमित होता है। इसलिये इस प्रकार अपने जन्म को व्यर्थ
नहीं करना चाहिये।
यः प्राप्य मानुषं लोकं मुक्तिदारमपावृतम्।
गृहेषु खगवत्सक्तस्तमारूढच्युतं विदुः ॥ ७४॥
श्लोक ७४-इस मृत्युलोक में आकर जिसे उत्तम देह प्राप्त हुआ है और वह भी श्रेष्ठवर्ण ब्राह्मण का
जन्म, जो मनुष्य देह प्राप्त करता है, उसके लिये मुक्ति का द्वार सदा खुला रहता है। एक दिन में एक क्षण में वह
इस जन्म से पार निकल जाता है। यह बात अन्य वर्णों की है, फिर ब्राह्मण तो वैसे भी पूण्यमूर्ति ही है। वे सदा
मुक्त ही हैं लेकिन व्यर्थ ही आसक्ति में फँसे रहते हैं। विद्वत्ता के साथ वैराग्य का होना बड़े भाग्य की बात है।
वह ब्रह्मदेव आदि को भी प्राप्त नहीं होती। व्यर्थ की आसक्ति में अभागे हुए ये लोग शिश्नोदर के अधीन होकर
व्यर्थ चले जाते हैं। मनुष्यदेह प्राप्त कर जो गृहासक्त होता है, उसे 'आरूढच्युत' अथवा पढ़तमूर्ख कहते हैं। वह
हाथ में आये स्वार्थ को छोड़कर कपोत की तरह दुःखी होता है। विषय से कभी तृप्ति नहीं होती ऐसा वेद और
पुराण कहते हैं। ऐसा होते हुए विषय से आसक्ति कर, व्यर्थ ही नरदेह को नष्ट करते हैं। नरदेह की महत्ता
विचित्र है। केवल रामनाम का आवर्तन करने से भी चारों मुक्ति दासी बनकर रहती हैं। ऐसा होते हुए भी वही
देह विषय के लिये नष्ट करते हैं। विषयसुख की आसक्ति से आज तक किसी को तृप्ति नहीं हुई। प्यासा व्यक्ति
मृगजल पाकर कैसे शान्त होगा? इसलिये ज्ञानी पुरुष नरदेह प्राप्त होते हुए विषय के प्रयास में पागल बनकर
क्यों कष्ट सहे? नरदेह जैसी निधि अनायास ही प्राप्त हुई है। इसलिये अभिमान बिलकुल छोड़ दो। तभी तुम्हें
समाधान प्राप्त होगा। इसके बाद पुनः नरदेह प्राप्त होगा ही इसकी कोई आशा नहीं है। इसलिये विषयासक्ति
छोड़ कर भक्तिभाव से श्रीहरि का भजन करना चाहिये। कलियुग में साधन बिलकुल सरल है। न योग की
आवश्यकता है न यज्ञ की, न त्याग चाहिये न दान चाहिये। बिना लज्जा के हरिकीर्तन करने से चारों मुक्तियाँ
चरणों पर आकर गिरती हैं। ऊब कर यदि उसके बदले में पारस मिले तो दुःख क्यों हो? उसी प्रकार कीर्तन के
बल पर साक्षात ईश्वर की प्राप्ति होती है, इसे ध्यान में रखो। एकाजनार्दन कहता है, नश्वर देह के साधन से ही
जन में जनार्दन होना यही स्पष्टतया बतलाया। एका जनार्दन की शरण में आया तभी जनार्दन एकत्व से एका हो
गया, वैसे जैसे सुवर्ण और कंगन नाम से दो होते हुए भी मूलतया एक ही होते हैं। एकादश स्कन्ध में श्रीकृष्ण ने
जो गुरुपदेश उद्धव को सुनाया तथा अवधूत ने यदु को बताया वही गुरुपदेश जनार्दनरूप एकनाथ सुना रहा है।
इति श्रीमद्भागवते एकादश स्कंधे, श्रीकृष्ण उद्धव संवादे,
यदु अवधूत इतिहासे एकाकार टीकायाम सप्तमोध्यायः ॥७॥