श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
सातवाँ अध्याय १६३
कुल वैशापनिर्दग्धमङ्क्ष्यत्यन्योन्यविग्रहात्।
समुद्रःसप्तमेऽन्ह्येतां पुरीं च प्लावयिष्यति ॥ ३ ॥
अब हमारा कुल शापाग्नि से दग्ध होकर रह गया है। वह भी परस्पर कलह से नष्ट हो जाएगा। मैंने समुद्र
से जमीन माँग कर द्वारिका बसायी। मेरे निजधाम जाते ही वह उसे सातवें दिन डुबो देगा।
यह्र्येवायं मया त्यक्तो लोकोऽयंनष्टमंगलः।
भविष्यत्यचिरात्साधो कलिनापि निराकृतः ॥४॥
हे उद्धव! तुम्हें हित की बात बताता हूँ, सुनो। मेरे इस संसार को छोड़ कर जाते ही धीरे-धीरे लोगों की
बुद्धि का विनाश होगा। चारों ओर अधर्म मच जायगा, लोकनाशक होगा अमंगल। उस अमंगलता का कारण
बताता हूँ, सुनो। जब तक मैं इस सृष्टि में विचर रहा हूँ तब तक कली को आँख खोल कर देखने का साहस नहीं
है लेकिन मेरे जाते ही वह खड़बड़ा कर उठ बैठेगा। बाली का दुर्धर प्राबल्य होते ही ब्राह्मण अपना स्वधर्म त्याग
देंगे, दानधर्म में किसी को श्रद्धा नहीं होगी क्रियाकर्म के नाम पर केवल ढोंग ही दिखायी देगा।
न वस्तव्यं त्वयैवेह मया त्यक्ते महीतले।
जनोऽधर्मरुचिर्भद्र भविष्यति कलौ युगे ॥५॥
मेरे पृथ्वी छोड़ते ही कलि अत्यन्त प्रबल होकर ताण्डव मचायेगा। इसलिये इससे पहले कि कलि पृथ्वी
का स्पर्श करे तब तक तुम यहाँ से जाने की तैयारी कर लो। जब कलि का संचार प्रारम्भ होगा तब लोगों में
अधर्म बढ़ेगा, कुविद्या फैलेगी और निन्दा का प्रसार होगा। एक कौड़ी का भी लाभ नहीं होगा लेकिन निन्दा के
पर्वत उभरेंगे ऐसी खराब बस्ती है, कलियुग की। इसलिये तुम क्षण भर के लिये भी यहाँ न रहो।
त्वं तु सर्व परित्यज्य स्नेह स्वजनबन्धुषु ।
मय्यावेश्य मनः सम्यक् समदृग्विचरस्व गाम् ॥ ६ ॥
इसलिये हे उद्धव! अपने कल्याण के लिये तुम भी यहाँ से अकेले चले जाओ। धन, धान्य, समृद्धि त्याग दो,
जो भी कोई इष्ट, मित्र आदि हों उन्हें छोड़ो, भाई, बहन, स्त्री, बच्चे आदि किसी की भी आशा न करो। घर गृहस्थी
में आशा रख कर यदि तुम केवल शरीर से हे बाहर निकलोगे तो वह त्याग बहुत कठिन और अनर्थकारी होगा।
पहले स्नेह को जड़ से उखाड़ फेंकना चाहिये, फिर अभिमान का त्याग करना चाहिये, तदुपरान्त वासनारूपी
जटाओं का मुंडन करना चाहिये और तब आश्रम के बाहर पैर रखना चाहिये। अब यह स्नेह कैसे छूटेगा ? अभिमान
को दण्ड कैसे मिलेगा ? यदि तुम्हें इसमें कठिनाई मालूम होती हो तो उसका भी उपाय बताता हूँ। मेरा जो सर्वव्यापी
स्वरूप है उसमें ही चित्त को रखकर निश्चयपूर्वक और सावधानी से उस आत्मस्वरूप में ही निरन्तर रहना चाहिये।
उस व्यापक स्वरूप में निश्चयपूर्वक अवधारणा करने से उस निजभाव के कारण चित्त तन्मय होकर उसे तद्रूपता
प्राप्त होती है। भृंगी भारी होती है और कीट मूर्ख होता है, फिर भी दृढ़ ध्यान के कारण वह तद्रूप होती है। सारांश
यही कि अभ्यास करने से कुछ भी कठिन नहीं है। वह गूढ़ अभ्यास मैंने तुम्हें स्पष्ट रूप से बतला दिया। मेरा
स्वरूप तो ज्ञानधन ही है और ध्यान करने वाला जीव भी संज्ञान है। इसलिये इस प्रकार ध्यान करने से वह भी तद्रूप
हो जाता है। वहाँ सारी समदृष्टि होने के कारण चित्त को समाधान प्राप्त होता है, उस समभाव को ही बढ़ा कर
यथास्थिति रहना चाहिये। पहले गृहस्थाश्रम को छोड़ें और फिर मैं कहाँ रहूँ यह विचार मन में आना स्वाभाविक है,
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तो उसके बारे में भी सुन लो। स्वरूपसाम्य से समदृष्टि होती है, उस समदृष्टि से ही तुम सृष्टि में विचरण करते
रहो। रहने के स्थान के सम्बन्ध में न चिन्ता करो और न कोई योजना बनाओ। कुछ काल के लिये भी एक स्थान पर
रहने से उस स्थान के प्रति अभिमान हो जाता है। इस प्रकार बस्ती का विचार गलत है इसलिये तुम स्थान का प्रयत्न
मत करना। जब तुम सब में सर्वगत हो जाओगे, सर्वाधार और सर्वदेशी बन जाओगे तब तुम तद्रूप होकर मुझे पा
सकोगे और बिना हाथ पैर हिलाये निजधाम आ जाओगे। मुझे निजधाम ले चलिये ऐसा उद्धव ने कहा था तो
श्रीकृष्ण ने उसे आत्मबोध का उपाय बताया। यदि यह उपाय नहीं किया तो मेरी प्राप्ति कभी नहीं होगी। फिर तुम
निजधाम किस तरह आओगे ? यदि कहोगे कि गरुड़ पर बिठा कर मुझे ले चलें तो यहाँ पंखों की गति न होने के
कारण गरुड़ का वहाँ जाना सम्भव नहीं है। इसलिए जो साधक हैं वे उभय पक्ष छोड़कर मद्रूप हो जाते हैं लेकिन
गरुड़ को पक्ष का अभिमान है इसलिये वह वहाँ नहीं जा सकता। अब तुम कहोगे कि मुझे कन्धे पर बिठा कर ले
चलिये तो मुझे वास्तव में कन्धा ही नहीं है। इसलिये अहंबुद्धि का त्याग किये बिना तुम वहाँ नहीं जा सकते। बिना
अहंभाव छोड़े कितने ही उपाय क्यों न करो लेकिन निजधाम में प्रवेश नहीं होगा। जो भी साकार तुम देख रहे हो
वह सब नाशवान है। इस बात का तुम निजबोध से निश्चय करो।
यदिदं मनसा वाचा चक्षुर्भ्यां श्रवणादिभिः ।
नश्वरं गृह्यमाणं च विद्धि मायामनोमयम् ॥ ७ ॥
दृष्टि से जो भी देखा जाय वह सब दृश्यत्व के कारण नष्ट हो जाता है, कान को जो मालूम होता है वह
सब शब्दत्व से विलीन हो जाता है, वाणी जो भी बोलती है, वह सब वितंडावाद में डूब जाता है इसलिये वेदों ने
बोलना छोड़ा और 'नेति' शब्द से ही वह लजा गया। मन के संकल्प ने जो आकलन किया था वह सारा कल्पित
हो गया जो अहंकार पर आधारित थे वे विषय विजातीय होने के कारण व्यर्थ हो गये। इन्द्रियों को जितना दिखाई
देता है वह सारा नश्वर रहता है। यह सब नित्य-अनित्य के विचार से निश्चित हुआ है। लेकिन यह नित्य
अनित्य विवेक भी मायावी है यह ध्यान में रखो। कुल मिलाकर यह सारा लोक मायामय है और माया संकल्प
सृष्टि का ही सृजन करती है। संसार के रूप में जो कुछ दिखाई पड़ता है वह सारा माया का संसार है, इसलिये
तुम धैर्य धारण कर उसे पहचानो। स्वप्न का राज-वैभव जिस प्रकार एक भ्रम रहता है उसी प्रकार यह सारा
सांसारिक वैभव माया है, इसे ध्यान में रखो।
पुंसोऽयुक्तस्य नानार्थो भ्रमः सगुणदोषभाक् ।
कर्माकर्मविकर्मेति गुणदोषधियो भिदा ॥ ८ ॥
परमात्मा से जो विभक्त रहता है उस पुरुष को 'अयुक्त' कहते हैं। अपने एकमेवाद्वितीय अद्वैत आत्मस्वरूप
का विस्मरण होने के कारण उसे अनेकत्व से भेद का भ्रम होने लगता है। उस विस्मृति के भ्रम में मिथ्या भेद का
सत्याभास होने लगता है और भेददृष्टि के आवेश में गुणदोष दिखाई देने लगते हैं। यथार्थ में जब भेद ही नहीं
है तो शुद्ध वस्तु में गुणदोष दिखाई देने का प्रश्न ही नहीं उठता। भेद के जोर से ही गुणदोषदृष्टि उत्पन्न होती है
और कर्माकर्म की त्रिपुटी भेददृष्टि के ही कारण दृढ़ होती है। भेद ने बहुत खराब काम किया है। वह कर्म,
अकर्म, विकर्म, जन्म-मरणादि धर्म और स्वकर्म प्रकाशित करता है। कर्म और विकर्म से नरक की यातनाएँ
भोगनी पड़ती हैं और काम्य कर्म से स्वर्ग प्राप्त होता है इसलिये कर्म करके कर्ममुक्त होकर समाधान प्राप्त करना
चाहिये। अब तुम पूछोगे कि कैसा कर्म ? अकर्म का क्या लक्षण है ? विकर्म का क्या गुण है ? तो वह सब भी
सातवाँ अध्याय १६५
सुनो। काया वाचा और मन से जो कुछ किया जाता है वह कर्म है और सूक्ष्म स्फूर्ति का भान है वह कर्म का मूल
है। मन, वाणी अथवा देह में कर्म का बीज न उत्पन्न होना ऐसा जो 'अकर्म' है वह देहाभिमान वाले में कभी नहीं
होगा। जो सभी दृष्टियों से कर्म से अलग है जिसे कर्म का स्पर्श नहीं हो पाता, जो कर्मठ के योग्य नहीं है वही
यथार्थ में 'अकर्म' है ऐसा समझो। विधिनिषेध की चिन्ता किये बिना जहाँ विशेष कर्म बढ़ता है उसे 'विकर्म'
कहते हैं। यह अत्यन्त संकट में डालने वाली चीज है। सर्वसाधारण कर्म जब विकृत होकर उसमें बड़े-बड़े
विधिनिषेध उत्पन्न हो जाते हैं तो उसे 'विकर्म' कहते हैं। जो विधि के अनुसार नहीं होते वे 'निषेध' की ओर
मुड़ते हैं यह तो स्पष्ट ही है। जिसका आचरण करते समय त्रुटि होती है अथवा बाधा आती है अथवा जिसमें
आकुलता उत्पन्न होती है वह कर्म भी वास्तव में 'निषिद्ध' ही है। ऐसे विकारयुक्त कर्म का 'विकर्म' के रूप में
स्वरूप दिखलाया। इस प्रकार कर्माकर्म के विभाग तुम्हें स्पष्टरूप से दिखलाये। जीव की उत्पत्ति ही पहले
अविद्या के कारण होने से उसके कर्म भी अविद्यात्मक ही होते हैं। अब श्रीधरस्वामी ने किये हुए व्याख्यान की
विशेषता बताता हूँ, सुनो। 'जीव' परम अविद्यायुक्त है। नित्यक्रिया यही उसका 'कर्म', नित्यकर्म न करना यह
'अकर्म' और निषिद्ध कर्म 'विकर्म' है। ऐसे भेदयुक्त कर्माकर्मविकर्म की त्रिपुटी जब सृष्टि में बढ़ती रहती है
तभी गुणदोष बुद्धि के गर्भ में भेददृष्टि भी प्रबल होती है। जिसके कारण गुणदोषों में ही दृष्टि रह जाती है और
विधि निषेधजन्य गाँठें पड़ जाती हैं, वहाँ अभेद में भेद कैसे उत्पन्न होता है ? तो उसके बारे में भी सुनो। पुरुष एक
अकेला ही होता है लेकिन जब वह मनोरथ की महापूजा पर बैठता है तब वह ध्येय, ध्याता और ध्यान के बहाने
भेद का पागलपन शुरू करता है। वहाँ वह नाना प्रकार के उपचार, पूजा साहित्य आदि के बारे में सोचता रहता है।
इस प्रकार वह अकेलेपन में भी मनस्वी भेद बढ़ाता है। 'ध्येय' को उत्तम कहता है और जो ध्याता है उसे 'नीच'
मानता है इसलिये ध्यान गौण हो जाता है और गुणदोषों की वृद्धि करता है। ध्यान में विचित्र प्रकार के गुणदोष हैं,
ध्येय को वह 'परम पवित्र' कहता है और आचरण पवित्र नहीं है इसलिये वह स्वयं अपवित्र हो जाता है। इस
प्रकार ध्यान की दृष्टि से वह स्वयं ही अपने आप में गुणदोषों की त्रिपुटी और भेददृष्टि बनता है। वास्तव में स्वयं
ही ध्येय, ध्याता और ध्यान होते हुए उसे छोड़कर गुणदोषों का स्वरूप अवश्य ही बढ़ाता जाता है। उद्धव ! यह
सारी सृष्टि भेददृष्टि के कारण बढ़ी हुई है और उस भेद के कारण ही कर्म की त्रिपुटी बढ़ गयी है। भेद के प्रति
अनुराग जैसे-जैसे बढ़ता है, जैसे-जैसे विषय का प्रेम बढ़ता जाता है या इन्द्रियों का लाड़-प्यार किया जाता है
वैसे-वैसे यह संसार बढ़ता ही जाता है। साँप को अमृत पिलाया जाय तो जैसे उसका विष ही बनता है, उसी
प्रकार इन्द्रियों को सन्तुष्ट करने से दुःख बढ़ता जाता है।
तस्माद्युक्तेन्द्रियग्रामो युक्तचित्त इदं जगत्।
आत्मनीक्षस्व विततमात्मानं मय्यधीश्वरे ॥ ९ ॥
इसलिये बुद्धिमान पुरुष को इन्द्रियों के द्वार में विषय का प्रवेश ही नहीं होने देना चाहिये। जिस प्रकार विष
में पकायी हुई खीर को मुँह में डाले बिना फेंक देना चाहिये अथवा रस से भरे अमृत फल पर यदि सर्प ने अपना
विष फैला दिया हो तो उसे कौवे भी नहीं खाते क्योंकि वे जानते हैं कि ऐसा करने में उन्हें खतरा है, उसी प्रकार
विषयों का सेवन करते समय मुमुक्षुओं को भला अच्छा कैसे लगेगा ? रात-दिन, पग-पग पर उसमें आत्मघात के
चिह्न उन्हें दिखायी पड़ते हैं। जिन्हें उसमें आत्मघात नहीं दिखायी देता, ऐसे ही लोग विषयों का सेवन करते हैं।
जिस प्रकार उल्लू भरी दोपहरी को भी आधी रात समझता है, उसी प्रकार विषय सेवन से मुमुक्षु की अवस्था
होती है। क्योंकि उससे जन्म-मरण का भोग तो नहीं ही टलता, उल्टे उसका आत्मपतन अवश्य होता है। यदि
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तुम कहोगे कि प्राणियों का जीवन तो विषयों पर ही निर्भर रहता है, उसका त्याग करके वे किस प्रकार जीवित
रहेंगे तो उसका भी सुगम मार्ग बताता हूँ, सुनो। विधिनियमों के अनुसार इन्द्रियों का निग्रह करने से चित्त शान्त
होता है, उसी प्रकार यदि इन्द्रिय और मन इन दोनों का निग्रह किया जाय तो यह त्याग उत्तम और सरल हो जाता
है। इन्द्रिय भले ही विषय की ओर प्रेरित हों लेकिन मन को उसमें प्रवेश नहीं करने देना चाहिये, यह भी एक
प्रकार का त्याग ही है। यदि यह शंका करोगे कि मन को विषय का बल होने के कारण वह विषय की आसक्ति
से चंचल हो जाता है और वह निश्चल कभी नहीं होगा, तो उसका भी उपाय सुनो। मेरा स्वरूप सर्वव्यापी है,
वह मन के अन्दर भी रहता है और बाहर भी। जहाँ-जहाँ मन जाएगा वहाँ-वहाँ वह भी रहेगा ही। चित्त को रहने
के लिये मेरा सिवा कोई स्थान नहीं है। वह स्वदेश में हो या परदेस में, रात-दिन मेरे अन्दर ही रहता है। इस
प्रकार निरन्तर आत्मस्वरूप को ही देखते रहने से वही चित्त सर्वव्यापक हो जायेगा। फिर इस चित्त में ही, तुम्हें
सारा जगत आदि से लेकर अन्त तक दिखने लगेगा। या फिर तुम्हारा जीवस्वरूप भी उत्तम है, उसमें ही यदि तुम
इस जगत को देखने लगोगे तो यह जगत ही तुम्हारा निर्व्यंग अंग बन कर रहेगा। चर तथा अचर, क्षुद्र और महान
आदि जो कुछ भी है उसे अपने जीवरूप में ही देखो। तुम कहोगे कि जीव तो एकदेशी है उसमें सारे जगत को
कैसे देखा जाय? सुवर्ण और अलंकार ये जिस प्रकार एकरूप हैं, उसी प्रकार जीव की मेरे साथ एकता करो।
चिन्तन से कीटक भ्रमर हो जाता है। उसी प्रकार आत्मदृष्टि से तुम भी तत्काल आत्मतत्त्व बन जाओगे। अरे!
नमक का टुकड़ा समुद्र में मिल जाने पर समुद्र की ही तरह बड़ा हो जाता है, उसी प्रकार तुम भी तत्काल मद्रूप
हो जाओगे। उस समय 'मैं' और 'तुम' का भेद अपने आप समाप्त हो जाएगा। उस समय तुम परमानन्दरूप
शुद्ध, बुद्ध, मुक्त और सिद्ध बन जाओगे।
ज्ञानविज्ञानसंयुक्त आत्माभूतः शरीरिणाम्।
आत्मानुभवतुष्टात्मा नान्तरायैर्विहन्यसे ॥ १०॥
शास्त्र के श्रवण से ज्ञान दृढ़ होता है, मनन के अभ्यास से ज्ञान का विज्ञान होता है, इन दोनों का स्वरूप
ध्यान में लेने से तुम ब्रह्मस्वरूप हो जाओगे। अगर तुम पूछोगे कि स्वहित के लिये तुम्हारे चरणों का अखण्ड
भजन करते रहें और अगर उसमें विघ्न आ जाये तो क्या करें ? तो सुनो। दंभ और लौकिक बातों का विचार कर
जो भक्त फल की इच्छा का त्याग कर भजन करता है उसके विघ्न किस प्रकार आयेगा ? उसके मार्ग में विघ्नों
का नाश करने के लिये मैं यह धारदार चक्र लेकर उसके आगे-पीछे सदैव खड़ा रहता हूँ। उद्धव ! इस प्रकार जो
निजभाव से मेरा भजन करता है उसे बाधा पहुँचाने का साहस देवताओं में भी नहीं है। सारांश यह कि
ब्रह्मस्वरूप हो जाने के बाद चराचर की आत्मा तुम स्वयं हो जाओगे। चाहे स्थावर हो चाहे जंगम हो चाहे देव हो
या दानव हो सब जगह तुम ही तुम रहोगे। तुम्हारे अतिरिक्त अणुमात्र के लिये भी कुछ नहीं रहेगा। इसलिये
तुम्हारे लिये विघ्न किस प्रकार की बाधा उत्पन्न करेगा ? ब्रह्मादिक को ग्रसित करने वाला जो काल है उसकी भी
तुम आत्मा बनकर रहोगे। इस प्रकार श्रीकृष्ण ने उद्धव की पीठ थपथपाते हुए यह बात कही। इस प्रकार बाह्य
बाधकता अपने आप नष्ट हो जाती है, संकल्प कल्पना बन्द हो जाती है, ब्रह्मानन्द की भोर होती है और कर्म का
रास्ता बन्द हो जाता है। ऐसा जो ब्रह्मानुभवी है उसके सामने कर्म दरिद्र अर्थात् निःसत्व हो जाता है, वेद उसके
सेवक बन जाते हैं और विधिविवेक कर्मचारी हो जाते हैं। यही बात मैं तुम्हें कितनी बार और कैसे समझाऊँ ? मैं
भी उसका आज्ञाधारक बन जाता हूँ। ऐसे भक्त जहाँ कहीं भी मेरी प्रतिष्ठा करते हैं वहाँ मुझे प्रकट होना पड़ता
सातवाँ अध्याय १६७
है। भक्त का वचन निभाने के लिये मुझे नरसिंहावतार में सूखी लकड़ियों में प्रकट होना पड़ा, दुर्वासा को मैं पीठ
पर लाद कर ले गया था। यह तो तुमने देखा ही था। अब यदि तुम कहोगे कि भगवान जिसका आज्ञाधारी बन
गया, उसका कर्म तो किंकर हो ही जायगा, फिर ज्ञाता विषय के नाम पर सहज ही स्वेच्छाचार करते रहेंगे। ज्ञाता
स्वेच्छा से विषयाचरण नहीं करते, उसका कारण भी सुनो। जिसका अभिमान दग्ध हुए वस्त्र की तरह रहता है
उसका प्रपंच का ध्यान मिथ्या हो जाता है और उसे विषयों का दर्शन भी मिथ्या लगता है। जिसे प्रपंच की चाह
रहती है विषयों से प्रेम रहता है, मनचाहे आचरण के प्रति आसक्ति रहती है वही संसार बन्धन के संकट में
फँसता है। किन्तु ज्ञाता को विषय के प्रति सत्यनिष्ठा नहीं रहती, इसलिये वह विषय भोग में कैसे लब्ध होगा?
अब ज्ञाता के कर्म का मर्म बताता हूँ, सुनो। ज्ञाता मनोधर्म को स्पर्श किये बिना ही सारी क्रियाओं और सारे धर्मों
का आचरण करते रहते हैं।
दोषबुद्धयोभयातीतो निषेधान्न निवर्तते।
गुणबुद्धया च विहितं न करोति यथार्भकः ॥ ११॥
श्लोक ११—गुणदोषातीत ज्ञाता मनमाने ढंग से कभी आचरण नहीं करता लेकिन वह स्वभाव से भीरू भी
नहीं होता। वह विहित कर्म करता है, लेकिन यह मैंने अच्छा किया है ऐसा अहंभाव भी नहीं रखता। कुम्हार के
चाक की तरह वह भाग्य के अनुसार चलता रहता है। न तो वृत्ति में संकल्प न मन में हेतु स्फुरता है ऐस कर्म ज्ञाता
केवल शरीर धर्म से ही करता है। इसलिये सत्कर्म करने से सिद्धि प्राप्त हुई यह घमण्ड उसे छू नहीं पाता अथवा
कर्म बीच में ही रुक गया तो इसके लिये उसके मन में बेचैनी नहीं होती। जिस प्रकार सोये हुए पुरुष के पीछे बाघ
बैठ जाये या सामने स्वर्ग का भोग विलास आ जाय तो उसे न उसका भय लगता है न प्रीति उत्पन्न होती है। उसी
प्रकार ज्ञाताओं की स्थिति रहती है। गुण अथवा दोष का विचार न कर जिस प्रकार बच्चे सहज रूप में खेलते रहते
हैं, उसी प्रकार ज्ञाताओं की स्थिति रहती है। कर्मप्राप्ति अभिमान के कारण घटती है, वह अभिमान ही जब वे त्याग
देते हैं तो फिर उसके बिना वे कैसे विचरण करते हैं? कर्म तो उनके हाथ से होने वाला नहीं है। ऐसा विकल्प यदि
तुम मन में लाओगे तो मैं तुम्हें बताता हूँ कि यह स्थिति दूसरों की समझ में आने लायक नहीं है, निरभिमानता यह
स्वानुभव है, दूसरों की समझ में वह कैसे आयेगा? भाग्य के अनुसार देह सहज रीति से सारी हलचल करता है
लेकिन अज्ञान के जोर से अभिमान की वृद्धि होती है और वह 'मैं कर्ता हूँ' ऐसी बातें करने लगता है। उस समय
गुरुवचनों के अनुसार ज्ञाताजन उचित अभ्यास के साथ अज्ञान के कारण उपजे अभिमान को समाप्त कर देते हैं।
उस समय शेष प्रारब्ध के अनुसार, निरभिमान से उनका देह आचरण करता रहता है अर्थात् ज्ञानसम्पन्न लोगों के सारे
कार्य केवल शरीर धर्म से ही होते रहते हैं। उन्हें 'अहेतुक' कहते हैं। बालक की उपमा देकर इस स्थिति का वर्णन
बताया। कृष्ण ने उद्धव से कहा, "अब निरभिमान के लक्षण बताता हूँ सुनो।" तब उद्धव मन ही मन आनन्दित
हुआ और ध्यान देकर सुनने लगा।
सर्वभूतसुहृच्छान्तो ज्ञानविज्ञाननिश्चयः।
पश्यन्मदात्मकं विश्वं न विपद्येत वै पुनः ॥ १२ ॥
पहले शास्त्रश्रवण से ज्ञान उत्पन्न होता है, तदुपरान्त उस ज्ञान के अनुभव से 'विज्ञान' प्राप्त होता है, ऐसे
ज्ञानविज्ञान से सम्पन्न होने पर वह निरभिमान होता है। इस प्रकार सचमुच की निरभिमानता हाथ आने पर उसमें
'शान्ति' का उल्लास उत्पन्न होता है। जबर्दस्ती चित्त को निश्चल करने का प्रयत्न करना अथवा दाँत पीसकर
१६८ श्रीमद् एकनाथी भागवत
परोपकार सहन करना इसे शान्ति कौन कहेगा ? आक्रोश से सहनशीलता लाने का प्रयास करना शान्ति नहीं है।
शान्ति क्षुब्ध न होने वाले समुद्र की तरह होती है। वह न कभी घटता है, न कभी बढ़ता है। सैकड़ों नदियाँ अपना
मटमैला जल समुद्र में डालती रहती हैं लेकिन समुद्र का जल मैला नहीं होता। उसी प्रकार स्वार्थ का विरोध करने
वाली अनेक विषमताओं का प्रहार होने पर भी उसके चित्त में जरा भी परिवर्तन नहीं होता। वही सच्ची 'शान्ति'
है। ऐसी शान्ति जिसे प्राप्त होती है वही समस्त प्राणिमात्र का सखा है, सबका चहेता वही है और सब का सुहृद
भी वही है। उसका सखाभाव भी बड़ा विचित्र है। वह अपनी मैत्री के लिये सर्वस्व अर्पण करता है, अपना स्वार्थ
सिद्ध करने के लिये वह किसी को फँसाता नहीं है जो कृपापात्र होता है उसी को उपदेश करता है। उसकी दृष्टि
अतर्क्य होती है, उसे सारी सृष्टि मद्रूप ही दिखाई देती है। उसने अपनी दृष्टि से जगत की और मेरी गाँठ बाँधी
रहती है। फिर वह जिधर भी देखता है उधर उसे मैं ही दिखाई देता हूँ। वह यदि मुझे नहीं देखता तो उसका वह
न देखना भी मैं ही होता हूँ। उसकी देखने की दृष्टि मैं स्वयं हो जाता हूँ और सारी सृष्टि के साथ-साथ मेरी और
उसकी दोस्ती जम जाती है। सारी सृष्टि ही जब मैं हो जाता हूँ तो 'वह और मैं' ये शब्द ही व्यर्थ हो जाते हैं। इस
प्रकार वह सर्वत्र समदृष्टि के योग से एकात्म होकर मुझमें ही वास करता है। इस प्रकार मनोधर्म ही छोड़ देने के
कारण जिसके लिये मैं सुगम हो जाता हूँ उसे वह जन्म कैसे मिलेगा जिसके कारण उसे दुर्धर दुःख भोगना पड़ता
है। माता की उदररूपी गुफा में रजस्वला के रुधिर में पिता के रेत द्वारा गर्भधारणा होकर संसार का प्रारम्भ होता
है। माँ के पेट में स्थित जीव जन्तु उसके नाक में, मुँह में, छाती में और मस्तक में प्रवेश करते हैं और वह प्राणी
नौ महीने तक विष्ठामूत्र में लिपटा पड़ा रहता है। जठराग्नि के दावानल में गर्भ का गोल पिण्ड तैयार होता है और
फिर उसमें से एक-एक अवयव तैयार होता है। हे नारायण ! वह गर्भ की वेदना और वहाँ की नाना प्रकार की
यातनाएँ तो असह्य होती हैं। उसके बारे में सुनकर ही घृणा होती है और फिर सबके अन्त में जो प्रसूति वायु उठती
है उससे तो सारे शरीर में बिच्छू के डंक जैसी वेदनाएँ होती हैं और बड़े संकट से योनि में से शरीर का जन्म होता
है। ऐसा अपवित्र जन्म उन उत्तम पुरुषों को कभी प्राप्त नहीं होता जिन्होंने निजधाम प्राप्त कर लिया है। वे
समदृष्टि के कारण स्वयं ही पुरुषोत्तमस्वरूप हो जाते हैं। उनके आगे पीछे मैं ही होने के कारण उनके लिये जन्म
का प्रश्न ही नहीं उठता। वे कलिकाल की परवाह न कर सीधे मत्स्वरूप हो जाते हैं। जहाँ जन्म ही नहीं रहता
वहाँ मृत्यु भी खाली हाथ लौट जाती है। इस प्रकार मेरे भक्त मेरा भजन कर उसके बल से ही मुझे प्राप्त करते हैं।
इतना कह कर कृष्ण ने उद्धव की पीठ थपथपायी और कहा, “चलो उठो, शीघ्रता करो, यही युक्ति साध्य करो
ताकि जीवन का कष्ट समाप्त हो जाय। मेघ के मुख से निकला हुआ जल चातक जिस प्रकार ऊपर ही ऊपर
ग्रहण कर लेता है, उसी प्रकार कृष्ण के भाषण का भी उद्धव ने आकंठ पान किया। चकोर जिस प्रकार
चन्द्रकिरण के लिए आतुर हो उठता है उसी प्रकार हरि के भाषण के लिये उद्धव उतावला हो गया। पक्षिणी के
बच्चे माँ के आने का समय होते ही जिस प्रकार नीड में आगे सरक कर प्रतीक्षा करते हैं। उसी प्रकार कृष्ण का
मुख देखकर उद्धव को अत्यन्त आनन्द हुआ और वह कानरूपी मुख से कृष्णामृत प्राशन करने लगा। "
श्रीशुक उवाच
इत्यादिष्टो भगवता महाभागवतो नृप।
उद्धवः प्रणिपत्याह तत्वजिज्ञासुरच्युतम् ॥ १३ ॥
शुक्राचार्य कहते हैं, हे परीक्षित् ! भगवान के हृदय में कृपा उत्पन्न हुई इसलिये उसने अपने महान भक्त को
सातवाँ अध्याय १६९
आत्मज्ञान का उपदेश किया। उसे सुनकर उद्धव की ज्ञानक्षुधा और भी बढ़ गयी। इससे मालूम होता है कि श्रीकृष्ण
का यह ज्ञानयुक्त भाषण कितना अपूर्व था। श्रीकृष्ण ने स्वमुख से अपना हृद्गत सुनाया, वह निरूपण नितांत मधुर
था जिससे मन में सुनने की इच्छा बढ़ी, जिससे भगवान की मर्यादा का भी विचार नहीं रह गया। उद्धव का हृदय
प्रेम से भर आया, उसने भगवान को साक्षात दण्डवत किया और फिर वह उनसे पूछने लगा।
उद्धव उवाच
योगेश योगविन्यास योगात्मन्योगसम्भव।
निःश्रेयसाय मे प्रोक्तस्त्यागः संन्यासलक्षण ॥ १४॥
उद्धव ने कहा, हे योगियों के योगिराज! तुम श्रीपति योगियों की निधि हो। तुम योग की साक्षात मूर्ति हो
तथा योग से ही तुम प्रकट होते हो। समस्त योगों की उत्पत्ति तुमसे ही है। मुझे मोक्ष लाभ हो इसलिये तुमने मुझे
त्याग का और संन्यास का लक्षण बताया। लेकिन यह त्याग अत्यन्त दारुण और कठिन है।
त्यागोऽयं दुष्करो भूमन् कामानां विषयात्मभिः।
सुतरां त्वयि सर्वात्मन्नभक्तैरिति मे मतिः ॥ १५ ॥
इस त्याग की रीति देखी जाय तो हे श्रीकृष्ण! वह मुझे भी कठिन लगती है। फिर दूसरों की क्या गति
होगी? हे श्रीकृष्ण! जिनके चित्त में काम है, जिनकी बुद्धि विषयों के प्रति आसक्त हो गयी है उनसे यह त्याग
कभी भी सम्भव नहीं है। जब तक तुम्हारी कृपा नहीं होती तब तक अभक्तों के द्वारा यह त्याग कैसे सम्भव
होगा? भगवान ने जो त्याग बतलाया है वह सबके लिये सम्भव नहीं है। कैसा चमत्कार है! तुम साक्षात सबके
हृदय में रहते हो लेकिन उसमें उनका चित्त प्रवेश नहीं करता और विषयों में फँस जाता है। इस प्रकार प्रपंच में
आसक्त होने के कारण अभक्त तुमसे विमुख हो जाते हैं, उनसे त्याग नहीं हो सकता क्योंकि उनका चित्त सदैव
दूषित हुआ रहता है। "हे श्रीकृष्ण! त्याग क्यों नहीं होता?" तो सुनो, उसका कारण भी बताता हूँ। त्याग करने
में क्या कठिनाई है यह भी तुम्हें बताता हूँ।
सोऽहं ममाहमिति मूढमतिर्विगाढस्त्वन्मायया विरचितात्मनि सानुबन्धे।
तत्त्वञ्जसा निगदितं भवता यथाऽहं संसाधयामि भगवन्ननुशाधि भृत्यम् ॥ १६॥
तुम्हारी माया विचित्र व्याधि है। वह शरीर में आत्मबुद्धि उत्पन्न करती है और शरीर के सम्बन्ध में जो कुछ
है वह सब आत्मीय है ऐसा आभास कराती है। इस प्रकार विपरीत भावना बढ़ गयी है। 'मैं' और 'मेरा' यही
विचार छा जाने के कारण बुद्धि विचारशून्य होकर घर गृहस्थी पर विशेष आसक्ति हो जाती है, जिससे त्याग
कठिन हो जाता है। वह बुद्धि निर्मल हो सके, अनायास आत्मस्वरूप का आकलन हो जाए ऐसी कृपा भगवान
करें तभी दास तर सकता है। हे पुरुषोत्तम! हे श्रीकृष्ण! हे आत्माराम! मेरे जैसे तुम्हारे दासों को सांसारिक
यातनाओं से मुक्त करो। हे श्रीकृष्ण! तुम्हें छोड़ किसी दूसरे से पूछना मुझे अच्छा नहीं लगता क्योंकि विषयों ने
सबको ग्रस लिया है।
सत्यस्य ते स्वदृश आत्मन आत्मनोऽन्यं वक्तारमीश विबुधेष्वपि नानुचक्षे।
सर्वे विमोहितधियस्तव माययेमे ब्रह्मादयस्तनुभृतो बहिरर्थभावाः ॥ १७॥
महादेव से पूछने जाओ तो वह सृष्टि की उत्पत्ति में व्यस्त हैं। रात-दिन प्रजा किस प्रकार उत्पन्न की जाय
१७० श्रीमद् एकनाथी भागवत
इसी चिन्ता में मग्न। जो अपने दैहिक स्वभाव धर्म के कारण सर्वदा संसार की वृद्धि करता रहता है वह संसार से
मुक्त कैसे रह सकता है? अपनी निर्मित की हुई चीज को वह कभी डुबायेगा नहीं। नारद ब्रह्मोपदेश कर संसार
की उत्पत्ति में बाधा डालने लगा, तो ब्रह्मदेव ने कुपित होकर उसे शाप दे दिया। हे श्रीकृष्ण ! इस प्रकार संसार
की आसक्ति से जो उसमें लीन हो गये हैं उनसे पूछने का मन नहीं करता। यदि ऋषियों से पूछने जाओ तो वे
हमेशा अपने ही मत के अभिमान में लीन रहते हैं, सदा अपना ही मत स्थापित करना चाहते हैं। उनके विरुद्ध
कोई बोले तो उसे शाप देते हैं। मन में धन की आशा रखकर जो शिष्यों को उपदेश देते हैं, उनके मन में ही
विषय होने के कारण वह उपदेश पेट भरने का साधन बन जाता है। जब गुरु में ही विषयासक्ति है तो शिष्य में
विरक्ति कैसे आयेगी? ऐसे गुरु से जो पूछने जाते हैं वे स्वार्थ सिद्धि से वंचित हो जाते हैं। तुम सत्यस्वरूप,
स्वयंप्रकाश, सर्वात्मा तथा अविनाशी हो इसलिये किस प्रकार युक्ति प्रयुक्ति से उपदेश करना चाहिये तथा
विकल्प को किस प्रकार दूर करना चाहिये यह केवल तुम ही जानते हो। हे श्रीकृष्णनाथ ! ब्रह्मज्ञान का उपदेश
करने में तुम्हारे जैसा कोई मुझे सारे त्रिभुवन में नहीं दिखाई देता। इस प्रकार हे कृष्ण ! यथार्थ में आत्मा तुम ही
हो, आत्मज्ञान देने वाले भी तुम ही हो और आत्मबोध में स्थिर करने वाले भी तुम ही हो।
तस्माद्भवन्तमनवद्यमनन्तपारं सर्वज्ञमीश्वरमकुण्ठविकुण्ठधिष्ण्यम् ।
निर्विण्णधीरहमुह वृजिनाभितप्तो नारायणं नरसखं शरणं प्रपद्ये ॥ १८ ॥
हे यादवश्रेष्ठ ! तुम नित्य, शुद्ध और पवित्रमूर्ति हो, इसलिये तुम्हें ममतामोह स्पर्श नहीं करते। इसीलिये
लोग 'तुम पवित्र हो' इन शब्दों में तुम्हारी कीर्ति का गायन करते हैं। गोपों के जूठे ग्रास से जिसकी पवित्रता भंग
नहीं हुई, बल्कि उसी जूठे ग्रास से तुमने उन गोपालों को तारा। पूतना के प्राणों को सोख लिया फिर भी तुम्हारी
पवित्रता कम नहीं हुई बल्कि उसका उद्धार हुआ। अर्थात् दोष ही दोष का तारणहार बना। कालिया सर्प का मर्दन
कर उसका अभिमान चूर कर दिया लेकिन पवित्रता नष्ट नहीं हुई। उसे विषविहीन कर उसका उद्धार किया।
रजक तो जाति से नितान्त हीन था और उसका अधःपतन होने को था लेकिन उसे मारकर तथा उसे पुनीत
बनाकर उसे तुमने सायुज्य मुक्ति का पात्र बनाया। गोपियों के साथ निंद्य मालूम होने वाला कर्म करके तुमने उन्हें
निष्काम बना दिया। इससे वे अत्यन्त पवित्र होकर सायुज्यधाम चली गयीं। चाहे सुकर्म हो या कुकर्म हो लेकिन
उसे करते समय पवित्रता अक्षुण्ण रहती है, इसीलिये अर्थात् अकर्तात्म बोध के कारण ही तुम्हें 'पुरुषोत्तम' यह
नाम प्राप्त हुआ है। जो त्रिगुणों में फँस जाता है, उसे वे गुण जकड़ लेते हैं लेकिन तुम्हारे पास आते ही वे गुण
समाप्त हो जाते हैं इसलिये तुम सर्वथा 'अनंत' हो। देश या काल की तुम्हारे लिये कोई सीमा नहीं है इसलिये
तुम 'अनंत' और 'अपार' हो। श्रुति भी तुम्हारी थाह नहीं पा सकीं। तुम्हारी मैं कितनी विनती करूँ ? विनती
करते-करते मैं व्याकुल हो उठा हूँ। तुम हृदयस्थ ज्ञानमूर्ति हो इसलिये समस्त त्रिभुवन में ज्ञाता तुम एक अकेले
हो। ज्ञान, अज्ञान ये जो मायाशक्ति हैं, वे सारी ईश्वर के अधीन हैं। लेकिन तुम उस ईश्वर की भी ईश्वरमूर्ति हो।
हे श्रीकृष्ण ! यह तुम्हारी सत्य कीर्ति है। हे कृष्णनाथ ! सर्वस्व के नियंता, सब कुछ करने पर भी अकर्ता और सब
कुछ भोग कर भी अभोक्ता ऐसे एकमेव ईश्वर तुम हो। देश और काल से जिस स्थान का विनाश नहीं होता वहाँ
के तुम निवासी हो तथा पूर्णांश का सम्पूर्ण अवतार हो। तुम 'नर' का अविनाश स्थान हो इसलिये तुम्हे 'नारायण'
कहते हैं। तुम्हारे ही कारण जीव में चलन-चालन होता है। सबका चालकत्व तुम्हारे हाथ में है। इस प्रकार तुम
स्वयं ईश्वर हो तथा नर के विशेष नारायण हो। युद्ध के समय तुमने ही अर्जुन को ब्रह्मज्ञान दिया। उस भीषण
प्रसंग में जब एक-दूसरे का प्राण लेने के लिये जीव अग्रसर थे उस समय तुमने अर्जुन को ब्रह्मज्ञान दिया। तुम
सातवाँ अध्याय १७१
ऐसे कृपालु हो इसीलिये मैं तुम्हारी शरण में आया हूँ। आधिभौतिक, आध्यात्मिक तथा आधिदैविक इन तीनों
तापों से मैं दग्ध हो गया हूँ। यह संसार भीषण दुःख से युक्त है। संसार एक अन्धा कुआँ है। उसमें कामक्रोधादि
महादुष्ट सर्प हैं। उसमें निन्दा और प्रतिस्पर्द्धा रूपी काँटे फैले हुए हैं। ऐसे दुःख में मैं पड़ा हुआ हूँ और पेट में
ब्रह्मद्वेष का शूल उभरने से छटपटा रहा हूँ। उसमें से बाहर निकलने के लिए मुझे कोई उपाय नहीं सूझ रहा है।
इसलिये हे कृपानिधे ! हे दयालु ! आत्मज्ञान का बोध कराकर मुझे ऊपर निकालो।
श्रीभगवानुवाच
प्रायेण मनुजा लोके लोकतत्त्वविचक्षणाः ।
समुद्धरन्ति ह्यात्मानमात्मनैवाशुभाशयात् ॥ १९॥
शरीर में भूत का संचार होने पर जिस प्रकार मांत्रिक (समंत्र) उस पर अक्षत् फेंकता है उसी प्रकार जहाँ
पहले ही पंचमहाभूतों का संचार हुआ था, उसमें कृष्ण वियोग का भूत शरीर में प्रवेश करने के कारण उद्धव
बिलकुल घबरा गया था। तब उद्धव की घबराहट का बहाना बनाकर, लोगों के मन में 'अहं' का जो महिषासुर
घुस गया था उसे निकाल बाहर करने के लिये कृष्णरूप जानकर निकल पड़ा। उस 'अहं' महिषासुर को निकाल
बाहर करने के लिये श्रीकृष्ण यदु अवधूत संवादकथा की मंत्राक्षत फेंक कर उस भूत को भगा रहा है। श्रीकृष्ण ने
उद्धव से कहा, अब तुम सावधान हो जाओ, क्योंकि इस मृत्युलोक में अपना उद्धार स्वयं ही करना पड़ता है।
सच पूछो तो इस परमार्थ के लिये माता-पिता किसी प्रकार की सहायता नहीं कर सकते। पुत्र, बन्धु, कन्या
अथवा कांता तो कभी सहायक नहीं होते। परमार्थ में न समधी सहायता करता है न दामाद ही सहायक होता है,
बल्कि जो हमारे शरीर में रहकर विवेक का काम करता है वही हमारे लिये सहायक होता है। मुमुक्षु मार्ग पर
चलने वाले तत्त्वविचार करने वाले ज्ञानी लोग, कार्यकारण का विचार कर अपनी ही बुद्धि से संसार सागर को
पार करते हैं। नित्य क्या है और अनित्य क्या है इसका विचार कर अनित्य का त्याग करते हैं और जो नित्य है
उसका स्वहित के लिये अंगीकार करते हैं। नित्यत्व से जो शेष रह जाता है, वही मेरा चिद्धन स्वरूप है, इसे
ध्यान में रखो। साधकों का साधन भी वही है इसलिये उसे भी वे अनन्यभाव से अर्थात् स्वयं ही वह तत्त्व हैं इस
भावना से उसका चिन्तन करते हैं। इस प्रकार मुझमें दृढ़ भावना रखने से मैं ही वह कीट-भृंग बन जाता हूँ और
इस प्रकार वे स्वयं ही अपना उद्धार कर लेते हैं।
आत्मनो गुरुरात्मैव पुरुषस्य विशेषतः ।
यत्प्रत्यक्षानुमानाभ्यां श्रेयोऽसावनुविन्दते ॥ २० ॥
पशु-पक्षी आदि योनियों में भी हित और अहित किसमें है इस बात का ज्ञान रहता है। फिर मनुष्य के देह में
वह क्यों नहीं होगा ? वह सहजस्फूर्त रहता है यह ध्यान में रखो। मैं अपने देह से जो कर्म कर रहा हूँ, उससे मैं
तरूँगा या नहीं यह प्रत्येक व्यक्ति अपनी स्फूर्ति के द्वारा जानता रहता है। अशुभ वासना को छोड़ जो मन में विषय
की कल्पना भी नहीं करता वह स्वयं ही अपना गुरु बन कर नरक की यातनाओं से बचाता है यह ध्यान में रखो।
जो गर्भावस्था और जन्म से थक जाता है, मरने-जीने की प्रक्रिया से ऊब जाता है, जन्म-मृत्यु के विनाश के प्रति
व्याकुल रहता है, स्त्री पुत्रों के प्रति जिसके मन में मोह नहीं उत्पन्न होता, जीवन को काल ग्रस रहा है फिर भी
मेरा हित किसमें है यह मालूम नहीं होता और इस विचार से जिसे रात को नींद नहीं आती जरा विचार करो कि
तुम्हारे देखते-देखते उसने तुम्हारी बाल्यावस्था को ग्रस लिया, यौवन का शिखर उसने निगल लिया और अब वह
१७२ श्रीमद् एकनाथी भागवत
वृद्धावस्था की ओर चक्कर लगा रहा है। वार्धक्य तो केवल जाल है लेकिन उसके भी पीछे काल लगा हुआ है।
जीवन इस प्रकार बड़ी शीघ्रता से व्यर्थ जा रहा है यह बात संसार की समझ में नहीं आती। हर क्षण काल व्यर्थ हो
रहा है, परमार्थ का तो कोई काम नहीं होता इसलिये जन्म-मरण के भँवर का अनर्थ सामने दिखायी देता है। स्वर्ग,
नरक, कर्म और ब्रह्म ये चारों बातें मनुष्यत्व के कारण ही प्राप्त होती हैं इसलिये पापकर्म को छोड़ मोक्षधर्म को ही
स्वीकार करना चाहिये। हाय! मोक्ष के लायक यह नरदेह व्यर्थ ही नष्ट हो रहा है। यह बात उसे शल्य की तरह
चुभती रहती है इसलिये वह विषय-व्यापार की बात भूल जाता है। प्रत्यक्ष अनित्य के लक्षण से ही संसार
नाशवान मालूम होता है इसलिये वह उसमें आसक्त नहीं होता, मृत्युलोक के भोगों के प्रति वह विरक्त हो जाता
है। इसी प्रकार परलोक के विवेक का प्रकाश देता हूँ और उस विवेक से उसके मन में आत्मबोध जगता है।
जिसमें जैसा भाव रहता है उसके लिये मैं वैसा ही देवता बन जाता हूँ इसमें जरा भी सन्देह न करना। देखो,
उद्धव! इसके लिये केवल बुद्धि का निर्मल होना ही आवश्यक है, तभी आत्मबोध तत्काल सफल होता है।
पुरुषत्वे च मां धीराः सांख्ययोगविशारदाः।
आविस्तरां प्रपश्यन्ति सर्वशक्त्युपबृंहितम् ॥ २१॥
इस प्रकार जो वैराग्य से पूर्ण तथा विवेक से युक्त धैर्यवान पुरुष है, वही सांख्य का और योग का विचार
करता है, उसके अंतःकरण में तत्काल आत्मज्ञान की प्राप्ति होती है। जिन नरदेहों में विवेक रहता है, उन्हें
आत्मस्वरूप की प्राप्ति होती है। जो सर्वशक्तिमान तत्त्व है वही उन्हें धीरे-धीरे दृष्टिगोचर होने लगता है। जिससे
सारी शक्तियाँ उत्पन्न होती हैं, वह सब शक्ति को शक्ति प्रदान करने वाला है, लेकिन जो सारी शक्तियों की भी
समझ में नहीं आता ऐसे स्वरूप को वे देखते हैं। हे उद्धव! तुम्हें क्या-क्या बताऊँ? इस संसार में मैंने अनेक
प्रकार के शरीरों का निर्माण किया लेकिन सुख का अनुमान लगाकर, वह भी नश्वर ही है, उसमें भी पतन है यह
जानकर मन को उसका भी स्पर्श नहीं होने देता। कब भगवान की कृपा होगी? संसारबन्धन कब टूटेगा? जिससे
परमानन्द प्राप्त होता है, वह आत्मबोध कब प्राप्त होगा? हे श्रीहरि! दौड़ कर आओ इस दीन पर दया करो, हे
भक्तप्रेमी श्रीकृष्ण इस संसार सागर से मेरा उद्धार करो। इस प्रकार जैसे जल के बिना मछली छटपटाती है, उसी
प्रकार वह आत्मज्ञान के लिये छटपटाता रहता है, भक्तिप्रेम की लहरें मन में उठती रहती हैं इसलिये वह अपने
शरीर को भी नहीं सँभाल पाता। कोई अजाने की नरदेह से वंचित हो गये, किसी ने नास्तिकता के कारण उसकी
उपेक्षा की, किसी को ज्ञान के अहंकार ने ग्रस लिया तो कोई विषय के ही भुलावे में आ गया। कोई साधन के
अभिमान से ठगा गया, कोई आज करूँगा, कल करूँगा कहते-कहते मर गया, कोई बहक कर गलत रास्ते पर
चले गये। मन को विवेक की बात समझ में आती है लेकिन विषयवासना नहीं छूटती इसलिये वह संतप्त होकर
नारायण का चिन्तन करता है। कृष्ण उद्धव से कहते हैं-जिसमें विवेक के साथ वैराग्य उत्पन्न होता है, वही
स्वयं अपना गुरु बनता है-यह ध्यान में रखो। उसकी बुद्धि को मैं ही मुझे नरदेह ही विशेष रूप से अच्छा
लगता था क्योंकि वह देह धारण करने वाला तत्काल मद्रूप हो सकता है।
एकद्वित्रिचतुष्पादो बहुपादस्तथापदः।
बह्वः सन्ति पुरः सृष्टास्तासां मे पौरुषीप्रिया ॥ २२॥
मैंने कुछ शरीर एक पैर के बनाये, दो पैर के तो अनेक बनाये, कुछ तीन पैरों के बने, वे तो बड़े मजेदार
दिखायी देते हैं, चतुष्पाद प्राणी तो बहुत सुन्दर दिखायी देते हैं। सर्पादि प्राणियों को तो मैंने पैर ही नहीं दिये,
सातवाँ अध्याय १७३
कितने ही प्राणी अनेक पैरों से चलने वाले हैं। इस प्रकार मैंने अनेक प्रकार के शरीर गढ़े हैं। इस प्रकार पृथ्वी पर
मैंने बनाये हुए शरीरों की संख्या कितनी है, इसका अन्त नहीं है, लेकिन वे प्राणी मुझ कर्त्ता को नहीं पहचानते
इसलिये मतिमंद हैं। मुझ कर्त्ता की प्राप्ति हो सके इसलिये मैंने अपने अंश से ज्ञानशक्ति प्रकाशित कर मनुष्य
शरीर का निर्माण किया। जिस देह से वे मुझे प्राप्त करते हैं, उस देह से मुझे अत्यन्त प्रीति है, इसीलिये वेद
नरदेह का वर्णन करते हैं और देवता भी नरदेह की कामना करते हैं। अनेक युक्तियों से लोग इसी नरदेह से मुझे
प्राप्त करते हैं। ऐसे नरदेह की प्रीति के सम्बन्ध में श्रीकृष्ण ने उद्धव को बताया।
अत्र मां मार्गयन्त्यद्धा युक्ता हेतुभिरीश्वरम्।
गृह्यमाणैर्गुणैर्लिङ्गैरग्राह्यमनुमानतः ॥ २३ ॥
नरदेह प्राप्त करने के बाद वे कर्ता की खोज करते हैं—मेरी, जो त्रिभुवन की उत्पत्ति, स्थिति और संहार
करने वाला परमेश्वर, मेरी बुद्धि का विवेक से अनुमान लगाते हैं, लेकिन वह अनुमान और उससे निष्पन्न होने
वाला ज्ञान भी जड़ ही रहता है, क्योंकि उस ज्ञान को प्रकाशित करने वाला स्वयंप्रकाश मैं उन सबसे भिन्न हूँ। ऐसे
लक्षणों से वे मुझे जानते हैं लेकिन इस प्रकार के कितने ही अनुमान वे करें लेकिन मैं उनके वश में आनेवाला
नहीं हूँ। तो जो भी कोई अभिमान त्याग कर मेरा स्वरूप देखने का प्रयास करते हैं, केवल उन्हें ही मेरे स्वरूप का
साक्षात अनुभव प्राप्त होता है, यह बात ध्यान में रखो। जिसकी सारी आशाएँ नष्ट होती हैं, वही धीरे-धीरे
ब्रह्मस्वरूप प्राप्त करता है, उसने ही कलिकाल से लड़ने के लिये कमर कस ली है ऐसा समझना चाहिए। चेहरा
तो स्वतःसिद्ध रहता है लेकिन यदि निर्मल दर्पण हो तभी उसकी छवि दिखायी दे सकती है, उसी प्रकार जब बुद्धि
को विवेक प्राप्त होता है तभी नरदेह में आत्मा दिखायी देने लगता है। इस सम्बन्ध में एक प्राचीन इतिहास है, वह
मैं अब तुम्हें सुनाता हूँ। यदु और अवधूत इन दोनों का संवाद साधकों के लिये ज्ञानसाधन रूप हैं।
अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम्।
अवधूतस्य संवादं यदोरमिततेजसः ॥ २४॥
श्रीकृष्ण ने प्रसन्नतापूर्वक कहा, उद्धव ! हमारा पूर्वज जो यदु था उसने अवधूत के साथ ब्रह्मज्ञान के सम्बन्ध
में सुन्दर संवाद किया था। वह यदुराजा मानों क्षत्रियों में सूर्य था, अन्य नृपति रूप चन्द्र के प्रकाश को वह अपने
तेज से देदीप्यमान करता था। उसने अवधूत से गुरु के लक्षण श्रवण किये थे इसलिये उसे लगे हाथ सायुज्यता
मुक्ति प्राप्त हो गयी थी। वही प्राचीन कथा अब तुम्हें सुनाता हूँ।
अवधूतं द्विजं कञ्चिच्चरन्तमकुतोभयम्।
कविं निरीक्ष्य तरुणं यदुः पप्रच्छ धर्मवित् ॥ २५ ॥
आत्मतेज से प्रकाशित तथा ब्रह्मानन्द से डोलने वाले किसी एक अवधूत को यदु ने आते हुए देखा। यदु ने
उस अवधूत के स्वरूप का सूक्ष्मता से निरीक्षण किया। उसने यज्ञोपवीत धारण किया था इसलिये वह ब्राह्मण
होगा तथा ब्रह्मवेता होगा ऐसा उसको विश्वास हो गया। यदु क्रीड़ा करने के लिये वन में गया था तभी यह
अवधूत निर्भय और निःशंक होकर विचरण करता हुआ सामने से आता दिखायी दिया। भीतर के प्राण को वह
बाहर नहीं निकलने दे रहा था, ऐसी प्राणाप्राण की समता, धारणा किये बिना ही उसे प्राप्त हो गयी थी। उसका
देखना भी विचित्र प्रकार का था। दृश्यरूप से देखना वह नहीं जानता था। वह सर्वांग सुन्दर हो गया था और
द्रष्टा के रूप में ही वह दृश्य देखता था। मैं जंगल में भटकने वाला एक व्यक्ति हूँ इसकी उसे जानकारी ही नहीं
१७४ श्रीमद् एकनाथी भागवत
थी। समदृष्टि के योग से उसे सर्वत्र व्यापकता ही प्राप्त हो गयी थी। कर्म, कार्य और कर्ता यह सब वह स्वयं ही
बन गया था। जीव ने शपथ लेकर क्रिया को अर्पण कर दिया था। देह पर जो अहंकार था वह देह के मिथ्या होते
ही भाग गया था। नित्यानित्य विवेकरूपी होम से जो ब्रह्माग्नि उत्पन्न हुआ उससे चारों आश्रमों के घर जल गये
और वह निराश्रमी हो गया। उस आश्रम में शास्त्रश्रवण विधि की पोथी थी, वह भी जलकर राख हो गयी। वह
राख भी हाथ नहीं लगी। विधिनिषेध की शर्त तथा पंचायतन देवपूजा राख में मिल गयी। संचित-क्रियमाण कर्म
की,जो पूँजी थी वह भी जलकर खाक हो गयी। इस प्रकार ब्रह्मानन्द से डोलने वाले तथा निजसुख से झूलने
वाले उस अवधूत को यदु ने आते देखा। उसने सर्वसंकल्प विकल्परहित होने की विभूति शरीर में लगायी थी
इसलिए उसे अवधूत कहना पड़ेगा अन्यथा वह ब्राह्मण ही था। सामने दीखने वाला सारा प्रपंच उसने आत्मबोध
से धो डाला था इसीलिये उसे 'अवधूत' कहते हैं, वैसे वह प्रसिद्ध ब्राह्मण था। जो 'अहं' को धो देता है वही
अवधूत है, वही योगी है और वही पुनीत है। जो अहंकारग्रस्त होता है वही जन्मकर्म में पतित होता है ऐसा
समझना चाहिये। उस अवधूत के देह को वार्धक्य नहीं आता क्योंकि जब देह में देहत्व ही नहीं रहता तो वार्धक्य
कहाँ से आयेगा? और यही चिरयुवा होने का मूल कारण है। उसके और भी लक्षण हैं। उसका चिरनूतन रहने
वाला ज्ञान मैला नहीं होता, वह नित्य नये रूप में ही उसका भोग करता रहता है। इसलिये वह यौवन से भरा पूरा
था। आत्मज्ञान के तेज से उसने द्वैत को जीत लिया था इसलिये वह इस प्रकार निःशंकर होकर घूम रहा था। उसे
किसी भी बात का भय नहीं लग रहा था। इस प्रकार अवधूत के लक्षणों का निश्चय हुआ और वह आत्मज्ञान से
परिपूर्ण है ऐसा लगा। यदु के मन में उसके प्रति पूज्यबुद्धि उत्पन्न हुई, उसके प्रति अनन्य श्रद्धा और नम्रता हो
आयी। राजा का चित्त प्रसन्न हुआ और उसने उसे साष्टांग दण्डवत कर, भक्तिपूर्वक हाथ जोड़कर प्रश्न किया।
यदुरुवाच
कुतो बुद्धिरियं ब्रह्मन्नकर्तुः सुविशारदा।
यामासाद्य भवांल्लोकं विद्वांश्चरति बालवत् ॥ २६॥
यदु ने कहा, स्वामी! धर्म-कर्म का आचरण कर अथवा यमनियम साधकर भी जो बुद्धि प्राप्त नहीं हो
सकती वह अपूर्व बुद्धि मुझे आपमें दिखायी दे रही है। आप सारे कर्मों में तो कुशल दिखायी देते हैं किन्तु बिना
कुछ किये निश्चल रहते हैं। आत्मबोध के कारण आप में अकर्तृत्वबोध आ गया है और इसीलिये अहेतुक
बालक की तरह आपकी स्थिति दिखायी देती है। आप बालकों की तरह व्यवहार करते हैं किन्तु आप में
बालबुद्धि नहीं है। आप सर्वथा सर्वज्ञ हैं ऐसा मुझे लगता है। इस मृत्युलोक में आकर नरदेह प्राप्त कर उसकी
जैसी सार्थकता आपने की है वह अन्यत्र नहीं दिखायी देती।
प्रायो धर्मार्थकामेषु विवित्सायां च मानवाः।
हेतुनैव समीहन्ते आयुषो यशसः श्रियः॥ २७॥
इस लोक के लोग प्रायः धर्मार्थकाम की ही इच्छा करने वाले हैं इसलिये उन विषयों का ज्ञान वे अवश्य
प्राप्त कर लेते हैं। वे कहते हैं, हम स्वधर्म का पालन करते हैं, स्नान संध्या में कीर्ति प्राप्त करते हैं और धन
प्राप्ति के लिये गायत्री के फल दे डालते हैं। वे कहते हैं, हम वेदों के अनुसार यज्ञ करते हैं, वेदमार्ग की स्थापना
करते हैं और अन्त में स्वर्ग की इच्छा कर उसे उदरनिर्वाह का साधन बना देते हैं। कुछ लोग स्वयं को
स्वकर्मनिष्ठ बताते हैं और दर्भ, मृत्तिका आदि नष्ट करते हैं लेकिन यदि कोई याचक आ जाय तो उसे मुट्ठीभर
सातवाँ अध्याय १७५
अनाज भी नहीं देते। ढोंगी लोग अपना नाम बढ़ाने के लिये वैष्णवदीक्षा लेते हैं और चकाचक देवताओं की पूजा
कर दोनों हाथ से शंख बजाते हैं। आयुष्य दान करने वाले पुण्यपुरुष स्वयं को वैद्य और अहिंसक कहते हैं किन्तु
स्थावर जंगम आदि समस्त जीवों की हत्या कर सफलता की पताका फहराते हैं। अपनी कीर्ति बढ़ाने के लिये
कुछ लोग तुलाभार कराते हैं। वे लोग मलमूत्र से भरे देह को द्रव्य से तौलते हैं। लेकिन परमार्थ के नाम पर कोई
एक कौड़ी भी नहीं खर्च करता। देखिये, मूर्ख लोग कैसे भुलावे में आ जाते हैं। वे सच्चे स्वार्थ को भूल जाते हैं।
पूर्व कर्म से जिन्हें लक्ष्मी प्राप्त नहीं है, वे लोग लक्ष्मी की उपासना करते हैं, लेकिन लक्ष्मी के पति श्रीहरि का
भजन नहीं करते। विश्व का गुरु जो श्रीहरि है उसकी पत्नी है। उसकी अभिलाषा कर वे उसे अपने पास रखते
हैं, हरि को अर्पण नहीं करते। हरि उन्हें नरक में भेजता है। रोग का विनाश हो और आरोग्य प्राप्त हो इसलिये
सूर्य की उपासना करते हैं लेकिन उन्हें इस बात का स्मरण नहीं रहता कि देह नश्वर है। इससे आत्मस्वरूप का
विस्मरण होता है। इस प्रकार हम आयुष्य, यश और द्रव्य के लिये लोगों को भजन में लिप्त देखते हैं लेकिन
स्वामी ! आश्चर्य की बात है कि आप परब्रह्मस्वरूप में लीन दिखायी देते हैं। विषय का जोर विचित्र रहता है।
इससे लोग मिथ्या भ्रम में पड़े हुए हैं। वे ज्ञान के साधन साध्य कर विषय की कामना करते हैं। वेदान्त-वार्तिक
की वाक्पटुता से अद्वैत ब्रह्म का प्रतिपादन करते हैं किन्तु पेट के लिये वे ज्ञान का विक्रय करते हैं। इस आश्चर्य
का वर्णन कौन करेगा? कोई योगाभ्यास कर श्वांस को रोक कर रखते हैं और आँखें मूंदकर ध्यान करते हैं
लेकिन मन में विषय का ही चिन्तन करते रहते हैं। इस प्रकार ज्ञानेच्छु लोग अनेक प्रकार के साधन अपना कर
मूर्ख बनते हैं। लेकिन आपने आत्मसुख प्राप्त कर अलौकिक कार्य किया। इस प्रकार हे अवधूत स्वामी ! तुमने
जीवित को तृण समान किया, समस्त लोक को तुच्छ मानकर निजात्म हित में लीन हो। आप आत्मानन्द में तृप्त
होकर हृदय में शान्त हो गये हैं ऐसा हम देख रहे हैं। उनके लक्षण सुनिये।
त्वं तु कल्पः कविर्दक्षः सुभगोऽमृतभाषणः।
न कर्ता नेहसे किंचिज्जडोन्मत्तपिशाचवत् ॥ २८ ॥
आप सर्वज्ञ हैं लेकिन वह ज्ञानतत्त्व आप प्रकट नहीं होने देते। आप कुछ करते भी नहीं हैं और किसी
वस्तु की इच्छा ही करते हैं। आपकी आत्मशान्ति से जड़त्व प्रकट होता है, आप सर्वथा मौन रहते हैं, आपमें
किसी भी प्रकार की विकलता नहीं दिखायी देती। शरीर से अव्यंग होने के कारण आप स्वरूप से सुन्दर दिखायी
देते हैं। ज्ञान तो अकेला ही था, उसके साथ दूसरा कोई न होने के कारण वह परदेसी हो गया था। वह आप में
लीन हो गया इसलिये आपको 'कवि' यह नाम प्राप्त हुआ। कर्म करते हुए भी आप 'अकर्ता' हैं, यह आपकी
दक्षता है। आप ब्रह्मरस से परिपूर्ण 'रसाल' भाषण करते हैं वह माधुर्य अमृत में कहाँ से आयेगा ? ब्रह्मरस प्राशन
कर आप ब्रह्मानन्द में मस्त हो गये हैं इसलिये आप 'उन्मत्त' अवस्था में किसी को देखते भी नहीं। सदासर्वदा
आत्मस्वरूप में लीन होने के कारण आप 'मेरा' और 'तेरा' जैसी बात नहीं करते। आपका यह पागलपन सारे
संसार को अवश्य दिखायी देता है। आप आत्मज्ञान से तृप्त तथा परमानन्द से शान्त हो गये हैं यह लक्षण भी
साफ दिखायी दे रहा है।
जनेषु दह्यमानेषु कामलोभदवाग्निना।
न तप्यसेऽग्निनामुक्तो गङ्गाम्भस्थ इव द्विपः ॥ २९ ॥
कामलोभरूपी दावाग्नि में जलने वाले लोक हमें दिखायी दे रहे हैं, उससे कोई नहीं बच पाया है। लेकिन
१७६ श्रीमद् एकनाथी भागवत
हे अवधूत! आप उस दावाग्नि में रहते हुए भी उससे झुलसते नहीं हैं। आपकी यह अविचलित अवस्था सचमुच
ही आश्चर्यजनक है। वह हमारी समझ में कभी नहीं आयेगी। नदी के दोनों किनारों पर आग लगने पर जिस
प्रकार हाथी पानी में डुबकी लगा लेता है और फिर उस पर आग की लपटों का प्रभाव नहीं होता, उसी प्रकार
आप भी दुःख से मुक्त हैं ऐसा लगता है। शीत और ऊष्मा आपको स्पर्श नहीं करते, आप ब्रह्मस्वरूप में निश्चल
हैं इसलिये हे दयाधन! हे कृपामूर्ति! आप से थोड़ी विनती करता हूँ।
त्वं हि न पृच्छतां ब्रह्मन्नात्मन्यान्दकारणम्।
ब्रूहि स्पर्शविहीनस्य भवतः केवलात्मनः॥ ३०॥
आप ब्रह्मवेत्ता ब्राह्मण हैं तथा आत्मानंद से परिपूर्ण हैं। उस आनन्द का कारण क्या है, कृपया स्पष्ट करके
बतायें। देह में होते हुए भी आप विदेहस्थिति में रहते हैं, आपको विषय स्पर्श भी नहीं कर सकता। इतनी
अलिप्तता आपने किस प्रकार प्राप्त की? आपको राजा का भय नहीं है, धनवानों की चिन्ता नहीं है, दीन का
भाषण आपको प्रिय लगता है और उसका मनोरथ आत्मज्ञान देकर पूरा करते हैं। इस प्रकार आप बिलकुल
कृपालु हैं, आप दुखियों के बन्धु तथा दीनों के लिये दयालु हैं। उसी प्रकार निजात्मभाव से आप भक्तों के
भक्तवत्सल हैं। इस प्रकार श्रीकृष्ण यदु का भाषण बड़े चाव से सुनाने लगा। उसने उद्धव से कहा "इस बोध को
सावधानी से चित्त में धारण करो।"
श्रीभगवानुवाच
यदुर्नैवं महाभागो ब्रह्मण्येन सुमेधसा।
पृष्टः सभाजितः प्राह प्रश्रयावनतं द्विजः॥ ३१॥
वह श्रीपति अपने मुख से यदु के भाग्य का वर्णन करने लगा। यदुराजा ब्राह्मणों का अत्यन्त भक्त होते हुए
सत्त्वशील था। उसी प्रकार वह अत्यन्त बुद्धिमान और श्रद्धालु था। भगवत् कृपा से उस भाग्यवान अवधूत की
यदु से भेंट हुई। तब यदु ने अत्यन्त विनम्र होकर अपने लाभ के लिये उससे विनती की। मधुपर्क विधि से
उसकी पूजा कर मृदु मधुर वाणी से उसने प्रार्थना की। इससे अवधूत सन्तुष्ट होकर प्रेम से बोलने लगे।
ब्राह्मण उवाच
सन्ति मे गुरवो राजन् बहवो बुद्धयुपाश्रिताः।
यतो बुद्धिमुपादाय मुक्तोऽटामीह तान्छृणु ॥ ३२॥
क्षीरसागर में उफान आता है या मेघ गर्जना करते हैं या आत्मसुख की तुरही बज उठे, उसी प्रकार वह
ब्राह्मण बोलने लगा। हे राजचूडामणि सुनो। तुम यदुकुल दीप के साक्षात सूर्य ही हो। तुम्हारी वाणी धन्य है। तुमने
अपने गुणों से मुझे संतुष्ट किया। राजा होते हुए भी सात्त्विक, सिद्ध लक्षणों से युक्त ऐसे इस पृथ्वी पर तुम एक ही
हो। तुमने जो प्रश्न किया, वह सुन्दर, गुणयुक्त और उत्तम से उत्तम है। तुम स्वानंद का कारण पूछते हो, वह मैं
तुम्हें यथार्थ रूप में बताता हूँ, सुनो। हे राजा! गुरु के बिना आत्मप्राप्ति कभी सिद्ध नहीं होती। उन गुरुओं के बारे
में भी मैं तुम्हें यथार्थ रूप में बताता हूँ। आत्मबुद्धि के विचारों में जब मैं तल्लीन था उस समय मैंने अनेक गुरु
किये। जिस किसी भी प्राणी में मुझे कोई सद्गुण दिखायी दिया, उस गुण के लिये मैंने उस गुरु को स्वीकार
किया। बुद्धि से उस गुण को स्वीकार किया और धैर्यपूर्वक उसे धारण किया। इसलिये मैं मुक्त हो गया और इस
सातवाँ अध्याय १७७
प्रकार स्वेच्छा से विचरण करता रहता हूँ। संसार सागर पार करने के लिये मुख्य रूप से 'सद्बुद्धि' चाहिये। यहाँ
अन्य किसी उपाय की परम्परा नहीं है फिर व्यर्थ ही कष्ट सहने की क्या आवश्यकता है ? जिसके पास सद्बुद्धि
नहीं होती वह क्रीतदास की तरह होता है। दिन-रात हजारों कष्ट भोगते-भोगते उसे क्षण भर का भी विराम नहीं
मिलता। जिसके हृदयमन्दिर में सद्बुद्धि नहीं होती उसके मन में कभी वैराग्य नहीं उत्पन्न होता। फिर संसार सागर
कैसे पार होगा ? विवेक तो उसे स्वप्न में भी नहीं दिखायी देता। वैराग्य के साथ यदि सद्बुद्धि भी मिली हो तो
उसके सामने बेचारा संसार क्या करेगा ? वह तो एक घाव में उसके दो टुकड़े कर देगा। यदि संसार नाम की कोई
चीज हो तो उसके विनाश के लिये प्रयास करना आवश्यक है लेकिन जो मनुष्य विवेक का आश्रय लेता है उसका
तो संसार ही नष्ट हो जाता है। संसार के नाश का कारण उसकी 'प्रज्ञा' है। वह यदि कायम रहे तो संसार
'मृगजल' की तरह हो जाता है। मैं जिन गुरुओं का वर्णन कर रहा हूँ, वह मैं अपनी निजबुद्धि से बतानेवाला हूँ,
उसमें से जो ग्राह्य हो उसे स्वीकार करें, जो त्याज्य हो उसका त्याग करें। वही मैं देशी भाषा में बताने वाला हूँ,
उसे ध्यानपूर्वक सुनो। उसके कारण शिष्य की ग्रहणशक्ति स्पष्ट रूप से दिखायी देगी। अब उदाहरण के रूप में
उस बुद्धि के लक्षण बताता हूँ। सूप, चलनीं तथा चूल्हा की तरह बुद्धि का उपयोग करना चाहिये। चलनी में जो
भी गिरता है, उसका सूक्ष्म तत्त्व नीचे गिर पड़ता है और गुण दोषों के कंकड़ चलनी में ही रह जाते हैं और
खड़खड़ाहट करते रहते हैं। ऐसी स्थिति में त्याग करना चाहिये। वैसा न करने से गुणदोषों के कंकड़ उसके पेट में
ही रह जाते हैं और स्वार्थ की निश्चित रूप से हानि होती है। लेकिन सूप की स्थिति निराली रहती है। भूसा तथा
कचरा वह फेंक देता है और केवल बीज अपने पेट में रहने देता है। स्वयं वैराग्य से तप्त होना तथा अपने गुणों से
अपरिपक्व को परिपक्व बनाना चूल्हे का स्वभाव है। हे वीर श्रेष्ठ! इस प्रकार इन तीनों स्थितियों को निश्चित रूप
से धारण करना चाहिये ताकि दर्पण के समान परमार्थ भी प्राप्त हो सके। यदु से उस ब्राह्मण ने कहा कि जो लक्षण
मैंने बताये हैं उन्हें ध्यान देकर सुनो। जिससे जो गुण मैंने लिया, उसे मैंने गुरु बनाया इसलिये मेरे गुण अगणित हो
गये—इतने कि सारा जगत ही मुझे गुरुओं से भरा दिखाई पड़ रहा है। जिससे मैंने ग्रहण किया वह सहज ही मेरा
गुरु हो गया लेकिन उसके दोषों का मैंने त्याग किया वह भी मेरा गुरु हो गया। इस प्रकार गुण ग्रहण और दोष
त्याग इन दोनों के समान भाव से दोनों ही मेरे गुरु हो गये। राजा! अब तुम भी विचार करके देखो तो तुम्हें भी
सारा जग गुरुमय ही दिखायी देगा। इस प्रकार शान्त होकर देखने से सारा जगत ही गुरु मालूम होने लगा। यह
साधन जिसके पास रहता है, वही परमार्थ को साधता है। तुम्हें यह कठिन मालूम होगा। इसलिये मैंने जिन श्रेष्ठ
गुरुओं को स्वीकार किया उनमें से जो प्रमुख हैं उनके बारे में बताता हूँ।
पृथिवीवाय्वाकाशमापोऽग्निश्चन्द्रमा रविः।
कपोतोऽजगरः सिन्धुः पतङ्गो मधुकृद् गजः ॥ ३३ ॥
मधुहा हरिणो मीनः पिङ्गला कुररोऽर्भकः ।
कुमारी शरकृत्सर्प ऊर्णनाभिः सुपेशकृत् ॥ ३४ ॥
अपने सभी गुरुओं के बारे में बताता हूँ। उनकी संख्या चौबीस है। उनके नाम मैं धीरे-धीरे सुनाता
हूँ। (१) पृथ्वी, (२) वायु, (३) आकाश, (४) अग्नि, (५) जल, (६) चन्द्रमा और (७) सूर्य,
(८) कपोत। (९) अजगर, (१०) समुद्र, (११) पतंग, (१२) मधुमक्खी, (१३) हाथी, (१४) भौंरा, (१५)
हिरन, (१६) मछली, (१७) पिंगला नामक वेश्या, (१८) टिटिहरी, (१९) बालक, (२०) कुमति,
१७८ श्रीमद् एकनाथी भागवत
(२१) हथौड़ा चलाने वाला लोहार, (२२) साँप, (२३) केंचुली, (२४) रानी मक्खी इस प्रकार कुल मिलाकर
चौबीस गुरु हैं। पच्चीसवाँ तत्त्व जो परब्रह्म है, उसे प्राप्त करने के लिये इन चौबीस गुरुओं की उपासना करनी
चाहिये। सुविचार तथा आत्मबुद्धि से इन गुरुओं का भजन करना चाहिये। हृदय में आत्मज्ञान ठीक से प्रविष्ट हो
जाय इसलिये मैंने आत्मविचार से ही रात दिन अनेकों को गुरु बना लिया। किस युक्ति से, किस विचार से, किस
गुण के लिये कौन-सा गुरु बनाया ? वह भी सविस्तार बता रहा हूँ, सुनो।
एते मे गुरवो राजंश्चतुर्विंशतिराश्रिताः ।
शिक्षा वृत्तिभिरेतेषामन्वशिक्षमिहात्मनः ॥ ३५ ॥
हे निर्मल विवेकचक्रवर्ती राजराजेश्वर ! गुरुओं की जो संख्या थी वह मैंने तुम्हें बतायी। उनके पास जो लेने
लायक गुण थे उन्हें मैंने अपनी युक्ति से सीखा और फिर विकल्प का भ्रम त्याग कर आत्मस्थिति तक पहुँचा।
यतो यदनुशिक्षामि यथा वा नहुषात्मज ।
तं तथा पुरुषव्याघ्र निबोध कथयामि ते ॥ ३६ ॥
नहुष का पुत्र ययाति, ययाति का पुत्र यदु, इस वंश परम्परा के अनुसार यदु को नहुषनंदन कहते हैं।
इसलिए अवधूत ने कहा, हे नहुष पुत्र ! अब गुरु के लक्षण बताता हूँ, तो हे चतुर ! उन्हें तुम श्रवण करो। जिस
गुरु के पास जो गुण था उसे मैंने सीखा। किस प्रकार सीखा यह तुम्हें बताता हूँ, ध्यान देकर सुनो। यदु सारे शरीर
को मानों कान बनाकर सुनने लगा। शब्दों को पीछे छोड़ वह उसमें अर्थ की ओर ध्यान देने लगा। सारे विकल्पों
का त्याग कर विनम्र हुआ वह राजा जो भी विषय सुनता था उसके अनुसार तद्रूप हो जाता था।
भूतैराक्रम्यमाणोऽपि धीरो दैववशानुगैः ।
तद्विद्वान्न चलेन्मार्गादन्वशिक्षं क्षितेर्व्रतम् ॥ ३७ ॥
परमार्थ में शान्ति प्रमुख है। साधक में वह अवश्य होनी चाहिये इसलिये उस शान्ति के लिये मैंने सबसे
पहले पृथ्वी को गुरु बनाया। पृथ्वी तीन प्रकार से गुरु है। पर्वत, वृक्ष और भूमि। इन तीनों के गुण देह में धारण
करने के कारण पृथ्वी में गुरु के गुण आ गये हैं। अन्तर्निग्रह करने का अर्थ 'शान्ति' और बाह्येन्द्रिय निग्रह का
अर्थ 'दांति' होता है और इन्द्रसहिष्णुता का अर्थ 'क्षांति' है इसलिये क्षोति यह गुण प्राप्त करने के लिये पृथ्वी को
गुरु बनाया। अनेक प्रकार के प्राणी 'यह पृथ्वी मेरी है' यह कहकर उससे चिपकते हैं और अपनी-अपनी प्रवृत्ति
तथा व्यवहार के अनुसार उसके अनेक प्रकार से टुकड़े करते रहते हैं। लेकिन उन जीवों के अलग-अलग प्रकार
के व्यवहार पृथ्वी स्वयं ही संचालित करती रहती है और अपनी एकात्मता साधते हुए वह सदा अखण्ड ही रहती
है। ऐसा ही लक्षण योगियों का भी लक्षण रहता है, वह भले ही भिन्न-भिन्न कर्म करता हो लेकिन उसकी प्रवृत्ति
सदा एक-सी रहती है। यह देह प्रारब्धयोग से चलता है और जीव भी प्रारब्धयोग से ही आचरण करते हैं। इसे
ध्यान में रखकर, प्रत्येक जीव में मेरी ही आत्मा है, इस भावना से जो रहते हैं उन साधकों को दूजे की बाधा नहीं
होती। जीव पृथ्वी की पूजा करे अथवा उस पर मलमूत्र विसर्जन करे लेकिन इससे उसे न हर्ष होता है और न
विषाद ही होता है। अपनी शान्ति के कारण वह बिलकुल निश्चल रहती है। समस्त प्राणी पृथ्वी से उत्पन्न हुए हैं।
उन्होंने अपने अच्छे-बुरे कर्म से पृथ्वी की पूजा न की हो या उसे कष्ट भी न दिया हो लेकिन वह ऐक्य भाव से,
द्वंद्व भाव भूलकर आत्मरूप से निश्चल ही रहती है। उसी प्रकार योगी भी प्राणियों के भिन्न-भिन्न स्वभाव के
कारण भयभीत नहीं होते। समस्त प्राणियों के प्रति उनकी निजात्मभावना होने के कारण, विषय के प्रति भी उनमें
सातवाँ अध्याय १७९
समभाव होता है। हे राजा ! अब तुम्हें पृथ्वी की अद्भुत शान्ति के बारे में बताता हूँ, सुनो। वही शान्ति साधु-सन्तों
ने धारण करने के कारण वे भगवद्भक्ति के लिए पात्र हुए। पृथ्वी पर अग्नि प्रज्ज्वलित कर उसे जलायें अथवा
उस पर हल चलायें, या लातों से उसे मारे, लेकिन पृथ्वी उस अपराध का विचार न कर उलटे उन पर प्रसन्न ही
होती है और वही अनेक प्रकार की फसलें उगाकर प्राणिमात्र को तृप्त कर देती है। इस प्रकार की निजात्म-शान्ति
के लिये मैंने पृथ्वी को गुरु बनाया। हे भाग्यशाली राजा। इस शान्ति की अभिनव स्थिति के बारे में सुन लो। सुनो!
किसी ने दूसरे का अपराध किया और दूसरे ने उसे चुपचाप सहन कर लिया, अर्थात् उसकी उपेक्षा की, लेकिन
इतने से ही उसे शान्त कैसे कह सकते हैं ? ईंख को तोड़ने से वह मीठा लगता है, जिस शस्त्र से उसे तोड़ते हैं उसे
भी मीठा बना देता है और उसे पेरने से या पकाने से भी वह उपकार करने वालों को उत्कृष्ट स्वाद ही देता है।
इस प्रकार दूसरे का अपराध सहन कर उसका हित करना यही निर्द्वन्द्व शान्ति है। दूसरे का अपराध सहन कर उस
पर उपकार करना यह गुण मैंने पृथ्वी पर स्थित परोपकारी पर्वत से सीखा।
शश्वत्परार्थसर्वेहः परार्थैकांतसम्भवः।
साधुः शिक्षेत भूभृत्तो नगशिष्यः परात्मताम् ॥ ३८ ॥
पृथ्वी पर उत्पन्न पर्वतों को भी मैंने गुरु बनाया और उनसे मैंने जो सीखा वह भी सुनो। रत्न आदि मूल्यवान
वस्तु जिन्हें पर्वत अपने में संग्रह करके रखता है वह केवल परोपकार के ही लिये रहता है। घास, पानी आदि
अन्य पदार्थ भी वह केवल परोपकार के ही लिये रखता है। वह न किसी को बुलाता है न किसी को आने से
मना करता है और न किसी से ऊब कर उसे बाहर जाने के लिये कहता है। याचक की जो भी इच्छा रहती है
उसे वह परोपकार बुद्धि से पूरी करता है। ग्रीष्मऋतु समाप्त होते ही उस पर की घास तथा अनाज समाप्त हो
जाता है लेकिन पर्वत किसी को देने से पीछे नहीं हटता इसलिये ईश्वर भी तत्काल मेघवृष्टि कर उसे समृद्ध कर
देता है। दाता जिस उल्लास से देने लगता है, उसी उत्साह से जगन्नाथ उसकी आपूर्ति करता रहता है। मन में यदि
कोई विकल्प न रखें तो अच्युत भगवान अखण्ड देने वाला है। लेकिन शंकालु लोगों की समझ में यह बात नहीं
आती कि सच्चा दाता ईश्वर ही है। इसीलिये उन्हें दारिद्र्य भोगना पड़ता है। इस प्रकार पर्वत की उत्पत्ति केवल
परोपकार के लिये है। परोपकार के अतिरिक्त कोई अन्य कल्पना ही उसके मन में नहीं आती। साधक में सचमुच
पर्वत की जैसी उदारता चाहिये। काया, वाचा तथा मन से सर्वस्व देते समय भी प्रसन्नता होनी चाहिये। हमेशा
कोई भी कार्य करते समय सब पर उपकार करते रहना चाहिये। करोड़ों प्रकार के लाभों पर लात मार कर भी
परोपकार के लिए हमेशा तत्पर रहना चाहिये। परमार्थ की सच्ची इच्छा रखने वाला साधक सामने दिखाई देने
वाला स्वार्थ छोड़ कर परोपकार के लिये कठिन से कठिन संकट में भी कूद पड़ता है। मूर्त्तिमंत उपकार जन्म ले
ले अथवा साक्षात परोपकार ही साकार हो जाय इस प्रकार यह उपकारी बनकर रहता है। देखो ! जिस प्रकार ईंख
अपने माधुर्य से सब पर उपकार करता है उसी प्रकार योगी भी संसार में रहकर अपने समधुर व्यवहार से
परोपकार करता रहता है। जिस प्रकार पर्वत में से पानी के सोते निकलते रहते हैं उसी प्रकार उसमें से परोपकार
के सोते निरन्तर बहते रहते हैं। वे सूखने का नाम ही नहीं लेते। उसने जगत को इतना उपकारबद्ध किया रहता
है। कंजूसी की संगत छोड़ कर पर्वत एकान्त में उपकार करता रहता है अथवा धैर्यवृत्ति का निश्चय कर वह
उपकार की साक्षात मूर्ति ही बन जाता है। अब वृक्ष से क्या सीखने लायक है यह बताता हूँ। सर्वांग से, सर्वोपरी,
सर्वकाल एवं सर्वत्र सबकी पराधीनता में ही रहना चाहिये यह मैंने वृक्ष से सीखा। जिसने वृक्ष को लगाया है,
उसके ही अधीन वह रहता हो यह बात नहीं है बल्कि जो उसे काटने के लिये तैयार होता है उसके भी वह
१८० श्रीमद् एकनाथी भागवत
अधीन रहता है। उसी प्रकार योगी को पालकी में बिठाया जाय तो वह उसके अधीन होता है अथवा कोई यदि
सूली पर चढ़ाने के लिये ले जाय तो वह उसकी भी आज्ञा में चलता रहता है। देह का अहंकार छोड़ देने के
कारण योगी को पराधीनता प्राप्त हुई रहती है। विश्व सभी दृष्टियों से मेरी आत्मा ही है वह समझ कर वह
सबके कहने के अनुसार चलता है। जो कुछ है वह सब मैं ही हूँ यह सोच कर वह साधक-बाधक का विचार न
कर, उसकी आज्ञा में संतोषपूर्वक रहता है। सुख या दुःख जो भी प्राप्त होगा वह भाग्य के अधीन रहता है, सब
लोग मेरी ही आत्मा है यह मान कर वह पराधीन होकर आचरण करता रहता है। सबमें मेरी आत्मा है यह जान
लेने पर उसे सहज ही पराधीनता प्राप्त होती है। यह 'परात्मता' मैंने वृक्ष से सीखी। वृक्ष से मैंने एक और गुण
सीखा है। वह गुण है अतिथि की पूजा करना। वृक्ष के पास यदि कोई अतिथि आता है तो वह उसे खाली हाथ
नहीं लौटाता। पान, फूल, फल, जड़, छाया, छाल, लकड़ी, कुछ न कुछ वह उसे देता ही है। जो वृक्ष का पालन
करता है या जो उसे काटता है, उन दोनों को ही वह समान रूप से पुष्पों से और फलों से सन्तुष्ट करता है। जिस
प्रकार वृक्ष अपना पूरा शरीर अतिथि पर खर्च कर सार्थकता प्राप्त करता है, उसी प्रकार साधु भी अपना चित्त,
वित्त, देह और शब्द सब कुछ अतिथि को अर्पण कर उसे सन्तुष्ट करता है। अतिथि को निराश न करना यही
साधु का अलौकिक गुण होता है। वह उसे अन्न, द्रव्य, जल आदि बड़े आनन्द से देता रहता है। याचक द्वार पर
आता है तो भले ही उसे अपना सर्वस्व देना पड़े लेकिन उसे खाली हाथ नहीं जाने देना है, यह विचार मैंने
आत्मबुद्धि से वृक्ष के पास सीखा। इस प्रकार पृथ्वी मेरी गुरु बनी। अब दूसरा गुरु वायु बना, उससे जो-जो
सीखने की इच्छा हुई वह भी सुनो, राजा ! वायु को गुरु पद प्राप्त हुआ वह दो प्रकार से। एक तो प्राणवायु के
द्वारा और दूसरा बाह्य वायु के द्वारा।
प्राणवृत्त्यैव संतुष्येन्मुनिर्नैवेन्द्रियप्रियैः ।
ज्ञानं यथा न नश्येत नावकीर्येत वाङ्मनः ॥ ३९ ॥
जो प्राण की ही तरह विषय की आसक्ति नहीं रखता या विषय सेवन करने के बाद भी जिसे अहंकार, नहीं
उत्पन्न होता, उसी प्रकार उसे अहंकार नहीं होता। प्राणों की हलचल से क्षुधा उत्पन्न होती है, उसके कारण प्राण
क्षुब्ध होता है, उससे काया, वाचा, मन और इन्द्रिय भी विगलित होते हैं। उस प्राण की रक्षामात्र के लिये कैसा भी
आहार क्यों न मिले, वह मधुर है या नहीं इसका भी प्राण विचार नहीं करता। उसी प्रकार योगी देह का अभिमान
नहीं करता, वह विषय सेवन करता है लेकिन उसमें उसे आसक्ति नहीं होती। भूख लगने पर पकवान मिले या
भूसा मिले, इसकी वह चिन्ता नहीं करता। ज्ञानधारणा कहीं ढल न जाये, इन्द्रियाँ विकल न हों इसलिये वह बहुत
सम्भल कर तथा धैर्यपूर्वक आहार करता है। प्राण के ही कारण इन्द्रियाँ सशक्त रहती हैं, प्राण के ही योग से देह
चलता है, लेकिन प्राणकर्म में देह लिप्त नहीं होता। वह अलिप्त होकर ही चलता रहता है। उस प्राण की ही तरह
योगी की स्थिति रहती है। सब कुछ करने पर भी उसकी किसी में आसक्ति नहीं रहती। इसलिये उसे देहस्थिति
का स्पर्श नहीं होता। ब्रह्मादिकों का देह सुन्दर है इसलिये उसका पालन किया जाय और सुअर आदि के देह से
परहेज किया जाय ऐसी अस्पृश्यता प्राण दयालु तथा समदृष्टि होने के कारण नहीं करता। उसी प्रकार योगी का
मन, यह कर्म उच्च है और यह कर्म नीच है ऐसी भावना नहीं रखता। राजा के शरीर का प्रेम से संपादन किया जाय
और भिखारी का देह छोड़ दिया जाय ऐसी कुंठा प्राण कभी नहीं करता। उसका समभाव सदा शुद्ध ही रहता है।
प्राण, अपान, समान, उदान अथवा अणु-रेणु में बसे व्यान इतने नाम और उसके इतने स्थान होते हुए भी प्राण
अपना एकत्व नहीं छोड़ता। उसी प्रकार ऊँच-नीच वर्णावर्ण देख अथवा उत्तम अधम आदि गुणावगुण देखकर
सातवाँ अध्याय १८१
योगी अपना सर्वत्र समभाव कभी नहीं छोड़ते। प्राण यथार्थ में देह के भीतर रहते हुए भी बाह्य वायु से भेदभाव
नहीं करता। इसी प्रकार योगी में भी अंतर्बाह्य एक ही भावना होती है।
विषयेष्वाविशन् योगी नानाधर्मेषु सर्वतः।
गुणदोषव्यपेतात्मा न विषज्जेत वायुवत्॥ ४० ॥
पार्थिवेष्विह देहेषु प्रविष्टस्तद्गुणाश्रयः।
गुणैर्न युज्यते योगी गन्धैर्वायुरिवात्मदृक् ॥ ४१ ॥
चतुर पुरुष को इस वायु की तरह दोहरी एकता साधनी चाहिये। अंतर्बाह्य सदा एक से एकभाव से व्यवहार
करना चाहिये। अब तक तुम्हें प्राणवृत्ति के सारे लक्षण बताये। अब बाह्य वायु के लक्षण भी ध्यान देकर सुनो।
वायु सबको स्पर्श करके जाता है, लेकिन कहीं भी फँस कर नहीं रहता। उसी प्रकार योगी भी विषय सेवन करते
हुए किसी में आसक्त नहीं होता। वह इन्द्रियों की संगति में रहकर भले ही विषय में खेलता रहता हो लेकिन
गुणदोषों की आसक्ति से उसके ज्ञान में कोई खराबी नहीं आती। वस्त्र, चन्दन, स्त्री अथवा सुवासिक पुष्पों की
मालायें आदि विलास की वस्तुओं का वह भले ही उपभोग करता हो, लेकिन जिस प्रकार वायु जल में नहीं
रुकता उसी प्रकार योगी भी विषय से अलिप्त ही रहता है। जिस प्रकार वायु से जाल उड़ता रहता है किन्तु वायु
जाल में नहीं फँसता, उसी प्रकार अनेक भोग भोगते हुए भी योगी उस भोग में नहीं फँसता। वायु से भेंट करने
अनेक प्रकार के सुगन्ध आते हैं, लेकिन मन में उसके प्रति आसक्ति न रख वह तत्काल उन्हें छोड़कर आगे बढ़
जाता है। उसी प्रकार आत्मस्वरूप से योगी भी समस्त देह में प्रविष्ट रहता है इसलिये उस देह के गुणों का
आश्रय वह उक्त स्थान में लेता रहता है। जिस प्रकार सुगन्ध पर वायु खेलती रहती है फिर भी वह सुगन्ध को
स्पर्श नहीं करती, उसी प्रकार आत्मदृष्टि के सामर्थ्य से वह देह के गुणों में लिप्त नहीं होता। राजा ! तुम्हें यह
परिपूर्ण आत्मस्थिति बताता हूँ, सुनो। जिस प्रकार आकाश सभी पदार्थों से अलिप्त है ऐसा अनुभव होता है, उसी
प्रकार यह स्थिति है।
अन्तर्हितश्च स्थिरजङ्गमेषु ब्रह्मात्मभावेन समन्वयेन।
व्याप्त्याव्यवच्छेदमसङ्गमात्मनो मुनिर्नभस्त्वं विततस्य भावयेत्॥ ४२ ॥
आकाश निर्मल, अभेद्य, अलिप्त तथा सभी पदार्थों के साथ समभाव रखने वाला है इसलिए मैंने आकाश
को गुरु बनाया। वह विषम में होते हुए सम, संग में होते हुए भी असंग तथा भेद करने पर भी उसका अभेद नहीं
टूटता, इसलिये आकाश को गुरु बनाया है। साँप और नेवला में बैरभाव है लेकिन दोनों के ही हृदय में आकाश
तो है ही। बैर और निर्बैर यह आकाश नहीं जानता, वैसी ही स्थिति आकाश की होनी चाहिये। आकाश की ही
तरह योगी भी अपने परिपूर्ण व्यापक रूप से ब्रह्म की भावना से ही स्वयं को देखता रहता है। ब्रह्मसमन्वय से
देखने पर स्थावर जंगम सब जगह मैं ही भरा हुआ हूँ, मेरे सिवाय तिलमात्र की भी जगह नहीं बची है, ऐसा उसे
दिखायी देने लगता है। आकाश तो सभी पदार्थों में रहता है लेकिन वह सबको नहीं दिखायी देता। उसी प्रकार
योगी भी दृश्य और द्रष्टा इसके पार की स्थिति में विचरता रहता है। बरछे-भाले से आकाश में छिद्र नहीं होता,
अथवा ज्वालाग्नि से वह नहीं जलता, ज्वाला से अलग न होने पर भी वह जैसा का तैसा दिखाई देता है। उसी
प्रकार योगी के लिये भी सारे द्वंद्व किसी भी काल में बाँध नहीं सकते। द्वंद्व से विलग न होते हुए भी वह
शोभायमान रहता है। योगी पर भले ही शस्त्रों से आक्रमण किया जाय लेकिन उन शस्त्रों में वह स्वयं को ही
१८२ श्रीमद् एकनाथी भागवत
देखता है। इसलिये जिस प्रकार आकाश को घाव नहीं लगता उसी प्रकार उसे भी घाव नहीं लगता। जो भी द्वंद्व
उसे बाधा करने आता है, वह सब मेरा ही स्वरूप है ऐसा उसे लगने लगता है इसलिये सहज ही द्वंद्वभाव दूर
होकर अबाधित निजरूप ही शेष रह जाता है। आकाश जलाशय में डूबा दिखायी देता है लेकिन जैसे वह पानी
से गीला नहीं होता उसी प्रकार योगी समस्त देह में रहते हुए भी उससे अलिप्त रहता है। आकाश में कीचड़
लगाने का प्रयास करने से वह आकाश में नहीं लगता बल्कि लगाने वाले को ही गन्दा कर देता है। उसी प्रकार
जो योगी को दोष लगाता है वही दोष का भागी होता है। आकाश सारे जनों पर फैला रहता है लेकिन उनके
घर्षण से वह मैला नहीं होता। उसी प्रकार योगी भी सारे कर्म कर कर्मठ होकर कभी मलिन नहीं होता। आकाश
को कपड़े में बाँधने जाओ तो चारों छोर खाली रहते हैं उसी प्रकार कर्म से योगी को बद्ध करने का प्रयास करने
से वह कर्म ही निष्कर्म हो जाता है। घट में जो आकाश रहता है उसे 'घटाकाश' कहते हैं। यथार्थ में घट के
भीतर और बाहर आकाश पूरी तरह व्याप्त रहता है। उसी प्रकार आत्मा देह के भीतर है ऐसा कहते हैं, लेकिन
वह देह के बाहर भी रहता है। देह मिथ्या है लेकिन चैतन्यस्वरूप परिपूर्ण है।
तेजोऽबन्नमयैर्भावैर्मेघाद्यैर्वायुनेरितैः।
न स्पृश्यते नभस्तद्वत् कालसृष्टैर्गुणैः पुमान् ॥ ४३॥
पृथ्वी की धूल से आकाश गन्दा नहीं होता, पानी के कारण वह गीला नहीं होता, अग्नि की ज्वाला से वह
जलता नहीं है अथवा वायु के बल से वह उड़ता नहीं है। जब बादलों की गड़गड़ाहट होती है तो आकाश ढँक
जाता है लेकिन उसमें से किसी को भी वह स्पर्श नहीं करता, अपने अलिप्त होने की सामर्थ्य से वह यथावत
रहता है। उसी प्रकार योगी भी आत्मस्वरूप की समरसता में होने के कारण कालनिर्मित गुणों के वश में नहीं
होता। काल की सामर्थ्य अपार है वह शरीर में जरामरण का प्रादुर्भाव करता है लेकिन योगी स्वयं देहातीत होने
के कारण जन्म-मरण का विचार नहीं करता। स्वप्न में यदि चिन्तामणि प्राप्त हो जाय और वह तभी किसी कुएँ
में गिर जाय तो नींद खुलने पर वह उसके खोने की बात नहीं करता। उसी प्रकार योगी का देहसंग होता है।
ब्रह्मदेवादि के देह को भी जो काल खा जाता है वह भी योगियों के चरणों का वन्दन करता है क्योंकि योगी काल
की भी आत्मा होने के कारण स्वयं काल का महाकाल होता है। बिजली आकाश में गड़गड़ाहट उत्पन्न कर अपने
तेज से आकाश को प्रकाशित करती है लेकिन भीतर और बाहर आकाश होते हुए भी वह उसमें लिप्त नहीं होता।
उसी प्रकार सत्त्वगुण ज्ञान का प्रकाशक है लेकिन योगी उसे भी स्पर्श नहीं करता इसे ध्यान में रखो। वह स्वयं
शुद्धज्ञानस्वरूप ही रहता है इसलिये वह बौद्धिक ज्ञान नहीं लेता। सूर्य का उदय होते ही दीपक के प्रकाश का
कोई उपयोग नहीं होता उसी प्रकार 'सहजज्ञान' प्राप्त होने पर बौद्धिक ज्ञान को कौन पूछेगा? सत्त्व से जो ज्ञान
उत्पन्न हुआ रहता है वह भी इच्छापूर्वक नहीं ग्रहण करता अथवा रजोगुण का प्रभाव बढ़ने पर भी उसमें कर्मठता
नहीं आ पाती। तमोगुण के प्रभाव से वह क्रोध मोह के वश में नहीं होता। ज्ञान के कल्लोल तथा आत्मानन्द से
वह अपने आप गुणातीत हुआ रहता है। अवधूत ने कहा, "हे राजकुमार, यदुवीर ! अब उदक को गुरुपद कैसे
प्राप्त हुआ यह बताता हूँ। ध्यानपूर्वक उसके लक्षण श्रवण करो।"
स्वच्छः प्रकृतितः स्निग्धो माधुर्यस्तीर्थभूर्नृणाम्।
मुनिः पुनात्यपां मित्रमीक्षोपस्पर्शकीर्तनैः ॥ ४४॥
उदक के लक्षणों के बारे में विचार करें तो वह स्वभाव से ही अत्यन्त निर्मल रहता है और उसके गुण धर्म