श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१६६ श्रीमद् एकनाथी भागवत
तुम कहोगे कि प्राणियों का जीवन तो विषयों पर ही निर्भर रहता है, उसका त्याग करके वे किस प्रकार जीवित
रहेंगे तो उसका भी सुगम मार्ग बताता हूँ, सुनो। विधिनियमों के अनुसार इन्द्रियों का निग्रह करने से चित्त शान्त
होता है, उसी प्रकार यदि इन्द्रिय और मन इन दोनों का निग्रह किया जाय तो यह त्याग उत्तम और सरल हो जाता
है। इन्द्रिय भले ही विषय की ओर प्रेरित हों लेकिन मन को उसमें प्रवेश नहीं करने देना चाहिये, यह भी एक
प्रकार का त्याग ही है। यदि यह शंका करोगे कि मन को विषय का बल होने के कारण वह विषय की आसक्ति
से चंचल हो जाता है और वह निश्चल कभी नहीं होगा, तो उसका भी उपाय सुनो। मेरा स्वरूप सर्वव्यापी है,
वह मन के अन्दर भी रहता है और बाहर भी। जहाँ-जहाँ मन जाएगा वहाँ-वहाँ वह भी रहेगा ही। चित्त को रहने
के लिये मेरा सिवा कोई स्थान नहीं है। वह स्वदेश में हो या परदेस में, रात-दिन मेरे अन्दर ही रहता है। इस
प्रकार निरन्तर आत्मस्वरूप को ही देखते रहने से वही चित्त सर्वव्यापक हो जायेगा। फिर इस चित्त में ही, तुम्हें
सारा जगत आदि से लेकर अन्त तक दिखने लगेगा। या फिर तुम्हारा जीवस्वरूप भी उत्तम है, उसमें ही यदि तुम
इस जगत को देखने लगोगे तो यह जगत ही तुम्हारा निर्व्यंग अंग बन कर रहेगा। चर तथा अचर, क्षुद्र और महान
आदि जो कुछ भी है उसे अपने जीवरूप में ही देखो। तुम कहोगे कि जीव तो एकदेशी है उसमें सारे जगत को
कैसे देखा जाय? सुवर्ण और अलंकार ये जिस प्रकार एकरूप हैं, उसी प्रकार जीव की मेरे साथ एकता करो।
चिन्तन से कीटक भ्रमर हो जाता है। उसी प्रकार आत्मदृष्टि से तुम भी तत्काल आत्मतत्त्व बन जाओगे। अरे!
नमक का टुकड़ा समुद्र में मिल जाने पर समुद्र की ही तरह बड़ा हो जाता है, उसी प्रकार तुम भी तत्काल मद्रूप
हो जाओगे। उस समय 'मैं' और 'तुम' का भेद अपने आप समाप्त हो जाएगा। उस समय तुम परमानन्दरूप
शुद्ध, बुद्ध, मुक्त और सिद्ध बन जाओगे।
ज्ञानविज्ञानसंयुक्त आत्माभूतः शरीरिणाम्।
आत्मानुभवतुष्टात्मा नान्तरायैर्विहन्यसे ॥ १०॥
शास्त्र के श्रवण से ज्ञान दृढ़ होता है, मनन के अभ्यास से ज्ञान का विज्ञान होता है, इन दोनों का स्वरूप
ध्यान में लेने से तुम ब्रह्मस्वरूप हो जाओगे। अगर तुम पूछोगे कि स्वहित के लिये तुम्हारे चरणों का अखण्ड
भजन करते रहें और अगर उसमें विघ्न आ जाये तो क्या करें ? तो सुनो। दंभ और लौकिक बातों का विचार कर
जो भक्त फल की इच्छा का त्याग कर भजन करता है उसके विघ्न किस प्रकार आयेगा ? उसके मार्ग में विघ्नों
का नाश करने के लिये मैं यह धारदार चक्र लेकर उसके आगे-पीछे सदैव खड़ा रहता हूँ। उद्धव ! इस प्रकार जो
निजभाव से मेरा भजन करता है उसे बाधा पहुँचाने का साहस देवताओं में भी नहीं है। सारांश यह कि
ब्रह्मस्वरूप हो जाने के बाद चराचर की आत्मा तुम स्वयं हो जाओगे। चाहे स्थावर हो चाहे जंगम हो चाहे देव हो
या दानव हो सब जगह तुम ही तुम रहोगे। तुम्हारे अतिरिक्त अणुमात्र के लिये भी कुछ नहीं रहेगा। इसलिये
तुम्हारे लिये विघ्न किस प्रकार की बाधा उत्पन्न करेगा ? ब्रह्मादिक को ग्रसित करने वाला जो काल है उसकी भी
तुम आत्मा बनकर रहोगे। इस प्रकार श्रीकृष्ण ने उद्धव की पीठ थपथपाते हुए यह बात कही। इस प्रकार बाह्य
बाधकता अपने आप नष्ट हो जाती है, संकल्प कल्पना बन्द हो जाती है, ब्रह्मानन्द की भोर होती है और कर्म का
रास्ता बन्द हो जाता है। ऐसा जो ब्रह्मानुभवी है उसके सामने कर्म दरिद्र अर्थात् निःसत्व हो जाता है, वेद उसके
सेवक बन जाते हैं और विधिविवेक कर्मचारी हो जाते हैं। यही बात मैं तुम्हें कितनी बार और कैसे समझाऊँ ? मैं
भी उसका आज्ञाधारक बन जाता हूँ। ऐसे भक्त जहाँ कहीं भी मेरी प्रतिष्ठा करते हैं वहाँ मुझे प्रकट होना पड़ता