श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१७८ श्रीमद् एकनाथी भागवत
(२१) हथौड़ा चलाने वाला लोहार, (२२) साँप, (२३) केंचुली, (२४) रानी मक्खी इस प्रकार कुल मिलाकर
चौबीस गुरु हैं। पच्चीसवाँ तत्त्व जो परब्रह्म है, उसे प्राप्त करने के लिये इन चौबीस गुरुओं की उपासना करनी
चाहिये। सुविचार तथा आत्मबुद्धि से इन गुरुओं का भजन करना चाहिये। हृदय में आत्मज्ञान ठीक से प्रविष्ट हो
जाय इसलिये मैंने आत्मविचार से ही रात दिन अनेकों को गुरु बना लिया। किस युक्ति से, किस विचार से, किस
गुण के लिये कौन-सा गुरु बनाया ? वह भी सविस्तार बता रहा हूँ, सुनो।
एते मे गुरवो राजंश्चतुर्विंशतिराश्रिताः ।
शिक्षा वृत्तिभिरेतेषामन्वशिक्षमिहात्मनः ॥ ३५ ॥
हे निर्मल विवेकचक्रवर्ती राजराजेश्वर ! गुरुओं की जो संख्या थी वह मैंने तुम्हें बतायी। उनके पास जो लेने
लायक गुण थे उन्हें मैंने अपनी युक्ति से सीखा और फिर विकल्प का भ्रम त्याग कर आत्मस्थिति तक पहुँचा।
यतो यदनुशिक्षामि यथा वा नहुषात्मज ।
तं तथा पुरुषव्याघ्र निबोध कथयामि ते ॥ ३६ ॥
नहुष का पुत्र ययाति, ययाति का पुत्र यदु, इस वंश परम्परा के अनुसार यदु को नहुषनंदन कहते हैं।
इसलिए अवधूत ने कहा, हे नहुष पुत्र ! अब गुरु के लक्षण बताता हूँ, तो हे चतुर ! उन्हें तुम श्रवण करो। जिस
गुरु के पास जो गुण था उसे मैंने सीखा। किस प्रकार सीखा यह तुम्हें बताता हूँ, ध्यान देकर सुनो। यदु सारे शरीर
को मानों कान बनाकर सुनने लगा। शब्दों को पीछे छोड़ वह उसमें अर्थ की ओर ध्यान देने लगा। सारे विकल्पों
का त्याग कर विनम्र हुआ वह राजा जो भी विषय सुनता था उसके अनुसार तद्रूप हो जाता था।
भूतैराक्रम्यमाणोऽपि धीरो दैववशानुगैः ।
तद्विद्वान्न चलेन्मार्गादन्वशिक्षं क्षितेर्व्रतम् ॥ ३७ ॥
परमार्थ में शान्ति प्रमुख है। साधक में वह अवश्य होनी चाहिये इसलिये उस शान्ति के लिये मैंने सबसे
पहले पृथ्वी को गुरु बनाया। पृथ्वी तीन प्रकार से गुरु है। पर्वत, वृक्ष और भूमि। इन तीनों के गुण देह में धारण
करने के कारण पृथ्वी में गुरु के गुण आ गये हैं। अन्तर्निग्रह करने का अर्थ 'शान्ति' और बाह्येन्द्रिय निग्रह का
अर्थ 'दांति' होता है और इन्द्रसहिष्णुता का अर्थ 'क्षांति' है इसलिये क्षोति यह गुण प्राप्त करने के लिये पृथ्वी को
गुरु बनाया। अनेक प्रकार के प्राणी 'यह पृथ्वी मेरी है' यह कहकर उससे चिपकते हैं और अपनी-अपनी प्रवृत्ति
तथा व्यवहार के अनुसार उसके अनेक प्रकार से टुकड़े करते रहते हैं। लेकिन उन जीवों के अलग-अलग प्रकार
के व्यवहार पृथ्वी स्वयं ही संचालित करती रहती है और अपनी एकात्मता साधते हुए वह सदा अखण्ड ही रहती
है। ऐसा ही लक्षण योगियों का भी लक्षण रहता है, वह भले ही भिन्न-भिन्न कर्म करता हो लेकिन उसकी प्रवृत्ति
सदा एक-सी रहती है। यह देह प्रारब्धयोग से चलता है और जीव भी प्रारब्धयोग से ही आचरण करते हैं। इसे
ध्यान में रखकर, प्रत्येक जीव में मेरी ही आत्मा है, इस भावना से जो रहते हैं उन साधकों को दूजे की बाधा नहीं
होती। जीव पृथ्वी की पूजा करे अथवा उस पर मलमूत्र विसर्जन करे लेकिन इससे उसे न हर्ष होता है और न
विषाद ही होता है। अपनी शान्ति के कारण वह बिलकुल निश्चल रहती है। समस्त प्राणी पृथ्वी से उत्पन्न हुए हैं।
उन्होंने अपने अच्छे-बुरे कर्म से पृथ्वी की पूजा न की हो या उसे कष्ट भी न दिया हो लेकिन वह ऐक्य भाव से,
द्वंद्व भाव भूलकर आत्मरूप से निश्चल ही रहती है। उसी प्रकार योगी भी प्राणियों के भिन्न-भिन्न स्वभाव के
कारण भयभीत नहीं होते। समस्त प्राणियों के प्रति उनकी निजात्मभावना होने के कारण, विषय के प्रति भी उनमें