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सर्वकोश
श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

पृष्ठ 198, कुल 869 में से

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पृष्ठ 198

१८२ श्रीमद् एकनाथी भागवत
देखता है। इसलिये जिस प्रकार आकाश को घाव नहीं लगता उसी प्रकार उसे भी घाव नहीं लगता। जो भी द्वंद्व
उसे बाधा करने आता है, वह सब मेरा ही स्वरूप है ऐसा उसे लगने लगता है इसलिये सहज ही द्वंद्वभाव दूर
होकर अबाधित निजरूप ही शेष रह जाता है। आकाश जलाशय में डूबा दिखायी देता है लेकिन जैसे वह पानी
से गीला नहीं होता उसी प्रकार योगी समस्त देह में रहते हुए भी उससे अलिप्त रहता है। आकाश में कीचड़
लगाने का प्रयास करने से वह आकाश में नहीं लगता बल्कि लगाने वाले को ही गन्दा कर देता है। उसी प्रकार
जो योगी को दोष लगाता है वही दोष का भागी होता है। आकाश सारे जनों पर फैला रहता है लेकिन उनके
घर्षण से वह मैला नहीं होता। उसी प्रकार योगी भी सारे कर्म कर कर्मठ होकर कभी मलिन नहीं होता। आकाश
को कपड़े में बाँधने जाओ तो चारों छोर खाली रहते हैं उसी प्रकार कर्म से योगी को बद्ध करने का प्रयास करने
से वह कर्म ही निष्कर्म हो जाता है। घट में जो आकाश रहता है उसे 'घटाकाश' कहते हैं। यथार्थ में घट के
भीतर और बाहर आकाश पूरी तरह व्याप्त रहता है। उसी प्रकार आत्मा देह के भीतर है ऐसा कहते हैं, लेकिन
वह देह के बाहर भी रहता है। देह मिथ्या है लेकिन चैतन्यस्वरूप परिपूर्ण है।
तेजोऽबन्नमयैर्भावैर्मेघाद्यैर्वायुनेरितैः।
न स्पृश्यते नभस्तद्वत् कालसृष्टैर्गुणैः पुमान् ॥ ४३॥
पृथ्वी की धूल से आकाश गन्दा नहीं होता, पानी के कारण वह गीला नहीं होता, अग्नि की ज्वाला से वह
जलता नहीं है अथवा वायु के बल से वह उड़ता नहीं है। जब बादलों की गड़गड़ाहट होती है तो आकाश ढँक
जाता है लेकिन उसमें से किसी को भी वह स्पर्श नहीं करता, अपने अलिप्त होने की सामर्थ्य से वह यथावत
रहता है। उसी प्रकार योगी भी आत्मस्वरूप की समरसता में होने के कारण कालनिर्मित गुणों के वश में नहीं
होता। काल की सामर्थ्य अपार है वह शरीर में जरामरण का प्रादुर्भाव करता है लेकिन योगी स्वयं देहातीत होने
के कारण जन्म-मरण का विचार नहीं करता। स्वप्न में यदि चिन्तामणि प्राप्त हो जाय और वह तभी किसी कुएँ
में गिर जाय तो नींद खुलने पर वह उसके खोने की बात नहीं करता। उसी प्रकार योगी का देहसंग होता है।
ब्रह्मदेवादि के देह को भी जो काल खा जाता है वह भी योगियों के चरणों का वन्दन करता है क्योंकि योगी काल
की भी आत्मा होने के कारण स्वयं काल का महाकाल होता है। बिजली आकाश में गड़गड़ाहट उत्पन्न कर अपने
तेज से आकाश को प्रकाशित करती है लेकिन भीतर और बाहर आकाश होते हुए भी वह उसमें लिप्त नहीं होता।
उसी प्रकार सत्त्वगुण ज्ञान का प्रकाशक है लेकिन योगी उसे भी स्पर्श नहीं करता इसे ध्यान में रखो। वह स्वयं
शुद्धज्ञानस्वरूप ही रहता है इसलिये वह बौद्धिक ज्ञान नहीं लेता। सूर्य का उदय होते ही दीपक के प्रकाश का
कोई उपयोग नहीं होता उसी प्रकार 'सहजज्ञान' प्राप्त होने पर बौद्धिक ज्ञान को कौन पूछेगा? सत्त्व से जो ज्ञान
उत्पन्न हुआ रहता है वह भी इच्छापूर्वक नहीं ग्रहण करता अथवा रजोगुण का प्रभाव बढ़ने पर भी उसमें कर्मठता
नहीं आ पाती। तमोगुण के प्रभाव से वह क्रोध मोह के वश में नहीं होता। ज्ञान के कल्लोल तथा आत्मानन्द से
वह अपने आप गुणातीत हुआ रहता है। अवधूत ने कहा, "हे राजकुमार, यदुवीर ! अब उदक को गुरुपद कैसे
प्राप्त हुआ यह बताता हूँ। ध्यानपूर्वक उसके लक्षण श्रवण करो।"
स्वच्छः प्रकृतितः स्निग्धो माधुर्यस्तीर्थभूर्नृणाम्।
मुनिः पुनात्यपां मित्रमीक्षोपस्पर्शकीर्तनैः ॥ ४४॥
उदक के लक्षणों के बारे में विचार करें तो वह स्वभाव से ही अत्यन्त निर्मल रहता है और उसके गुण धर्म