श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
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तो उसके बारे में भी सुन लो। स्वरूपसाम्य से समदृष्टि होती है, उस समदृष्टि से ही तुम सृष्टि में विचरण करते
रहो। रहने के स्थान के सम्बन्ध में न चिन्ता करो और न कोई योजना बनाओ। कुछ काल के लिये भी एक स्थान पर
रहने से उस स्थान के प्रति अभिमान हो जाता है। इस प्रकार बस्ती का विचार गलत है इसलिये तुम स्थान का प्रयत्न
मत करना। जब तुम सब में सर्वगत हो जाओगे, सर्वाधार और सर्वदेशी बन जाओगे तब तुम तद्रूप होकर मुझे पा
सकोगे और बिना हाथ पैर हिलाये निजधाम आ जाओगे। मुझे निजधाम ले चलिये ऐसा उद्धव ने कहा था तो
श्रीकृष्ण ने उसे आत्मबोध का उपाय बताया। यदि यह उपाय नहीं किया तो मेरी प्राप्ति कभी नहीं होगी। फिर तुम
निजधाम किस तरह आओगे ? यदि कहोगे कि गरुड़ पर बिठा कर मुझे ले चलें तो यहाँ पंखों की गति न होने के
कारण गरुड़ का वहाँ जाना सम्भव नहीं है। इसलिए जो साधक हैं वे उभय पक्ष छोड़कर मद्रूप हो जाते हैं लेकिन
गरुड़ को पक्ष का अभिमान है इसलिये वह वहाँ नहीं जा सकता। अब तुम कहोगे कि मुझे कन्धे पर बिठा कर ले
चलिये तो मुझे वास्तव में कन्धा ही नहीं है। इसलिये अहंबुद्धि का त्याग किये बिना तुम वहाँ नहीं जा सकते। बिना
अहंभाव छोड़े कितने ही उपाय क्यों न करो लेकिन निजधाम में प्रवेश नहीं होगा। जो भी साकार तुम देख रहे हो
वह सब नाशवान है। इस बात का तुम निजबोध से निश्चय करो।
यदिदं मनसा वाचा चक्षुर्भ्यां श्रवणादिभिः ।
नश्वरं गृह्यमाणं च विद्धि मायामनोमयम् ॥ ७ ॥
दृष्टि से जो भी देखा जाय वह सब दृश्यत्व के कारण नष्ट हो जाता है, कान को जो मालूम होता है वह
सब शब्दत्व से विलीन हो जाता है, वाणी जो भी बोलती है, वह सब वितंडावाद में डूब जाता है इसलिये वेदों ने
बोलना छोड़ा और 'नेति' शब्द से ही वह लजा गया। मन के संकल्प ने जो आकलन किया था वह सारा कल्पित
हो गया जो अहंकार पर आधारित थे वे विषय विजातीय होने के कारण व्यर्थ हो गये। इन्द्रियों को जितना दिखाई
देता है वह सारा नश्वर रहता है। यह सब नित्य-अनित्य के विचार से निश्चित हुआ है। लेकिन यह नित्य
अनित्य विवेक भी मायावी है यह ध्यान में रखो। कुल मिलाकर यह सारा लोक मायामय है और माया संकल्प
सृष्टि का ही सृजन करती है। संसार के रूप में जो कुछ दिखाई पड़ता है वह सारा माया का संसार है, इसलिये
तुम धैर्य धारण कर उसे पहचानो। स्वप्न का राज-वैभव जिस प्रकार एक भ्रम रहता है उसी प्रकार यह सारा
सांसारिक वैभव माया है, इसे ध्यान में रखो।
पुंसोऽयुक्तस्य नानार्थो भ्रमः सगुणदोषभाक् ।
कर्माकर्मविकर्मेति गुणदोषधियो भिदा ॥ ८ ॥
परमात्मा से जो विभक्त रहता है उस पुरुष को 'अयुक्त' कहते हैं। अपने एकमेवाद्वितीय अद्वैत आत्मस्वरूप
का विस्मरण होने के कारण उसे अनेकत्व से भेद का भ्रम होने लगता है। उस विस्मृति के भ्रम में मिथ्या भेद का
सत्याभास होने लगता है और भेददृष्टि के आवेश में गुणदोष दिखाई देने लगते हैं। यथार्थ में जब भेद ही नहीं
है तो शुद्ध वस्तु में गुणदोष दिखाई देने का प्रश्न ही नहीं उठता। भेद के जोर से ही गुणदोषदृष्टि उत्पन्न होती है
और कर्माकर्म की त्रिपुटी भेददृष्टि के ही कारण दृढ़ होती है। भेद ने बहुत खराब काम किया है। वह कर्म,
अकर्म, विकर्म, जन्म-मरणादि धर्म और स्वकर्म प्रकाशित करता है। कर्म और विकर्म से नरक की यातनाएँ
भोगनी पड़ती हैं और काम्य कर्म से स्वर्ग प्राप्त होता है इसलिये कर्म करके कर्ममुक्त होकर समाधान प्राप्त करना
चाहिये। अब तुम पूछोगे कि कैसा कर्म ? अकर्म का क्या लक्षण है ? विकर्म का क्या गुण है ? तो वह सब भी