श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१७६ श्रीमद् एकनाथी भागवत
हे अवधूत! आप उस दावाग्नि में रहते हुए भी उससे झुलसते नहीं हैं। आपकी यह अविचलित अवस्था सचमुच
ही आश्चर्यजनक है। वह हमारी समझ में कभी नहीं आयेगी। नदी के दोनों किनारों पर आग लगने पर जिस
प्रकार हाथी पानी में डुबकी लगा लेता है और फिर उस पर आग की लपटों का प्रभाव नहीं होता, उसी प्रकार
आप भी दुःख से मुक्त हैं ऐसा लगता है। शीत और ऊष्मा आपको स्पर्श नहीं करते, आप ब्रह्मस्वरूप में निश्चल
हैं इसलिये हे दयाधन! हे कृपामूर्ति! आप से थोड़ी विनती करता हूँ।
त्वं हि न पृच्छतां ब्रह्मन्नात्मन्यान्दकारणम्।
ब्रूहि स्पर्शविहीनस्य भवतः केवलात्मनः॥ ३०॥
आप ब्रह्मवेत्ता ब्राह्मण हैं तथा आत्मानंद से परिपूर्ण हैं। उस आनन्द का कारण क्या है, कृपया स्पष्ट करके
बतायें। देह में होते हुए भी आप विदेहस्थिति में रहते हैं, आपको विषय स्पर्श भी नहीं कर सकता। इतनी
अलिप्तता आपने किस प्रकार प्राप्त की? आपको राजा का भय नहीं है, धनवानों की चिन्ता नहीं है, दीन का
भाषण आपको प्रिय लगता है और उसका मनोरथ आत्मज्ञान देकर पूरा करते हैं। इस प्रकार आप बिलकुल
कृपालु हैं, आप दुखियों के बन्धु तथा दीनों के लिये दयालु हैं। उसी प्रकार निजात्मभाव से आप भक्तों के
भक्तवत्सल हैं। इस प्रकार श्रीकृष्ण यदु का भाषण बड़े चाव से सुनाने लगा। उसने उद्धव से कहा "इस बोध को
सावधानी से चित्त में धारण करो।"
श्रीभगवानुवाच
यदुर्नैवं महाभागो ब्रह्मण्येन सुमेधसा।
पृष्टः सभाजितः प्राह प्रश्रयावनतं द्विजः॥ ३१॥
वह श्रीपति अपने मुख से यदु के भाग्य का वर्णन करने लगा। यदुराजा ब्राह्मणों का अत्यन्त भक्त होते हुए
सत्त्वशील था। उसी प्रकार वह अत्यन्त बुद्धिमान और श्रद्धालु था। भगवत् कृपा से उस भाग्यवान अवधूत की
यदु से भेंट हुई। तब यदु ने अत्यन्त विनम्र होकर अपने लाभ के लिये उससे विनती की। मधुपर्क विधि से
उसकी पूजा कर मृदु मधुर वाणी से उसने प्रार्थना की। इससे अवधूत सन्तुष्ट होकर प्रेम से बोलने लगे।
ब्राह्मण उवाच
सन्ति मे गुरवो राजन् बहवो बुद्धयुपाश्रिताः।
यतो बुद्धिमुपादाय मुक्तोऽटामीह तान्छृणु ॥ ३२॥
क्षीरसागर में उफान आता है या मेघ गर्जना करते हैं या आत्मसुख की तुरही बज उठे, उसी प्रकार वह
ब्राह्मण बोलने लगा। हे राजचूडामणि सुनो। तुम यदुकुल दीप के साक्षात सूर्य ही हो। तुम्हारी वाणी धन्य है। तुमने
अपने गुणों से मुझे संतुष्ट किया। राजा होते हुए भी सात्त्विक, सिद्ध लक्षणों से युक्त ऐसे इस पृथ्वी पर तुम एक ही
हो। तुमने जो प्रश्न किया, वह सुन्दर, गुणयुक्त और उत्तम से उत्तम है। तुम स्वानंद का कारण पूछते हो, वह मैं
तुम्हें यथार्थ रूप में बताता हूँ, सुनो। हे राजा! गुरु के बिना आत्मप्राप्ति कभी सिद्ध नहीं होती। उन गुरुओं के बारे
में भी मैं तुम्हें यथार्थ रूप में बताता हूँ। आत्मबुद्धि के विचारों में जब मैं तल्लीन था उस समय मैंने अनेक गुरु
किये। जिस किसी भी प्राणी में मुझे कोई सद्गुण दिखायी दिया, उस गुण के लिये मैंने उस गुरु को स्वीकार
किया। बुद्धि से उस गुण को स्वीकार किया और धैर्यपूर्वक उसे धारण किया। इसलिये मैं मुक्त हो गया और इस