सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

पृष्ठ 191, कुल 869 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 191

सातवाँ अध्याय १७५
अनाज भी नहीं देते। ढोंगी लोग अपना नाम बढ़ाने के लिये वैष्णवदीक्षा लेते हैं और चकाचक देवताओं की पूजा
कर दोनों हाथ से शंख बजाते हैं। आयुष्य दान करने वाले पुण्यपुरुष स्वयं को वैद्य और अहिंसक कहते हैं किन्तु
स्थावर जंगम आदि समस्त जीवों की हत्या कर सफलता की पताका फहराते हैं। अपनी कीर्ति बढ़ाने के लिये
कुछ लोग तुलाभार कराते हैं। वे लोग मलमूत्र से भरे देह को द्रव्य से तौलते हैं। लेकिन परमार्थ के नाम पर कोई
एक कौड़ी भी नहीं खर्च करता। देखिये, मूर्ख लोग कैसे भुलावे में आ जाते हैं। वे सच्चे स्वार्थ को भूल जाते हैं।
पूर्व कर्म से जिन्हें लक्ष्मी प्राप्त नहीं है, वे लोग लक्ष्मी की उपासना करते हैं, लेकिन लक्ष्मी के पति श्रीहरि का
भजन नहीं करते। विश्व का गुरु जो श्रीहरि है उसकी पत्नी है। उसकी अभिलाषा कर वे उसे अपने पास रखते
हैं, हरि को अर्पण नहीं करते। हरि उन्हें नरक में भेजता है। रोग का विनाश हो और आरोग्य प्राप्त हो इसलिये
सूर्य की उपासना करते हैं लेकिन उन्हें इस बात का स्मरण नहीं रहता कि देह नश्वर है। इससे आत्मस्वरूप का
विस्मरण होता है। इस प्रकार हम आयुष्य, यश और द्रव्य के लिये लोगों को भजन में लिप्त देखते हैं लेकिन
स्वामी ! आश्चर्य की बात है कि आप परब्रह्मस्वरूप में लीन दिखायी देते हैं। विषय का जोर विचित्र रहता है।
इससे लोग मिथ्या भ्रम में पड़े हुए हैं। वे ज्ञान के साधन साध्य कर विषय की कामना करते हैं। वेदान्त-वार्तिक
की वाक्पटुता से अद्वैत ब्रह्म का प्रतिपादन करते हैं किन्तु पेट के लिये वे ज्ञान का विक्रय करते हैं। इस आश्चर्य
का वर्णन कौन करेगा? कोई योगाभ्यास कर श्वांस को रोक कर रखते हैं और आँखें मूंदकर ध्यान करते हैं
लेकिन मन में विषय का ही चिन्तन करते रहते हैं। इस प्रकार ज्ञानेच्छु लोग अनेक प्रकार के साधन अपना कर
मूर्ख बनते हैं। लेकिन आपने आत्मसुख प्राप्त कर अलौकिक कार्य किया। इस प्रकार हे अवधूत स्वामी ! तुमने
जीवित को तृण समान किया, समस्त लोक को तुच्छ मानकर निजात्म हित में लीन हो। आप आत्मानन्द में तृप्त
होकर हृदय में शान्त हो गये हैं ऐसा हम देख रहे हैं। उनके लक्षण सुनिये।
त्वं तु कल्पः कविर्दक्षः सुभगोऽमृतभाषणः।
न कर्ता नेहसे किंचिज्जडोन्मत्तपिशाचवत् ॥ २८ ॥
आप सर्वज्ञ हैं लेकिन वह ज्ञानतत्त्व आप प्रकट नहीं होने देते। आप कुछ करते भी नहीं हैं और किसी
वस्तु की इच्छा ही करते हैं। आपकी आत्मशान्ति से जड़त्व प्रकट होता है, आप सर्वथा मौन रहते हैं, आपमें
किसी भी प्रकार की विकलता नहीं दिखायी देती। शरीर से अव्यंग होने के कारण आप स्वरूप से सुन्दर दिखायी
देते हैं। ज्ञान तो अकेला ही था, उसके साथ दूसरा कोई न होने के कारण वह परदेसी हो गया था। वह आप में
लीन हो गया इसलिये आपको 'कवि' यह नाम प्राप्त हुआ। कर्म करते हुए भी आप 'अकर्ता' हैं, यह आपकी
दक्षता है। आप ब्रह्मरस से परिपूर्ण 'रसाल' भाषण करते हैं वह माधुर्य अमृत में कहाँ से आयेगा ? ब्रह्मरस प्राशन
कर आप ब्रह्मानन्द में मस्त हो गये हैं इसलिये आप 'उन्मत्त' अवस्था में किसी को देखते भी नहीं। सदासर्वदा
आत्मस्वरूप में लीन होने के कारण आप 'मेरा' और 'तेरा' जैसी बात नहीं करते। आपका यह पागलपन सारे
संसार को अवश्य दिखायी देता है। आप आत्मज्ञान से तृप्त तथा परमानन्द से शान्त हो गये हैं यह लक्षण भी
साफ दिखायी दे रहा है।
जनेषु दह्यमानेषु कामलोभदवाग्निना।
न तप्यसेऽग्निनामुक्तो गङ्गाम्भस्थ इव द्विपः ॥ २९ ॥
कामलोभरूपी दावाग्नि में जलने वाले लोक हमें दिखायी दे रहे हैं, उससे कोई नहीं बच पाया है। लेकिन