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सर्वकोश
श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

पृष्ठ 190, कुल 869 में से

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पृष्ठ 190

१७४ श्रीमद् एकनाथी भागवत
थी। समदृष्टि के योग से उसे सर्वत्र व्यापकता ही प्राप्त हो गयी थी। कर्म, कार्य और कर्ता यह सब वह स्वयं ही
बन गया था। जीव ने शपथ लेकर क्रिया को अर्पण कर दिया था। देह पर जो अहंकार था वह देह के मिथ्या होते
ही भाग गया था। नित्यानित्य विवेकरूपी होम से जो ब्रह्माग्नि उत्पन्न हुआ उससे चारों आश्रमों के घर जल गये
और वह निराश्रमी हो गया। उस आश्रम में शास्त्रश्रवण विधि की पोथी थी, वह भी जलकर राख हो गयी। वह
राख भी हाथ नहीं लगी। विधिनिषेध की शर्त तथा पंचायतन देवपूजा राख में मिल गयी। संचित-क्रियमाण कर्म
की,जो पूँजी थी वह भी जलकर खाक हो गयी। इस प्रकार ब्रह्मानन्द से डोलने वाले तथा निजसुख से झूलने
वाले उस अवधूत को यदु ने आते देखा। उसने सर्वसंकल्प विकल्परहित होने की विभूति शरीर में लगायी थी
इसलिए उसे अवधूत कहना पड़ेगा अन्यथा वह ब्राह्मण ही था। सामने दीखने वाला सारा प्रपंच उसने आत्मबोध
से धो डाला था इसीलिये उसे 'अवधूत' कहते हैं, वैसे वह प्रसिद्ध ब्राह्मण था। जो 'अहं' को धो देता है वही
अवधूत है, वही योगी है और वही पुनीत है। जो अहंकारग्रस्त होता है वही जन्मकर्म में पतित होता है ऐसा
समझना चाहिये। उस अवधूत के देह को वार्धक्य नहीं आता क्योंकि जब देह में देहत्व ही नहीं रहता तो वार्धक्य
कहाँ से आयेगा? और यही चिरयुवा होने का मूल कारण है। उसके और भी लक्षण हैं। उसका चिरनूतन रहने
वाला ज्ञान मैला नहीं होता, वह नित्य नये रूप में ही उसका भोग करता रहता है। इसलिये वह यौवन से भरा पूरा
था। आत्मज्ञान के तेज से उसने द्वैत को जीत लिया था इसलिये वह इस प्रकार निःशंकर होकर घूम रहा था। उसे
किसी भी बात का भय नहीं लग रहा था। इस प्रकार अवधूत के लक्षणों का निश्चय हुआ और वह आत्मज्ञान से
परिपूर्ण है ऐसा लगा। यदु के मन में उसके प्रति पूज्यबुद्धि उत्पन्न हुई, उसके प्रति अनन्य श्रद्धा और नम्रता हो
आयी। राजा का चित्त प्रसन्न हुआ और उसने उसे साष्टांग दण्डवत कर, भक्तिपूर्वक हाथ जोड़कर प्रश्न किया।
यदुरुवाच
कुतो बुद्धिरियं ब्रह्मन्नकर्तुः सुविशारदा।
यामासाद्य भवांल्लोकं विद्वांश्चरति बालवत् ॥ २६॥
यदु ने कहा, स्वामी! धर्म-कर्म का आचरण कर अथवा यमनियम साधकर भी जो बुद्धि प्राप्त नहीं हो
सकती वह अपूर्व बुद्धि मुझे आपमें दिखायी दे रही है। आप सारे कर्मों में तो कुशल दिखायी देते हैं किन्तु बिना
कुछ किये निश्चल रहते हैं। आत्मबोध के कारण आप में अकर्तृत्वबोध आ गया है और इसीलिये अहेतुक
बालक की तरह आपकी स्थिति दिखायी देती है। आप बालकों की तरह व्यवहार करते हैं किन्तु आप में
बालबुद्धि नहीं है। आप सर्वथा सर्वज्ञ हैं ऐसा मुझे लगता है। इस मृत्युलोक में आकर नरदेह प्राप्त कर उसकी
जैसी सार्थकता आपने की है वह अन्यत्र नहीं दिखायी देती।
प्रायो धर्मार्थकामेषु विवित्सायां च मानवाः।
हेतुनैव समीहन्ते आयुषो यशसः श्रियः॥ २७॥
इस लोक के लोग प्रायः धर्मार्थकाम की ही इच्छा करने वाले हैं इसलिये उन विषयों का ज्ञान वे अवश्य
प्राप्त कर लेते हैं। वे कहते हैं, हम स्वधर्म का पालन करते हैं, स्नान संध्या में कीर्ति प्राप्त करते हैं और धन
प्राप्ति के लिये गायत्री के फल दे डालते हैं। वे कहते हैं, हम वेदों के अनुसार यज्ञ करते हैं, वेदमार्ग की स्थापना
करते हैं और अन्त में स्वर्ग की इच्छा कर उसे उदरनिर्वाह का साधन बना देते हैं। कुछ लोग स्वयं को
स्वकर्मनिष्ठ बताते हैं और दर्भ, मृत्तिका आदि नष्ट करते हैं लेकिन यदि कोई याचक आ जाय तो उसे मुट्ठीभर