श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसातवाँ अध्याय १८१
योगी अपना सर्वत्र समभाव कभी नहीं छोड़ते। प्राण यथार्थ में देह के भीतर रहते हुए भी बाह्य वायु से भेदभाव
नहीं करता। इसी प्रकार योगी में भी अंतर्बाह्य एक ही भावना होती है।
विषयेष्वाविशन् योगी नानाधर्मेषु सर्वतः।
गुणदोषव्यपेतात्मा न विषज्जेत वायुवत्॥ ४० ॥
पार्थिवेष्विह देहेषु प्रविष्टस्तद्गुणाश्रयः।
गुणैर्न युज्यते योगी गन्धैर्वायुरिवात्मदृक् ॥ ४१ ॥
चतुर पुरुष को इस वायु की तरह दोहरी एकता साधनी चाहिये। अंतर्बाह्य सदा एक से एकभाव से व्यवहार
करना चाहिये। अब तक तुम्हें प्राणवृत्ति के सारे लक्षण बताये। अब बाह्य वायु के लक्षण भी ध्यान देकर सुनो।
वायु सबको स्पर्श करके जाता है, लेकिन कहीं भी फँस कर नहीं रहता। उसी प्रकार योगी भी विषय सेवन करते
हुए किसी में आसक्त नहीं होता। वह इन्द्रियों की संगति में रहकर भले ही विषय में खेलता रहता हो लेकिन
गुणदोषों की आसक्ति से उसके ज्ञान में कोई खराबी नहीं आती। वस्त्र, चन्दन, स्त्री अथवा सुवासिक पुष्पों की
मालायें आदि विलास की वस्तुओं का वह भले ही उपभोग करता हो, लेकिन जिस प्रकार वायु जल में नहीं
रुकता उसी प्रकार योगी भी विषय से अलिप्त ही रहता है। जिस प्रकार वायु से जाल उड़ता रहता है किन्तु वायु
जाल में नहीं फँसता, उसी प्रकार अनेक भोग भोगते हुए भी योगी उस भोग में नहीं फँसता। वायु से भेंट करने
अनेक प्रकार के सुगन्ध आते हैं, लेकिन मन में उसके प्रति आसक्ति न रख वह तत्काल उन्हें छोड़कर आगे बढ़
जाता है। उसी प्रकार आत्मस्वरूप से योगी भी समस्त देह में प्रविष्ट रहता है इसलिये उस देह के गुणों का
आश्रय वह उक्त स्थान में लेता रहता है। जिस प्रकार सुगन्ध पर वायु खेलती रहती है फिर भी वह सुगन्ध को
स्पर्श नहीं करती, उसी प्रकार आत्मदृष्टि के सामर्थ्य से वह देह के गुणों में लिप्त नहीं होता। राजा ! तुम्हें यह
परिपूर्ण आत्मस्थिति बताता हूँ, सुनो। जिस प्रकार आकाश सभी पदार्थों से अलिप्त है ऐसा अनुभव होता है, उसी
प्रकार यह स्थिति है।
अन्तर्हितश्च स्थिरजङ्गमेषु ब्रह्मात्मभावेन समन्वयेन।
व्याप्त्याव्यवच्छेदमसङ्गमात्मनो मुनिर्नभस्त्वं विततस्य भावयेत्॥ ४२ ॥
आकाश निर्मल, अभेद्य, अलिप्त तथा सभी पदार्थों के साथ समभाव रखने वाला है इसलिए मैंने आकाश
को गुरु बनाया। वह विषम में होते हुए सम, संग में होते हुए भी असंग तथा भेद करने पर भी उसका अभेद नहीं
टूटता, इसलिये आकाश को गुरु बनाया है। साँप और नेवला में बैरभाव है लेकिन दोनों के ही हृदय में आकाश
तो है ही। बैर और निर्बैर यह आकाश नहीं जानता, वैसी ही स्थिति आकाश की होनी चाहिये। आकाश की ही
तरह योगी भी अपने परिपूर्ण व्यापक रूप से ब्रह्म की भावना से ही स्वयं को देखता रहता है। ब्रह्मसमन्वय से
देखने पर स्थावर जंगम सब जगह मैं ही भरा हुआ हूँ, मेरे सिवाय तिलमात्र की भी जगह नहीं बची है, ऐसा उसे
दिखायी देने लगता है। आकाश तो सभी पदार्थों में रहता है लेकिन वह सबको नहीं दिखायी देता। उसी प्रकार
योगी भी दृश्य और द्रष्टा इसके पार की स्थिति में विचरता रहता है। बरछे-भाले से आकाश में छिद्र नहीं होता,
अथवा ज्वालाग्नि से वह नहीं जलता, ज्वाला से अलग न होने पर भी वह जैसा का तैसा दिखाई देता है। उसी
प्रकार योगी के लिये भी सारे द्वंद्व किसी भी काल में बाँध नहीं सकते। द्वंद्व से विलग न होते हुए भी वह
शोभायमान रहता है। योगी पर भले ही शस्त्रों से आक्रमण किया जाय लेकिन उन शस्त्रों में वह स्वयं को ही