श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१७० श्रीमद् एकनाथी भागवत
इसी चिन्ता में मग्न। जो अपने दैहिक स्वभाव धर्म के कारण सर्वदा संसार की वृद्धि करता रहता है वह संसार से
मुक्त कैसे रह सकता है? अपनी निर्मित की हुई चीज को वह कभी डुबायेगा नहीं। नारद ब्रह्मोपदेश कर संसार
की उत्पत्ति में बाधा डालने लगा, तो ब्रह्मदेव ने कुपित होकर उसे शाप दे दिया। हे श्रीकृष्ण ! इस प्रकार संसार
की आसक्ति से जो उसमें लीन हो गये हैं उनसे पूछने का मन नहीं करता। यदि ऋषियों से पूछने जाओ तो वे
हमेशा अपने ही मत के अभिमान में लीन रहते हैं, सदा अपना ही मत स्थापित करना चाहते हैं। उनके विरुद्ध
कोई बोले तो उसे शाप देते हैं। मन में धन की आशा रखकर जो शिष्यों को उपदेश देते हैं, उनके मन में ही
विषय होने के कारण वह उपदेश पेट भरने का साधन बन जाता है। जब गुरु में ही विषयासक्ति है तो शिष्य में
विरक्ति कैसे आयेगी? ऐसे गुरु से जो पूछने जाते हैं वे स्वार्थ सिद्धि से वंचित हो जाते हैं। तुम सत्यस्वरूप,
स्वयंप्रकाश, सर्वात्मा तथा अविनाशी हो इसलिये किस प्रकार युक्ति प्रयुक्ति से उपदेश करना चाहिये तथा
विकल्प को किस प्रकार दूर करना चाहिये यह केवल तुम ही जानते हो। हे श्रीकृष्णनाथ ! ब्रह्मज्ञान का उपदेश
करने में तुम्हारे जैसा कोई मुझे सारे त्रिभुवन में नहीं दिखाई देता। इस प्रकार हे कृष्ण ! यथार्थ में आत्मा तुम ही
हो, आत्मज्ञान देने वाले भी तुम ही हो और आत्मबोध में स्थिर करने वाले भी तुम ही हो।
तस्माद्भवन्तमनवद्यमनन्तपारं सर्वज्ञमीश्वरमकुण्ठविकुण्ठधिष्ण्यम् ।
निर्विण्णधीरहमुह वृजिनाभितप्तो नारायणं नरसखं शरणं प्रपद्ये ॥ १८ ॥
हे यादवश्रेष्ठ ! तुम नित्य, शुद्ध और पवित्रमूर्ति हो, इसलिये तुम्हें ममतामोह स्पर्श नहीं करते। इसीलिये
लोग 'तुम पवित्र हो' इन शब्दों में तुम्हारी कीर्ति का गायन करते हैं। गोपों के जूठे ग्रास से जिसकी पवित्रता भंग
नहीं हुई, बल्कि उसी जूठे ग्रास से तुमने उन गोपालों को तारा। पूतना के प्राणों को सोख लिया फिर भी तुम्हारी
पवित्रता कम नहीं हुई बल्कि उसका उद्धार हुआ। अर्थात् दोष ही दोष का तारणहार बना। कालिया सर्प का मर्दन
कर उसका अभिमान चूर कर दिया लेकिन पवित्रता नष्ट नहीं हुई। उसे विषविहीन कर उसका उद्धार किया।
रजक तो जाति से नितान्त हीन था और उसका अधःपतन होने को था लेकिन उसे मारकर तथा उसे पुनीत
बनाकर उसे तुमने सायुज्य मुक्ति का पात्र बनाया। गोपियों के साथ निंद्य मालूम होने वाला कर्म करके तुमने उन्हें
निष्काम बना दिया। इससे वे अत्यन्त पवित्र होकर सायुज्यधाम चली गयीं। चाहे सुकर्म हो या कुकर्म हो लेकिन
उसे करते समय पवित्रता अक्षुण्ण रहती है, इसीलिये अर्थात् अकर्तात्म बोध के कारण ही तुम्हें 'पुरुषोत्तम' यह
नाम प्राप्त हुआ है। जो त्रिगुणों में फँस जाता है, उसे वे गुण जकड़ लेते हैं लेकिन तुम्हारे पास आते ही वे गुण
समाप्त हो जाते हैं इसलिये तुम सर्वथा 'अनंत' हो। देश या काल की तुम्हारे लिये कोई सीमा नहीं है इसलिये
तुम 'अनंत' और 'अपार' हो। श्रुति भी तुम्हारी थाह नहीं पा सकीं। तुम्हारी मैं कितनी विनती करूँ ? विनती
करते-करते मैं व्याकुल हो उठा हूँ। तुम हृदयस्थ ज्ञानमूर्ति हो इसलिये समस्त त्रिभुवन में ज्ञाता तुम एक अकेले
हो। ज्ञान, अज्ञान ये जो मायाशक्ति हैं, वे सारी ईश्वर के अधीन हैं। लेकिन तुम उस ईश्वर की भी ईश्वरमूर्ति हो।
हे श्रीकृष्ण ! यह तुम्हारी सत्य कीर्ति है। हे कृष्णनाथ ! सर्वस्व के नियंता, सब कुछ करने पर भी अकर्ता और सब
कुछ भोग कर भी अभोक्ता ऐसे एकमेव ईश्वर तुम हो। देश और काल से जिस स्थान का विनाश नहीं होता वहाँ
के तुम निवासी हो तथा पूर्णांश का सम्पूर्ण अवतार हो। तुम 'नर' का अविनाश स्थान हो इसलिये तुम्हे 'नारायण'
कहते हैं। तुम्हारे ही कारण जीव में चलन-चालन होता है। सबका चालकत्व तुम्हारे हाथ में है। इस प्रकार तुम
स्वयं ईश्वर हो तथा नर के विशेष नारायण हो। युद्ध के समय तुमने ही अर्जुन को ब्रह्मज्ञान दिया। उस भीषण
प्रसंग में जब एक-दूसरे का प्राण लेने के लिये जीव अग्रसर थे उस समय तुमने अर्जुन को ब्रह्मज्ञान दिया। तुम