श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसातवाँ अध्याय १७७
प्रकार स्वेच्छा से विचरण करता रहता हूँ। संसार सागर पार करने के लिये मुख्य रूप से 'सद्बुद्धि' चाहिये। यहाँ
अन्य किसी उपाय की परम्परा नहीं है फिर व्यर्थ ही कष्ट सहने की क्या आवश्यकता है ? जिसके पास सद्बुद्धि
नहीं होती वह क्रीतदास की तरह होता है। दिन-रात हजारों कष्ट भोगते-भोगते उसे क्षण भर का भी विराम नहीं
मिलता। जिसके हृदयमन्दिर में सद्बुद्धि नहीं होती उसके मन में कभी वैराग्य नहीं उत्पन्न होता। फिर संसार सागर
कैसे पार होगा ? विवेक तो उसे स्वप्न में भी नहीं दिखायी देता। वैराग्य के साथ यदि सद्बुद्धि भी मिली हो तो
उसके सामने बेचारा संसार क्या करेगा ? वह तो एक घाव में उसके दो टुकड़े कर देगा। यदि संसार नाम की कोई
चीज हो तो उसके विनाश के लिये प्रयास करना आवश्यक है लेकिन जो मनुष्य विवेक का आश्रय लेता है उसका
तो संसार ही नष्ट हो जाता है। संसार के नाश का कारण उसकी 'प्रज्ञा' है। वह यदि कायम रहे तो संसार
'मृगजल' की तरह हो जाता है। मैं जिन गुरुओं का वर्णन कर रहा हूँ, वह मैं अपनी निजबुद्धि से बतानेवाला हूँ,
उसमें से जो ग्राह्य हो उसे स्वीकार करें, जो त्याज्य हो उसका त्याग करें। वही मैं देशी भाषा में बताने वाला हूँ,
उसे ध्यानपूर्वक सुनो। उसके कारण शिष्य की ग्रहणशक्ति स्पष्ट रूप से दिखायी देगी। अब उदाहरण के रूप में
उस बुद्धि के लक्षण बताता हूँ। सूप, चलनीं तथा चूल्हा की तरह बुद्धि का उपयोग करना चाहिये। चलनी में जो
भी गिरता है, उसका सूक्ष्म तत्त्व नीचे गिर पड़ता है और गुण दोषों के कंकड़ चलनी में ही रह जाते हैं और
खड़खड़ाहट करते रहते हैं। ऐसी स्थिति में त्याग करना चाहिये। वैसा न करने से गुणदोषों के कंकड़ उसके पेट में
ही रह जाते हैं और स्वार्थ की निश्चित रूप से हानि होती है। लेकिन सूप की स्थिति निराली रहती है। भूसा तथा
कचरा वह फेंक देता है और केवल बीज अपने पेट में रहने देता है। स्वयं वैराग्य से तप्त होना तथा अपने गुणों से
अपरिपक्व को परिपक्व बनाना चूल्हे का स्वभाव है। हे वीर श्रेष्ठ! इस प्रकार इन तीनों स्थितियों को निश्चित रूप
से धारण करना चाहिये ताकि दर्पण के समान परमार्थ भी प्राप्त हो सके। यदु से उस ब्राह्मण ने कहा कि जो लक्षण
मैंने बताये हैं उन्हें ध्यान देकर सुनो। जिससे जो गुण मैंने लिया, उसे मैंने गुरु बनाया इसलिये मेरे गुण अगणित हो
गये—इतने कि सारा जगत ही मुझे गुरुओं से भरा दिखाई पड़ रहा है। जिससे मैंने ग्रहण किया वह सहज ही मेरा
गुरु हो गया लेकिन उसके दोषों का मैंने त्याग किया वह भी मेरा गुरु हो गया। इस प्रकार गुण ग्रहण और दोष
त्याग इन दोनों के समान भाव से दोनों ही मेरे गुरु हो गये। राजा! अब तुम भी विचार करके देखो तो तुम्हें भी
सारा जग गुरुमय ही दिखायी देगा। इस प्रकार शान्त होकर देखने से सारा जगत ही गुरु मालूम होने लगा। यह
साधन जिसके पास रहता है, वही परमार्थ को साधता है। तुम्हें यह कठिन मालूम होगा। इसलिये मैंने जिन श्रेष्ठ
गुरुओं को स्वीकार किया उनमें से जो प्रमुख हैं उनके बारे में बताता हूँ।
पृथिवीवाय्वाकाशमापोऽग्निश्चन्द्रमा रविः।
कपोतोऽजगरः सिन्धुः पतङ्गो मधुकृद् गजः ॥ ३३ ॥
मधुहा हरिणो मीनः पिङ्गला कुररोऽर्भकः ।
कुमारी शरकृत्सर्प ऊर्णनाभिः सुपेशकृत् ॥ ३४ ॥
अपने सभी गुरुओं के बारे में बताता हूँ। उनकी संख्या चौबीस है। उनके नाम मैं धीरे-धीरे सुनाता
हूँ। (१) पृथ्वी, (२) वायु, (३) आकाश, (४) अग्नि, (५) जल, (६) चन्द्रमा और (७) सूर्य,
(८) कपोत। (९) अजगर, (१०) समुद्र, (११) पतंग, (१२) मधुमक्खी, (१३) हाथी, (१४) भौंरा, (१५)
हिरन, (१६) मछली, (१७) पिंगला नामक वेश्या, (१८) टिटिहरी, (१९) बालक, (२०) कुमति,