श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१६८ श्रीमद् एकनाथी भागवत
परोपकार सहन करना इसे शान्ति कौन कहेगा ? आक्रोश से सहनशीलता लाने का प्रयास करना शान्ति नहीं है।
शान्ति क्षुब्ध न होने वाले समुद्र की तरह होती है। वह न कभी घटता है, न कभी बढ़ता है। सैकड़ों नदियाँ अपना
मटमैला जल समुद्र में डालती रहती हैं लेकिन समुद्र का जल मैला नहीं होता। उसी प्रकार स्वार्थ का विरोध करने
वाली अनेक विषमताओं का प्रहार होने पर भी उसके चित्त में जरा भी परिवर्तन नहीं होता। वही सच्ची 'शान्ति'
है। ऐसी शान्ति जिसे प्राप्त होती है वही समस्त प्राणिमात्र का सखा है, सबका चहेता वही है और सब का सुहृद
भी वही है। उसका सखाभाव भी बड़ा विचित्र है। वह अपनी मैत्री के लिये सर्वस्व अर्पण करता है, अपना स्वार्थ
सिद्ध करने के लिये वह किसी को फँसाता नहीं है जो कृपापात्र होता है उसी को उपदेश करता है। उसकी दृष्टि
अतर्क्य होती है, उसे सारी सृष्टि मद्रूप ही दिखाई देती है। उसने अपनी दृष्टि से जगत की और मेरी गाँठ बाँधी
रहती है। फिर वह जिधर भी देखता है उधर उसे मैं ही दिखाई देता हूँ। वह यदि मुझे नहीं देखता तो उसका वह
न देखना भी मैं ही होता हूँ। उसकी देखने की दृष्टि मैं स्वयं हो जाता हूँ और सारी सृष्टि के साथ-साथ मेरी और
उसकी दोस्ती जम जाती है। सारी सृष्टि ही जब मैं हो जाता हूँ तो 'वह और मैं' ये शब्द ही व्यर्थ हो जाते हैं। इस
प्रकार वह सर्वत्र समदृष्टि के योग से एकात्म होकर मुझमें ही वास करता है। इस प्रकार मनोधर्म ही छोड़ देने के
कारण जिसके लिये मैं सुगम हो जाता हूँ उसे वह जन्म कैसे मिलेगा जिसके कारण उसे दुर्धर दुःख भोगना पड़ता
है। माता की उदररूपी गुफा में रजस्वला के रुधिर में पिता के रेत द्वारा गर्भधारणा होकर संसार का प्रारम्भ होता
है। माँ के पेट में स्थित जीव जन्तु उसके नाक में, मुँह में, छाती में और मस्तक में प्रवेश करते हैं और वह प्राणी
नौ महीने तक विष्ठामूत्र में लिपटा पड़ा रहता है। जठराग्नि के दावानल में गर्भ का गोल पिण्ड तैयार होता है और
फिर उसमें से एक-एक अवयव तैयार होता है। हे नारायण ! वह गर्भ की वेदना और वहाँ की नाना प्रकार की
यातनाएँ तो असह्य होती हैं। उसके बारे में सुनकर ही घृणा होती है और फिर सबके अन्त में जो प्रसूति वायु उठती
है उससे तो सारे शरीर में बिच्छू के डंक जैसी वेदनाएँ होती हैं और बड़े संकट से योनि में से शरीर का जन्म होता
है। ऐसा अपवित्र जन्म उन उत्तम पुरुषों को कभी प्राप्त नहीं होता जिन्होंने निजधाम प्राप्त कर लिया है। वे
समदृष्टि के कारण स्वयं ही पुरुषोत्तमस्वरूप हो जाते हैं। उनके आगे पीछे मैं ही होने के कारण उनके लिये जन्म
का प्रश्न ही नहीं उठता। वे कलिकाल की परवाह न कर सीधे मत्स्वरूप हो जाते हैं। जहाँ जन्म ही नहीं रहता
वहाँ मृत्यु भी खाली हाथ लौट जाती है। इस प्रकार मेरे भक्त मेरा भजन कर उसके बल से ही मुझे प्राप्त करते हैं।
इतना कह कर कृष्ण ने उद्धव की पीठ थपथपायी और कहा, “चलो उठो, शीघ्रता करो, यही युक्ति साध्य करो
ताकि जीवन का कष्ट समाप्त हो जाय। मेघ के मुख से निकला हुआ जल चातक जिस प्रकार ऊपर ही ऊपर
ग्रहण कर लेता है, उसी प्रकार कृष्ण के भाषण का भी उद्धव ने आकंठ पान किया। चकोर जिस प्रकार
चन्द्रकिरण के लिए आतुर हो उठता है उसी प्रकार हरि के भाषण के लिये उद्धव उतावला हो गया। पक्षिणी के
बच्चे माँ के आने का समय होते ही जिस प्रकार नीड में आगे सरक कर प्रतीक्षा करते हैं। उसी प्रकार कृष्ण का
मुख देखकर उद्धव को अत्यन्त आनन्द हुआ और वह कानरूपी मुख से कृष्णामृत प्राशन करने लगा। "
श्रीशुक उवाच
इत्यादिष्टो भगवता महाभागवतो नृप।
उद्धवः प्रणिपत्याह तत्वजिज्ञासुरच्युतम् ॥ १३ ॥
शुक्राचार्य कहते हैं, हे परीक्षित् ! भगवान के हृदय में कृपा उत्पन्न हुई इसलिये उसने अपने महान भक्त को