श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसातवाँ अध्याय १७३
कितने ही प्राणी अनेक पैरों से चलने वाले हैं। इस प्रकार मैंने अनेक प्रकार के शरीर गढ़े हैं। इस प्रकार पृथ्वी पर
मैंने बनाये हुए शरीरों की संख्या कितनी है, इसका अन्त नहीं है, लेकिन वे प्राणी मुझ कर्त्ता को नहीं पहचानते
इसलिये मतिमंद हैं। मुझ कर्त्ता की प्राप्ति हो सके इसलिये मैंने अपने अंश से ज्ञानशक्ति प्रकाशित कर मनुष्य
शरीर का निर्माण किया। जिस देह से वे मुझे प्राप्त करते हैं, उस देह से मुझे अत्यन्त प्रीति है, इसीलिये वेद
नरदेह का वर्णन करते हैं और देवता भी नरदेह की कामना करते हैं। अनेक युक्तियों से लोग इसी नरदेह से मुझे
प्राप्त करते हैं। ऐसे नरदेह की प्रीति के सम्बन्ध में श्रीकृष्ण ने उद्धव को बताया।
अत्र मां मार्गयन्त्यद्धा युक्ता हेतुभिरीश्वरम्।
गृह्यमाणैर्गुणैर्लिङ्गैरग्राह्यमनुमानतः ॥ २३ ॥
नरदेह प्राप्त करने के बाद वे कर्ता की खोज करते हैं—मेरी, जो त्रिभुवन की उत्पत्ति, स्थिति और संहार
करने वाला परमेश्वर, मेरी बुद्धि का विवेक से अनुमान लगाते हैं, लेकिन वह अनुमान और उससे निष्पन्न होने
वाला ज्ञान भी जड़ ही रहता है, क्योंकि उस ज्ञान को प्रकाशित करने वाला स्वयंप्रकाश मैं उन सबसे भिन्न हूँ। ऐसे
लक्षणों से वे मुझे जानते हैं लेकिन इस प्रकार के कितने ही अनुमान वे करें लेकिन मैं उनके वश में आनेवाला
नहीं हूँ। तो जो भी कोई अभिमान त्याग कर मेरा स्वरूप देखने का प्रयास करते हैं, केवल उन्हें ही मेरे स्वरूप का
साक्षात अनुभव प्राप्त होता है, यह बात ध्यान में रखो। जिसकी सारी आशाएँ नष्ट होती हैं, वही धीरे-धीरे
ब्रह्मस्वरूप प्राप्त करता है, उसने ही कलिकाल से लड़ने के लिये कमर कस ली है ऐसा समझना चाहिए। चेहरा
तो स्वतःसिद्ध रहता है लेकिन यदि निर्मल दर्पण हो तभी उसकी छवि दिखायी दे सकती है, उसी प्रकार जब बुद्धि
को विवेक प्राप्त होता है तभी नरदेह में आत्मा दिखायी देने लगता है। इस सम्बन्ध में एक प्राचीन इतिहास है, वह
मैं अब तुम्हें सुनाता हूँ। यदु और अवधूत इन दोनों का संवाद साधकों के लिये ज्ञानसाधन रूप हैं।
अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम्।
अवधूतस्य संवादं यदोरमिततेजसः ॥ २४॥
श्रीकृष्ण ने प्रसन्नतापूर्वक कहा, उद्धव ! हमारा पूर्वज जो यदु था उसने अवधूत के साथ ब्रह्मज्ञान के सम्बन्ध
में सुन्दर संवाद किया था। वह यदुराजा मानों क्षत्रियों में सूर्य था, अन्य नृपति रूप चन्द्र के प्रकाश को वह अपने
तेज से देदीप्यमान करता था। उसने अवधूत से गुरु के लक्षण श्रवण किये थे इसलिये उसे लगे हाथ सायुज्यता
मुक्ति प्राप्त हो गयी थी। वही प्राचीन कथा अब तुम्हें सुनाता हूँ।
अवधूतं द्विजं कञ्चिच्चरन्तमकुतोभयम्।
कविं निरीक्ष्य तरुणं यदुः पप्रच्छ धर्मवित् ॥ २५ ॥
आत्मतेज से प्रकाशित तथा ब्रह्मानन्द से डोलने वाले किसी एक अवधूत को यदु ने आते हुए देखा। यदु ने
उस अवधूत के स्वरूप का सूक्ष्मता से निरीक्षण किया। उसने यज्ञोपवीत धारण किया था इसलिये वह ब्राह्मण
होगा तथा ब्रह्मवेता होगा ऐसा उसको विश्वास हो गया। यदु क्रीड़ा करने के लिये वन में गया था तभी यह
अवधूत निर्भय और निःशंक होकर विचरण करता हुआ सामने से आता दिखायी दिया। भीतर के प्राण को वह
बाहर नहीं निकलने दे रहा था, ऐसी प्राणाप्राण की समता, धारणा किये बिना ही उसे प्राप्त हो गयी थी। उसका
देखना भी विचित्र प्रकार का था। दृश्यरूप से देखना वह नहीं जानता था। वह सर्वांग सुन्दर हो गया था और
द्रष्टा के रूप में ही वह दृश्य देखता था। मैं जंगल में भटकने वाला एक व्यक्ति हूँ इसकी उसे जानकारी ही नहीं