श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसातवाँ अध्याय १७१
ऐसे कृपालु हो इसीलिये मैं तुम्हारी शरण में आया हूँ। आधिभौतिक, आध्यात्मिक तथा आधिदैविक इन तीनों
तापों से मैं दग्ध हो गया हूँ। यह संसार भीषण दुःख से युक्त है। संसार एक अन्धा कुआँ है। उसमें कामक्रोधादि
महादुष्ट सर्प हैं। उसमें निन्दा और प्रतिस्पर्द्धा रूपी काँटे फैले हुए हैं। ऐसे दुःख में मैं पड़ा हुआ हूँ और पेट में
ब्रह्मद्वेष का शूल उभरने से छटपटा रहा हूँ। उसमें से बाहर निकलने के लिए मुझे कोई उपाय नहीं सूझ रहा है।
इसलिये हे कृपानिधे ! हे दयालु ! आत्मज्ञान का बोध कराकर मुझे ऊपर निकालो।
श्रीभगवानुवाच
प्रायेण मनुजा लोके लोकतत्त्वविचक्षणाः ।
समुद्धरन्ति ह्यात्मानमात्मनैवाशुभाशयात् ॥ १९॥
शरीर में भूत का संचार होने पर जिस प्रकार मांत्रिक (समंत्र) उस पर अक्षत् फेंकता है उसी प्रकार जहाँ
पहले ही पंचमहाभूतों का संचार हुआ था, उसमें कृष्ण वियोग का भूत शरीर में प्रवेश करने के कारण उद्धव
बिलकुल घबरा गया था। तब उद्धव की घबराहट का बहाना बनाकर, लोगों के मन में 'अहं' का जो महिषासुर
घुस गया था उसे निकाल बाहर करने के लिये कृष्णरूप जानकर निकल पड़ा। उस 'अहं' महिषासुर को निकाल
बाहर करने के लिये श्रीकृष्ण यदु अवधूत संवादकथा की मंत्राक्षत फेंक कर उस भूत को भगा रहा है। श्रीकृष्ण ने
उद्धव से कहा, अब तुम सावधान हो जाओ, क्योंकि इस मृत्युलोक में अपना उद्धार स्वयं ही करना पड़ता है।
सच पूछो तो इस परमार्थ के लिये माता-पिता किसी प्रकार की सहायता नहीं कर सकते। पुत्र, बन्धु, कन्या
अथवा कांता तो कभी सहायक नहीं होते। परमार्थ में न समधी सहायता करता है न दामाद ही सहायक होता है,
बल्कि जो हमारे शरीर में रहकर विवेक का काम करता है वही हमारे लिये सहायक होता है। मुमुक्षु मार्ग पर
चलने वाले तत्त्वविचार करने वाले ज्ञानी लोग, कार्यकारण का विचार कर अपनी ही बुद्धि से संसार सागर को
पार करते हैं। नित्य क्या है और अनित्य क्या है इसका विचार कर अनित्य का त्याग करते हैं और जो नित्य है
उसका स्वहित के लिये अंगीकार करते हैं। नित्यत्व से जो शेष रह जाता है, वही मेरा चिद्धन स्वरूप है, इसे
ध्यान में रखो। साधकों का साधन भी वही है इसलिये उसे भी वे अनन्यभाव से अर्थात् स्वयं ही वह तत्त्व हैं इस
भावना से उसका चिन्तन करते हैं। इस प्रकार मुझमें दृढ़ भावना रखने से मैं ही वह कीट-भृंग बन जाता हूँ और
इस प्रकार वे स्वयं ही अपना उद्धार कर लेते हैं।
आत्मनो गुरुरात्मैव पुरुषस्य विशेषतः ।
यत्प्रत्यक्षानुमानाभ्यां श्रेयोऽसावनुविन्दते ॥ २० ॥
पशु-पक्षी आदि योनियों में भी हित और अहित किसमें है इस बात का ज्ञान रहता है। फिर मनुष्य के देह में
वह क्यों नहीं होगा ? वह सहजस्फूर्त रहता है यह ध्यान में रखो। मैं अपने देह से जो कर्म कर रहा हूँ, उससे मैं
तरूँगा या नहीं यह प्रत्येक व्यक्ति अपनी स्फूर्ति के द्वारा जानता रहता है। अशुभ वासना को छोड़ जो मन में विषय
की कल्पना भी नहीं करता वह स्वयं ही अपना गुरु बन कर नरक की यातनाओं से बचाता है यह ध्यान में रखो।
जो गर्भावस्था और जन्म से थक जाता है, मरने-जीने की प्रक्रिया से ऊब जाता है, जन्म-मृत्यु के विनाश के प्रति
व्याकुल रहता है, स्त्री पुत्रों के प्रति जिसके मन में मोह नहीं उत्पन्न होता, जीवन को काल ग्रस रहा है फिर भी
मेरा हित किसमें है यह मालूम नहीं होता और इस विचार से जिसे रात को नींद नहीं आती जरा विचार करो कि
तुम्हारे देखते-देखते उसने तुम्हारी बाल्यावस्था को ग्रस लिया, यौवन का शिखर उसने निगल लिया और अब वह